फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   International Mother Language Day 2024 Importance And Significance Of This Day

मातृभाषा दिवस विशेष: अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व के इस दौर में मातृभाषाओं के संरक्षण का सवाल

Wed, 21 Feb 2024 12:47 PM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Wed, 21 Feb 2024 12:47 PM IST
सार

हिंदी केवल एक भाषा नहीं बल्कि कई मातृभाषाओं का समूच्य है। आज जब हिंदी भाषा पर बात होती है तो अवधी, ब्रजभाषा, बघेली, कुमाऊंनी व अन्य उसकी सहयोगी बोलियों का नाम लेने पर लोग पूछने लगते है यह कौन सी बोली व भाषा है? 'यह हिंदी नहीं है' ऐसा कहकर वह इनके साहित्य को पढ़ने और स्वीकारने से ही मना कर देता हैं।

विज्ञापन
International Mother Language Day 2024 Importance And Significance Of This Day
मातृभाषा दिवस 2024 - फोटो : Istock

विस्तार

भारतीय ज्ञान परंपरा का मुख्य आधार किताबों से अधिक समाज रहा है। आमजन ने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप में सजोने और संवारने का भरसक प्रयास किया है। यह मौखिक परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। भारत जो एक बहुभाषी राष्ट्र है, उसके ज्ञान-विज्ञान की अमूल्य निधियां इन्हीं बोली भाषाओं में संचित है। इसमें से अधिकांश मौखिक रूप में व्यवहारित है। किंतु आज भाषा की मौखिक परंपरा धीरे-धीरे अवसान की तरफ बढ़ रही है। यदि भाषा का व्यवहारिक पक्ष ही समाप्त हो जाएगा तो मातृभाषाएं भी धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएंगी। 

विज्ञापन


भाषा का व्यवहारिक पक्ष ही भाषा को मजबूत बनाकर उसे पुस्तकाकार रूप प्रदान करता है। हमारी कितनी ही मातृभाषाएं, आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास की सहयात्री रही है और वर्तमान में वह अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। उनमें से कुछ को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो गया और वह भाषा के रूप आठवीं अनुसूची का हिस्सा बन गई। लेकिन बहुत सी मातृभाषाएं एक स्थान, समुदाय विशेष से जुड़ी होने के कारण सिमट कर रह गई हैं। उनका साहित्यिक व सामाजिक रूप से कमतर प्रयोग एवं रोजगार की संभावनाओं में उनका कहीं भी नहीं होना, उन्हें विलुप्ति की कगार पर ले जा रहा है। आज के उपयोगितावादी दृष्टि के कारण युवा भी रोजगारपरक भाषा को ही अपनाना चाहता है।
विज्ञापन


हिंदी केवल एक भाषा नहीं बल्कि कई मातृभाषाओं का समूच्य है। आज जब हिंदी भाषा पर बात होती है तो अवधी, ब्रजभाषा, बघेली, कुमाऊंनी व अन्य उसकी सहयोगी बोलियों का नाम लेने पर लोग पूछने लगते है यह कौन सी बोली व भाषा है? 'यह हिंदी नहीं है' ऐसा कहकर वह इनके साहित्य को पढ़ने और स्वीकारने से ही मना कर देता हैं। क्योंकि उनके लिए हिंदी का मतलब सिर्फ खड़ी बोली है। यह हमारी मानसिकता ही है कि आज अंग्रेजी भाषा शिक्षा और वर्चस्व की भाषा बन गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


‘भाषा’  केवल संवाद और संपर्क का माध्यम मात्र नहीं है बल्कि वह हमारी पहचान व अस्तित्व से भी जुड़ी है। वैश्विक स्तर पर जब हम स्वयं को बहुभाषी राष्ट्र के रूप में संबोधित करते हैं, उसमें हमारी मातृभाषाओं का भी सहयोग है। प्रत्येक क्षेत्र की भाषा वहां के जीवन का सार है। उसकी सामाजिक संरचना को उसकी लोक भाषाओं के माध्यम से बेहतर समझा जा सकता है। एक गैरभाषी क्षेत्र में कार्य करने वाला व्यक्ति भी उस क्षेत्र को उसके लोक और मातृभाषाओं से निकटता स्थापित करके, उस समाज व समूह को बेहतर समझता है। विश्व भी हम भारतीय लोगों को हमारे भाषिक व्यवहार से पहचानता है। वह हमारे भाषिक व्यवहार को अपनाकर हमसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनत्व स्थापित करता है।

