{"_id":"684a67fbac18a7652408b9a6","slug":"india-leads-in-population-despite-falling-fertility-rate-2025-06-12","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"India Population: प्रजनन दर गिरने के बावजूद भारत जनसंख्या में सबसे आगे","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
India Population: प्रजनन दर गिरने के बावजूद भारत जनसंख्या में सबसे आगे
सार
भारत की जनसांख्यिकीय विविधता उल्लेखनीय है, जहां बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों में प्रजनन दर अधिक है, वहीं केरल, तमिलनाडु और नई दिल्ली जैसे दक्षिणी क्षेत्रों में यह दर यूरोपीय देशों के समान निम्न है।
विज्ञापन
भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या।
- फोटो : Adobe Stock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की विश्व जनसंख्या स्थिति 2025 रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है द रियल फर्टिलिटी क्राइसिस (वास्तविक प्रजनन संकट), मंगलवार, 10 जून 2025 को जारी हुई। यह रिपोर्ट भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति पर महत्वपूर्ण जानकारी देती है।
विज्ञापन
इसके अनुसार, भारत की जनसंख्या 2025 में 1.46 अरब (146.39 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है, जिसके साथ भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बना रहेगा। भारत ने 2022 में ही चीन को जनसंख्या के मामले में पीछे छोड़ दिया था। साथ ही, देश की कुल प्रजनन दर (TFR) 1.9 बच्चों प्रति महिला तक गिर गई है, जो प्रतिस्थापन दर (2.1) से नीचे है।
विज्ञापन
भारत की जनसंख्या: 1.46 अरब का मील का पत्थर
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत की जनसंख्या, जो 2022 में ही चीन (1.411 अरब) को पीछे छोड़ 1.412 अरब हो गई थी, 2025 में 1.46 अरब तक पहुंच जाएगी। यह जनसंख्या 2060 के दशक में 1.7 अरब के शिखर पर पहुंचने के बाद धीरे-धीरे कम होने लगेगी। यह वृद्धि बड़ी संख्या में प्रजनन आयु की महिलाओं के कारण है, भले ही प्रजनन दर में कमी आई हो।
विज्ञापन
भारत की जनसांख्यिकीय विविधता उल्लेखनीय है, जहां बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों में प्रजनन दर अधिक है, वहीं केरल, तमिलनाडु और नई दिल्ली जैसे दक्षिणी क्षेत्रों में यह दर यूरोपीय देशों के समान निम्न है।
प्रजनन दर में ऐतिहासिक गिरावट
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर अब 1.9 बच्चे प्रति महिला है, जो प्रतिस्थापन दर 2.1 से कम है। यह 1970 के दशक के लगभग 5 बच्चों और 1960 के 6 बच्चों की तुलना में उल्लेखनीय कमी है। शिक्षा में सुधार, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच और गर्भनिरोधकों के उपयोग में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि, क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं। तमिलनाडु (1.4) और कर्नाटक (1.6) जैसे राज्यों में प्रजनन दर बहुत कम है, जबकि उत्तरी राज्यों में यह अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है।
वास्तविक प्रजनन संकट: प्रजनन स्वायत्तता की कमी
यूएनएफपीए की रिपोर्ट प्रजनन संकट को जनसंख्या वृद्धि या कमी के रूप में नहीं, बल्कि लाखों लोगों की अपनी इच्छित परिवार संख्या प्राप्त करने में असमर्थता के रूप में परिभाषित करती है। भारत में, 36% वयस्क अनचाहे गर्भधारण का सामना करते हैं, और 30% अपनी इच्छा के अनुसार अधिक या कम बच्चे पैदा करने में असमर्थ हैं।
गर्भनिरोध, सुरक्षित गर्भपात, मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और बांझपन उपचार तक सीमित पहुंच, साथ ही सामाजिक और लैंगिक मानदंड, इसके प्रमुख अवरोध हैं।
जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर
भारत की जनसंख्या युवा है, जिसमें 24% लोग 0-14 वर्ष, 17% 10-19 वर्ष और 26% 10-24 वर्ष के हैं। 68% जनसंख्या कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) में है, जो उचित रोजगार, शिक्षा और नीतिगत ढांचे के साथ जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान कर सकती है।
हालांकि, 7% बुजुर्ग जनसंख्या (65 वर्ष से अधिक) के बढ़ने की उम्मीद है, और जीवन प्रत्याशा पुरुषों के लिए 71 वर्ष और महिलाओं के लिए 74 वर्ष तक पहुंच गई है। जनसंख्या दोगुना होने का समय अब 79 वर्ष है, जो धीमी वृद्धि को दर्शाता है।
प्रगति के साथ बनी असमानताएं
भारत ने प्रजनन दर और मातृ मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। 1970 के दशक से, बेहतर प्रजनन स्वास्थ्य और शिक्षा ने लाखों जिंदगियां बचाई हैं। फिर भी, राज्यों, जातियों और आय समूहों में गहरी असमानताएं मौजूद हैं। ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुंच है। लैंगिक भेदभाव, बाल विवाह और असंतुलित लिंगानुपात चुनौतियां बनी हुई हैं।
UNFPA भारत की प्रतिनिधि, एंड्रिया एम. वोज्नर ने कहा, “भारत ने प्रजनन दर को कम करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन असमानताएं बनी हुई हैं। वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश तब मिलेगा जब हर व्यक्ति को सूचित प्रजनन विकल्प चुनने की स्वतंत्रता और साधन मिलें।”
भविष्य की चुनौतियां: तेजी से बढ़ती बुजुर्ग जनसंख्या
भारत तेजी से जनसांख्यिकीय परिवर्तन से गुजर रहा है। बुजुर्ग जनसंख्या 7% से बढ़कर 14% तक मात्र 28 वर्षों में दोगुनी हो जाएगी, जो फ्रांस (120 वर्ष) या स्वीडन (80 वर्ष) की तुलना में बहुत तेज है। 40% से अधिक बुजुर्ग सबसे गरीब आय वर्ग में हैं, जो स्वास्थ्य, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए चुनौतियां पेश करता है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत “धनी होने से पहले बूढ़ा” हो रहा है।
जनसंख्या नहीं, स्वायत्तता पर ध्यान
रिपोर्ट जनसंख्या वृद्धि या कमी के डर को खारिज करती है और प्रजनन स्वायत्तता को प्राथमिकता देने का आह्वान करती है। भारत में इसका मतलब है कि परिवार के आकार को प्रोत्साहित या हतोत्साहित करने वाली नीतियों से हटकर प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना।
गर्भनिरोध, सुरक्षित गर्भपात, मातृ स्वास्थ्य और बांझपन उपचार तक पहुंच बढ़ाने, बाल देखभाल, शिक्षा, आवास और कार्यस्थल लचीलापन में निवेश करने, अविवाहित व्यक्तियों, LGBTQIA+ समुदायों और हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए सेवाएं उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य साक्षरता बढ़ाने और सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने के लिए सामुदायिक पहल शुरू करने की आवश्यकता है। यह न केवल सामाजिक स्थिरता बल्कि आर्थिक समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण है।
जनसांख्यिकीय चुनौतियों का समाधान
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर और चुनौती दोनों प्रस्तुत करती है। 1.46 अरब की जनसंख्या और 1.9 की प्रजनन दर के साथ, भारत को अपनी युवा आबादी का लाभ उठाने और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को संतुलित करने की आवश्यकता है।
प्रजनन स्वायत्तता और समावेशी नीतियों पर ध्यान देकर, भारत न केवल अपनी जनसांख्यिकीय चुनौतियों का समाधान कर सकता है, बल्कि एक समृद्ध और समान भविष्य की ओर भी बढ़ सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।