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पॉक्सो एक्ट और नाबालिग लड़के: खामोश और दबी हुई आवाजों तक कब पहुंचेगी मदद?

Thu, 05 Jun 2025 04:14 PM IST
Shruti Agrawal श्रुति अग्रवाल
Updated Thu, 05 Jun 2025 04:14 PM IST
सार

‘यौन शोषण’ शब्द सुनते ही अक्सर हमारा ध्यान लड़कियों की ओर जाता है, पर यह कड़वी सच्चाई है कि नाबालिग लड़के भी बड़ी संख्या में इस अत्याचार का शिकार होते हैं। समाज की रूढ़िवादी सोच और मर्दानगी से जुड़ी गलत धारणाओं के कारण ऐसे मामलों में चुप्पी साध ली जाती है, जिससे ये गहरे अवसाद और उपहास का शिकार होते हैं।

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It is important that POCSO acts becomes a 'protective shield' for minor boys too
नाबालिग लड़कों के साथ होने वाली यौन हिंसा को रोकने के लिए समुचित जागरूकता अभियान स्कूलों और सामाजिक स्तर पर चलाए जाने चाहिए। - फोटो : Freepik.com

विस्तार

जब भी हम ‘यौन शोषण’ जैसे घृणित शब्द को सुनते हैं, तो हमारे जेहन में लड़कियों की ही तस्वीर उभरती है। आमतौर पर यही सोचा जाता है कि यदि किसी के साथ यौन शोषण हुआ है, तो वह लड़की ही होगी। इस तरह की सोच इंसान की स्वाभाविक प्रतिक्रिया को दर्शाती है, लेकिन यह सच नहीं है। यौन हिंसा का शिकार केवल लड़कियां ही नहीं होतीं। कड़वी सच्चाई यह है कि नाबालिग लड़के भी बड़ी संख्या में इस अत्याचार का सामना करते हैं। लेकिन समाज की झूठी रिवायतों और मान्यताओं के कारण इस तरह के मामलों में चुप्पी साध ली जाती है। अक्सर ऐसे मामले सामाजिक चुप्पी और नजरअंदाजी की परतों में दब कर रह जाते हैं।

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हमारे देश में नाबालिग बच्चों को यौन शोषण से बचाने वाला पॉक्सो कानून (POCSO Act - Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) एक लिंग-निरपेक्ष कानून है। इसका अर्थ यह है कि पॉक्सो कानून के तहत हर बच्चे- चाहे वह लड़का हो, लड़की हो या ट्रांसजेंडर- सभी को समान सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। फिर भी यदि व्यावहारिक तौर पर नज़र डालें, तो नाबालिग लड़कों के मामलों को दर्ज करने, सुनवाई और मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया लड़कियों की तुलना में न केवल धीमी बल्कि उपेक्षित भी रहती है।

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समस्या यह नहीं है कि लड़कों के मामले सामने नहीं आते, बल्कि यह है कि उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है। चाइल्डलाइन इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार- 

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यौन शोषण की टेलीफोनिक शिकायत करने वाले बच्चों में लगभग 30 प्रतिशत लड़के होते हैं, लेकिन उनके मामले किसी न किसी कारण से रिपोर्ट नहीं हो पाते। वहीं एनसीआरबी का डेटा भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है कि लड़कों के मामलों में एफआईआर दर्ज होने की दर बेहद कम है।


आखिर क्यों नहीं है समाज में जागरूकता? 

हमारे समाज का ताना-बाना ही कुछ ऐसा है कि लड़कों के यौन शोषण को उनकी कमजोरी माना जाता है। मर्दानगी से जोड़कर देखने की बेहूदा परंपरा बन चुकी है। वहीं कई बार यौन शोषण को छेड़खानी या मस्ती समझकर उस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। जबकि मनोचिकित्सकों का मानना है कि लड़कों का यौन शोषण उनके मानसिक और शारीरिक विकास को अत्यधिक प्रभावित करता है।

दरअसल, कई बार बच्चे गहरे अवसाद (deep-seated depression) में चले जाते हैं, जिसका असर ताउम्र उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। पीड़ित लड़के की पीड़ा अक्सर दोगुनी हो जाती है- पहली बार तब जब अपराध होता है, और दूसरी बार तब, जब समाज इस घटना पर चुप्पी साध लेता है या उसका उपहास उड़ाता है। कम उम्र के बच्चों पर बुली का भी खासा मनोवैज्ञानिक असर होता है।

इन्हीं कारणों के चलते लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण के मामले बहुत कम दर्ज होते हैं। इनकी तरफ ध्यान तब ही जाता है जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाए जैसा कोई मामला सामने आए। इसी तरह का एक मामला मई 2024 में उज्जैन शहर से सामने आया था। यहां एक आश्रम स्कूल के शिक्षक को नाबालिग छात्रों से यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। आश्रम के तीन लड़कों ने शिकायत दर्ज करवाई थी, जिनमें से दो की उम्र 12 और 14 साल थी।

नाबालिगों की शिकायत पर पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया। जब इस मामले की तह तक पहुंचा गया तो सामने आया कि केवल तीन-चार नहीं, बल्कि लगभग 19 नाबालिग लड़कों के साथ यौन हिंसा हुई है। साथ ही, आरोपी शिक्षकों की संख्या भी एक की जगह दो पाई गई।

यह घटना बताती है कि लड़कों के साथ भी यौन हिंसा की अनेक घटनाएं होती हैं, लेकिन डर, शर्म और सामाजिक ताने-बाने के कारण चुप्पी ओढ़ ली जाती है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'आस' के संचालक वसीम इकबाल का कहना है कि लड़कों के साथ भी यौन शोषण होता है, लेकिन अधिकांश मामले प्रकाश में नहीं आ पाते। जो सामने आते हैं, उनमें भी कानूनी मदद की जगह मनोवैज्ञानिक सहायता अधिक चाही जाती है।

हम बच्चों के पालकों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि वे आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाएं। लेकिन लड़कियों की तुलना में लड़कों के पालकों को इसके लिए तैयार करना कहीं अधिक कठिन होता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि प्रशासन इन घटनाओं के प्रति उदासीन रहता है, इसलिए सरकार, समाज और परिजनों- सभी को यह समझना होगा कि लड़का होना यौन शोषण से अछूता होना नहीं है।

नाबालिग लड़कों के साथ होने वाली यौन हिंसा को रोकने के लिए समुचित जागरूकता अभियान स्कूलों और सामाजिक स्तर पर चलाए जाने चाहिए। यहां सवाल यह नहीं है कि पीड़ित कौन है।



सवाल यह है कि क्या पॉक्सो कानून सभी लिंगों के बच्चों का बचपन संरक्षित करने में सफल हो पा रहा है या नहीं। पॉक्सो अधिनियम तभी सफल माना जाएगा जब नाबालिग लड़कों की चुप्पी भी चीख में बदले- और व्यवस्था उन्हें न केवल सुने, बल्कि समझे और न्याय भी दे।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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