International Mother Language Day 2024 Importance And Significance Of This Day
मातृभाषा दिवस 2024 - फोटो : Istock

नेल्सन मंडेला ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि ‘यदि आप किसी आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो यह बात उसके दिमाग तक जाती है। अगर आप उसकी भाषा में बात करते हैं तो वह उसके दिल तक जाती है’। हमारी मातृभाषाएं हमारे हृदय का द्वार है। जो धीरे-धीरे भाषिक नीति-नियमों में उसकी अवहेलना के कारण सामाजिक भाषिक व्यवहार से लेकर शिक्षा तक में सिमटती जा रही हैं।

आज का समय विज्ञान और तकनीक का है। हमारा युवा शिक्षा के माध्यम से इससे जुड़ रहा है। लेकिन कितने ही युवा भाषाई दूरियों के कारण विज्ञान और तकनीक से स्वयं को दूर कर रहे हैं। भाषा, ज्ञान के ग्रहण और संग्रहण दोनों का ही माध्यम है। लेकिन यदि वह शिक्षा किसी एक भाषा विशेष को केंद्र में रखकर पढ़ी-पढ़ाई जाती रहेगी तो युवा उस ज्ञान परंपरा से ही दूरी बना लेगा। मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है कि बच्चा जितनी तेजी व बेहतर तरीके से अपनी मातृभाषा में ज्ञान को अर्जित कर सकता है, वह अन्य भाषा में संभव नहीं है।

उसकी अन्य भाषाओं में सीखने की प्रक्रिया शिथिल, उबाऊ और अधिक मानसिक द्वंद्व से गुजरती है। अपने जीवन अनुभव को साझा करते हुए पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने कहा था कि ‘मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बन पाया क्योंकि मेरी शिक्षा मेरी मातृभाषा में हुई है’। मातृभाषा में शिक्षा के अभाव के कारण युवाओं का एक बड़ा वर्ग विज्ञान और तकनीकी ज्ञान को अर्जित करने से पिछड़ रहा है। 

हमारे आसपास संवैधानिक स्तर से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक, लोक से शहर तक मातृभाषाओं के संरक्षण का प्रश्न सदा ही उठता रहा है। लेकिन यह प्रश्न सिर्फ प्रश्न ही बनकर रह जाता है। आज भी आकादमिक से लेकर सार्वजनिक स्तर के अधिकांश कार्य, नीति नियम, योजनाएं, वैधानिक फैसले सभी अंग्रेजी भाषा में संपन्न होते है।

हिंदी भाषा की दोयम दर्जे की स्थिति का प्रभाव भारत की विभिन्न मातृभाषाओं पर भी देखा जा रहा है। भारत का ही एक आम युवा हिंदी भाषा को बोलने से संकुचाता है। हिंदी क्षेत्र की मातृभाषाओं के नाम सुनकर तो वह नाक आंख मुंह बनाने लगता है। उन्हें भाषा ही नहीं मानता है।

आज के युवा द्वारा अपनी मातृभाषा के प्रति इतना नकार भाव, उसके प्रति हिकारत का भाव रखना, हमें भारतीय भाषाओं विशेषकर मातृभाषाओं के भविष्य के प्रति चिंतित करता है। ऐसे मानसिक व सामाजिक परिवेश में मातृभाषाओं को कैसे बचाया जा सकता है? इन मातृभाषाओं में संचित ज्ञान राशि की संचित निधि को कैसे सजोया या सवारा जा सकता है ? यह प्रश्न आज भी ज्वलंत बना हुआ है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed