नेहरू बनाम मोदी और चीन-5 :जब भारत की फौज ने चीनी चूहों के छक्के छुड़ा दिए
साल 1967 में, नाथु ला बार्डर पर भारत और चीन की सेनाओं में घातक टकराव हुआ. ठीक वैसा टकराव जैसे इन दिनों पूर्वी लद्दाख में चल रहा है. इस टकराव में भारतीय सेना ने 370 से ऊपर चीनी सैनिकों को उस खुदा के पास पहुंचाया जिसे वे नास्तिक कम्युनिस्ट मानते नहीं थे.
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विस्तार
अपने जिगरी दोस्त चीन से धोखोबाजी और फिर हार का सदमा नेहरू नहीं सह पाए। हार के दो साल बाद 27 मई 1964 को उनका देहान्त हो गया. नेहरू की मौत का जश्न चीन ने पांच महीने बाद परमाणु बम के परीक्षण का धमका करके मनाया.
भारत के लिए ये चिन्ता की बात थी. भारत की हार से दूसरे पड़ोसी दुश्मन पाकिस्तान के हौसले बुलंद हो गए. इससे पहले तक पाकिस्तान अमेरिका का चम्मच था और चीन से एक खास दूरी बना कर रखता था. अमेरिका ने चीन के खिलाफ जो ग्रुप बनाए थे उसमें पाकिस्तान भी एक सदस्य था. लेकिन भारत की घेराबंदी करने के लिए चीन को पाकिस्तान की जरूरत थी.
सो चीन ने कश्मीर पर पाकिस्तान को अपना समर्थन दे दिया. उसने पाकिस्तान के सामने एक डील रखी. वह डील ये थी कि पाकिस्तान उसे अक्साई चिन के पास काराकोरम इलाके में अपनी जमीन लीज पर दे दे. ये इलाका पीओके में था जिस पर एक तरह से भारत का ही मालिकाना हक था.
पाकिस्तान ने इस जमीन पर चीन को बसा दिया. नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री आए.1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान चीन फिर सक्रिय हो गया. भारत पर दोतरफा दबाव बनाने के लिए चीन ने सिक्किम सरहद पर मोर्चा खोल दिया.
चीन ने भारत को चेतावनी दी कि वह चीन-सिक्किम सीमा से अपने 56 सैनिक कैम्प पीछे हटा ले वर्ना अंजाम भुगतने को तैयार रहे. चीन की इस हेकड़ी का अमेरिका और रूस दोनों ने विरोध किया और कहा कि चीन भारत के लिए हालात और पेचीदा न बनाए.
शास्त्री ने भी चीन को चेतावनी दी कि वह हद में रहे. भारत ने कहीं सीमा का अतिक्रमण नहीं किया है. 23 सितम्बर 1967 को भारत-पाक युद्ध थम गया. नतरजतन पीकिंग रेडियो ने नाटकीय ढंग से ऐलान किया कि 'भारतीय सैनिक अपने कैम्प हटा कर पीछे चले गए हैं.' भारत के विदेश मंत्रालय ने इस कहानी को 'चीनी मस्तिष्क की उपज' बताया.
खैर भारत की असल चिन्ता चीन का परमाणु सम्पन्न देश होना था. परमाणु हमले से निपटने का एक ही तरीका है खुद परमाणु सम्पन्न देश बन जाओ. भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के निदेशक डा. होमी जहांगीर भाभा ने कहा- 'अगर जरूरत पड़ी तो आत्मरक्षा के लिए भारत भी परमाणु हथियार हासिल कर सकता है.'
देश में परमाणु परीक्षण का माहौल बनने लगा. लेकिन शास्त्रीजी ने साफ कहा दिया कि भारत गांधी-नेहरू के रास्ते पर चलेगा. हम परमाणु बम नहीं बनाएंगे. शास्त्रीजी की अचानक मौत के बाद इंदिरा 24 जनवरी 1966 में देश की तीसरी प्रधानमंत्री के पद की शपथ लेकर सत्ता में आईं।
फायरिंग इतनी जबरदस्त थी कि भारतीयों को अपने घायलों तक को उठाने का मौका नहीं मिला...
