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जिजीविषा: विवेक में समाहित शांति, मौन में आत्मा ब्रह्म से मिलती है और हम स्वयं से
सार
विवेक जब परिपक्व होता है, तो साधक जानता है कि शरीर एक साधन है, मन एक उपकरण है, और बुद्धि एक मार्गदर्शक है। वह यह भी समझता है कि वह स्वयं इन सबसे परे है। जैसे कोई राजा अपने सेवकों से कार्य कराता है पर स्वयं सेवक नहीं बनता, वैसे ही आत्मा शरीर, मन, बुद्धि से कार्य करवाती है, पर उनसे बंधती नहीं। यह भेद ही मुक्ति का प्रवेश द्वार है।
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“ब्रह्म सत्यम्, जगन्मिथ्या” केवल एक सूत्र नहीं, एक व्रत है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
यह संसार निरंतर गति में है। एक अदृश्य चक्र की भांति जो हर क्षण आकार लेता है और मिट जाता है। इस चक्र की गति इतनी सूक्ष्म और अनवरत है कि हम उसमें उलझे रहते हैं। कभी उसके मूल को पहचान ही नहीं पाते। एक साधारण मनुष्य इस परिवर्तन को जीवन का स्वाभाविक अंग मानकर चलता है, लेकिन जो साधक है, जो आत्मा की खोज में है, वह इस गति की तह तक जाता है और नित्य और अनित्य का भेद समझता है।
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वह जानता है कि परिवर्तनशील वस्तुएं या घटनाएं चाहे कितनी भी आकर्षक क्यों न हों, वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे शाश्वत नहीं हैं। वहीं से आरंभ होता है विवेक, यानि उस गूढ़ अंतरबोध की यात्रा जिसे आदि शंकराचार्य जी ने अपनी ‘विवेकचूड़ामणि’ में 'नित्यानित्यवस्तु विवेकः' कहा है। इस विवेक का अभ्यास केवल ग्रंथों का पठन नहीं है; यह जीवन की गहराई में उतरने की क्रिया है। यह एक मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन है, जिसमें हर क्षण साधक अपने अनुभवों की परीक्षा करता है।
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भोजन करते समय, संवाद करते समय, यहां तक कि शोक में डूबते समय भी एक आवाज भीतर उठती है: क्या यह क्षण स्थायी है? क्या यह भाव, यह दु:ख, यह सुख, यह संबंध- क्या यह मुझे उस सत्य की ओर ले जा रहा है जो अपरिवर्तनीय है? यदि नहीं, तो क्या मैं इस भाव को छोड़ सकता हूं, या कम से कम उसे अपनी आत्मा की पहचान बनने से रोक सकता हूं?
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आदि शंकराचार्य का “ब्रह्म सत्यम्, जगन्मिथ्या” केवल एक सूत्र नहीं, एक व्रत है। इस सूत्र को साधना के रूप में जीना, जीवन को पूरी तरह परिवर्तित कर सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब यह स्वीकार कर रहा है कि जिस वस्तु को हम “सत्य” मानकर उसके पीछे भागते हैं, वह अक्सर केवल 'Perceived Reality' होती है, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य। 'Cognitive Defusion' का वर्णन मनोविज्ञान में किया गया है। इसमें बताया गया है कि यह वह अवस्था है जब व्यक्ति अपने विचारों से दूरी बनाए। अर्थात वह समझे कि “मैं अपने विचार नहीं हूं।” यह वही बात है जो शास्त्र सैकड़ों वर्षों से कह रहे हैं- 'मनः कृतं जगत्'। मन जैसा सोचता है, वैसा संसार बनता है। इसलिए विवेक का अभ्यास मन को प्रशिक्षित करना है। उसे यह सिखाना कि स्थायी क्या है और क्षणिक क्या।
विवेक जब परिपक्व होता है, तो साधक जानता है कि शरीर एक साधन है, मन एक उपकरण है, और बुद्धि एक मार्गदर्शक है। वह यह भी समझता है कि वह स्वयं इन सबसे परे है। जैसे कोई राजा अपने सेवकों से कार्य कराता है पर स्वयं सेवक नहीं बनता, वैसे ही आत्मा शरीर, मन, बुद्धि से कार्य करवाती है, पर उनसे बंधती नहीं। यह भेद ही मुक्ति का प्रवेश द्वार है। इसी भेद को जानने के लिए ही आदि शंकराचार्य ने विवेकचूडामणि रचा था। यही कारण है कि यह ग्रंथ ज्ञान का अलंकार नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाला प्रकाशस्तंभ है।
इस ग्रन्थ कि विशेषता यह है कि इसमें समाहित ज्ञान केवल साधकों या सन्यासियों के लिए नहीं है। गृहस्थ जीवन में, पारिवारिक संबंधों में, व्यवसाय की उठापटक में भी यह उतना ही उपयोगी है। जब कोई व्यापारी नुकसान झेलता है, जब कोई व्यक्ति अपने प्रिय के व्यवहार से व्यथित होता है, जब कोई प्रेमी बिछोह के बाद किसी अपने को खो देता है- तब यदि वह यह जान जाए कि यह अवस्था भी अनित्य है, तो उसके भीतर एक शांति व्याप्त होती है। यह शांति कोई नकारात्मक उदासीनता नहीं, बल्कि एक सजग स्वीकृति है। यह वैसी है जैसे एक संतुलित दृष्टि। जो रोते हुए भी जानती है कि आंसू बह जाएंगे, और हंसी आएगी और हंसते हुए भी जानती है कि यह आनंद भी अनित्य है।
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यह समत्व- यह भीतर की स्थिरता- केवल नित्यानित्य विवेक से ही आ सकती है। जब आप इस विवेक को अपने जीवन का अंग बना लेते हैं, तब किसी भी हानि से आपका आत्मस्वरूप डगमगाता नहीं। आप संबंधों में पूर्णता से रहते हैं, परंतु उनमें अपना अस्तित्व खोते नहीं। आप सफलता का आनंद लेते हैं, पर उससे अपनी पहचान नहीं बनाते। आप विफलता में दुखी होते हैं, पर उसमें अपनी आत्मा को लीन नहीं कर देते। यह साधना जब गहन हो जाती है, तब साधक हर पल में ब्रह्म को देखता है। उसे मालूम होता है कि जो कुछ भी बदल रहा है, वह ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, परन्तु ब्रह्म नहीं है। वह रचनात्मकता का खेल है, सत्य नहीं। इस अवस्था में जीना, जहां हर पल आत्मा से जुड़ाव है, और हर संबंध एक लहर की तरह आता-जाता है— यही योग है। यही जीवन की परिपक्वता है। और यही वह सरल, मौन क्रांति है जिसकी आज संसार को आवश्यकता है। एक ऐसी दृष्टि जो बाहरी दुनिया में रहते हुए भी भीतर अडोल रहे।
यह कोई बड़ा अनुष्ठान नहीं मांगती, कोई विशेष व्रत नहीं चाहती। केवल इतना चाहिए कि हर क्षण अपने अनुभवों से यह प्रश्न करें- क्या यह नित्य है? यदि नहीं, तो क्या हम इसे प्रेमपूर्वक जाने दे सकते हैं? और यदि हां, तो क्या हम इसे स्वीकार कर सकते हैं— बिना डगमगाए, बिना अपेक्षा के? यही साधना धीरे-धीरे हमारी चेतना को उस सत्य की ओर ले जाएगी जो न शब्दों में समाता है, न विचारों में। वह केवल मौन में प्रकट होता है- उसी मौन में जहां आत्मा ब्रह्म से मिलती है–और हम स्वयं से।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।