कश्मीर अनुच्छेद 370: आसान नहीं होगी आतंक को हटाकर विकास और अमन की राह?
मोदी सरकार का कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करना एक ऐतिहासिक फैसला है। यह फैसला कश्मीर में ना केवल आतंकवाद को खत्म करेगा बल्कि विकास के नए रास्ते खोलेगा। दरअसल, हमारे संविधान के निर्माण के समय कई ऐसी धाराएं जोड़ी गई थीं जिनका उद्देश्य आज़ादी के बाद नए और बुलंद भारत को खड़ा करना था, लेकिन उन धाराओं में शुरुआत से ही विवादित रहा अनुच्छेद 370। इस अनुच्छेद के चलते जम्मू, पुंछ, राजौरी, किश्वतवाड़, लद्दाख जैसे क्षेत्रों के विकास का रास्ता बंद हो गया। लेकिन अनुच्छेद 370 के खत्म होने से जम्म-कश्मीर, लद्दाख प्रांतों को केंद्र की सुविधाओं और योजनाओं का फायदा पहुंचेगा साथ ही यहां निवेश और रोजगार बढ़ेगा।
आखिर क्यों इतने सालों से समस्या बना रहा कश्मीर?
कश्मीर से पहले भारत में कई ऐसे राज्य हैं जिनमें बड़ी-बड़ी समस्याएं थीं और आज भी हैं। छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश हो या पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्य, वहां नक्सलवाद के चलते हिंसा की समस्या ने सिर उठाए रखा था और सरकारों ने इन समस्याओं को विकास कार्यों के समानांतर खत्म करने का प्रयास किया और एक हद तक सफल भी रहीं, लेकिन ये सोचने वाली बात थी कि 'क़श्मीर' में आतंकवाद की समस्या से जूझते हुए सरकारों का ध्यान विकास से दूर ही रहा। आए दिन कर्फ्यू, आतंकी हमले, पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी के बीच अनुच्छेद 370 भी शेष भारत से पूर्णतः जुड़ाव में बाधा बना रहा। यह बाधा राज्य और केंद्र के स्वाभाविक संबंधों में भी बाधा बनी रही।
कई पूर्ववर्ती सरकारों ने पाकिस्तान से बातचीत, अलगाववादियों से बातचीत और यहां तक की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत जैसे विकल्पों के सहारे घाटी के लिए नए रास्ते खोले लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। हालांकि अनुच्छेद 370 को लेकर किसी भी सरकार के पास वैसी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी जो इस बार मोदी सरकार ने दिखाई है।
बहरहाल, जहां तक आतंकवाद की बात है सरकार के लिए केवल अनुच्छेद 370 हटाने से ये खत्म नहीं होगा बल्कि सरकार के साथ-साथ कश्मीर के समाज को भी आगे आकर उसका मुकाबला करना होगा। विकास कार्यक्रमों में भागीदार होना होगा।
देखा जाए तो कश्मीर में आतंक का इलाज सिर्फ एक कश्मीरी कर सकता है, कोई सरकार नहीं। कश्मीरी मुसलमानों को भी अब ये बात समझ लेनी चाहिए कि उसका वजूद कश्मीरी पंडित के बगैर अधूरा है। वे दोनों ही कश्मीर की पवित्र भूमि के पुरखे हैं। दोनों ही भाई कश्मीर के इतिहास की वो कड़ी है जिससे जमीन की इस जन्नत के चेहरे पर सुकून और अमन दिखाई देता है।
कश्मीरी पंडित और मुसलमान
एक बात गौर करने लायक है कि अनुच्छेद 370 या बिना 370 के कश्मीरी हिंदू की वापसी कश्मीरी मुसलमानों के दिल से ही निकलती है। कश्मीरियत को ज़िंदा रखना है तो घाटी में रह रहे मुसलमानों को समझना होगा।
1989 में जिस उन्माद ने कश्मीरी पंडितों को उनकी अपनी ज़मीन से बेदखल किया, अगर उस समय आम मुसलमानों ने कश्मीरी ने पंडितों के साथ खड़े होकर विरोध किया होता तो आज कश्मीर में आतंकवाद की लपटें ज़िंदा न होतीं। गलती समझकर, गलती सुधारकर, माफ़ी मांगकर अब वादी में अगर वो खुले दिल से अपने कश्मीरी पंडित भाई बहनों की वापसी का स्वागत कर पाएं तब असली शान्ति बहाली का रास्ता खुलने में माहौल बनेगा।
मेरी किताब 'रिफ्यूजी कैंप ' के नायक अभिमन्यु की ही तरह मेरा भी ये विश्वास है कि किसी भी समाज में शान्ति उस समाज के लोग ही ला सकते हैं। सरकार और पुलिसतंत्र इसमें एक सहभागी और सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि एक बात गौर करने लायक है कि अनुच्छेद 370 के हटने से जुड़ी आशाएं और उत्सव वास्तविकता कम अतिश्योक्ति ज़्यादा हैं। हां इस बात में कोई दो राय नहीं कि इस अनुच्छेद के हटने से दुनिया और विशेष रूप से पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश गया है। पूरा देश कश्मीर के प्रति जिस अपनेपन को महसूस करता था वह और प्रगाढ़ हुआ है।
बहरहाल, अनुच्छेद 370 के हटने के बाद ये तो आना वाला समय ही बताएगा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को इसका कितना और क्या फायदा मिलेगा।
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