अगले ही साल 1967 में, नाथु ला बॉर्डर पर भारत और चीन की सेनाओं में घातक टकराव हुआ। ठीक वैसा टकराव जैसे इन दिनों पूर्वी लद्दाख में चल रहा है। इस टकराव में भारतीय सेना ने 370 से ऊपर चीनी सैनिकों को उस खुदा के पास पहुंचाया जिसे वे नास्तिक कम्युनिस्ट मानते नहीं थे।
इस झड़प में भारत के केवल 65 सैनिक शहीद हुए। उस समय नाथु ला में तैनात मेजर जनरल शेरू थपलियाल ने लिखा-, "नाथु ला में दोनों सेनाओं का दिन कथित सीमा पर गश्त के साथ शुरू होता था और इस दौरान दोनों देशों के फ़ौजियों के बीच कुछ न कुछ तू-तू मैं-मैं शुरू हो जाती थी।
चीन की तरफ़ से सिर्फ़ इनका राजनीतिक कमिशनर ही टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोल सकता था। उसकी पहचान थी कि उसकी टोपी पर एक लाल कपड़ा लगा रहता था। दोनों तरफ़ के सैनिक एक दूसरे से मात्र एक मीटर की दूरी पर खड़े रहते थे। वहांं पर एक नेहरू स्टोन हुआ करता था।
ये वही जगह थी जहांं से होकर जवाहर लाल नेहरू 1958 में ट्रेक करते हुए भूटान में दाखिल हुए थे। थोड़े दिनों बाद भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हो रही कहासुनी धक्का-मुक्की में बदल गई और 6 सितंबर, 1967 को भारतीय सैनिकों ने चीन के राजनीतिक कमिश्नर को धक्का देकर गिरा दिया, जिससे उसका चश्मा टूट गया." ('इंडियन डिफ़ेस रिव्यू' के 22 सितंबर, 2014 के अंक में प्रकाशित)
11 सितंबर को ठीक 7 बजकर 45 मिनट पर अचानक एक सीटी बजी और चीनियों ने भारतीय सैनिकों पर ऑटोमेटिक फ़ायर शुरू कर दिया। ले. कर्नल राय सिंह को तीन गोलियांं लगीं। उनके मेडिकल अफ़सर उन्हें खींचकर अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर ले गए। मिनटों में ही जितने भी भारतीय सैनिक खुले में खड़े थे या काम कर रहे थे, धराशायी कर दिए गए।
फ़ायरिंग इतनी ज़बरदस्त थी कि भारतीयों को अपने घायलों तक को उठाने का मौका नहीं मिला। हताहतों की संख्या इसलिए भी अधिक थी क्योंकि भारत के सभी सैनिक बाहर थे और वहांं आड़ लेने के लिए कोई जगह नहीं थी। जब सगत सिंह ने देखा कि चीनी असरदार फ़ायरिंग कर रहे हैं तो उन्होंने तोप से फ़ायरिंग का हुकुम दे दिया।
उस समय तोपख़ाने की फ़ायरिंग का हुक्म देने का अधिकार सिर्फ़ प्रधानमंत्री के पास था। यहांं तक कि सेनाध्यक्ष को भी ये फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं था। लेकिन जब ऊपर से कोई हुक्म नहीं आया और चीनी दबाव बढ़ने लगा तो जनरल सगत सिंह ने तोपों से फ़ायर खुलवा दिया। इससे चीन को बहुत नुकसान हुआ और उनके 300 से अधिक सैनिक मारे गए। (A Talent for War: The Military Biography of Lt Gen Sagat Singh Maj Gen Randhir Singh (Retd) page 234)
इंदिरा गांधी चीन की फितरत को समझती थीं...
1962 की लड़ाई में चीन के 740 सैनिक मारे गए थे। ये लड़ाई करीब एक महीने चली थी और इसका क्षेत्र लद्दाख़ से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ था। अगर हम मानेंं कि 1967 में मात्र तीन दिनों में चीनियों को 300 सैनिकों से हाथ धोना पड़ा, ये बहुत बड़ी संख्या थी।
इस लड़ाई के बाद काफ़ी हद तक 1962 का ख़ौफ़ निकल गया। भारतीय सैनिकों को पहली बार लगा कि चीनी भी हमारी तरह हैं और वो भी पिट सकते हैं और हार सकते हैं, तब इंदिरा ने सेना को तोपख़ाने की फ़ायरिंग का हुक्म क्यों नहीं दिया? ये बड़ा सवाल है।
मेजर जनरल रंधीर सिंह ने इसका जिक्र अपनी किताब में किया है। उनकी बात पर शक नहीं किया जा सकता, तब इंदिरा को प्रधानमंत्री बने एक साल ही हुआ था। लोहिया उन्हें 'गूंगी गुडिया' कहते थे, लेकिन जितना में इंदिरा को समझ पाया हूं उन्होंने इशारा जरूर दिया होगा क्योंकि इतना बड़ा कदम सेना खुद नहीं उठा सकती थी।
इंदिरा गांधी चीन की फितरत को समझती थीं। वह छह साल पहले चीनी पीएम चाऊ के साथ जाम टकरा चुकी थीं। वह चाऊ की धोखेबाजी भी करीब से देख चुकी थीं। उन्हें पता था कि चीन से अब कैसे डील करनी है। उन्होंने सोवियत रूस से करीबी बढ़ानी शुरू की क्योंकि तब रूस और चीन में सबंध अच्छे नहीं थे।
चीन का दुश्मन रहा अमेरिका भी उसके करीब आ रहा था। ये चौंकाने वाली घटना थी जिसने पूंजीवादी विरोधी कम्युनिस्ट विचारधारा के खोखलेपन को जगजाहिर कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को इंदिरा गांधी को वैसे भी पसंद नहीं थीं। वह उन्हें "धूर्त और दुष्ट औरत" समझता था.
निक्सन ने इंदिरा को चेतावनी दी थी कि वह बांग्लादेश के चक्कर में न रहें, लेकिन इंदिरा नहीं मानीं। चीन में एक महान योद्धा हुआ है सुन त्जु। युद्ध कला में उससे बड़ा विद्वान सारी दुनिया में नहीं हुआ। उसने एक किताब लिखी 'आर्ट ऑफ वॉर' यानी युद्ध की कला। ये किताब कम्युनिस्ट चीन की बाइबिल है कुरान और गीता भी.
इस किताब का हर वाक्य युद्ध लड़ने और जीतने की तरकीबे बताता है। सुन त्जु ने कहा था- 'अगर आप दुश्मन से दूर हैं तो उन्हें विश्वास दिलाइए कि आप उसके करीब हैं।' मुझे लगता है इसी तरकीब पर काम करते हुए 1967 में बुरी तरह पिटने के बाद माओ ने भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
15 अगस्त 1972 को इंदिरा ने लोकसभा में आधी रात की बैठक में वही बात कही जो इन दिनों मोदी अपने भाषणों में लगातार कह रहे हैं...
30 अप्रैल, 1970 का दिन था। अगले दिन यानी एक मई को मई दिवस था। मई दिवस समारोह की पूर्व संध्या पर, चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने सभी देशों के प्रमुख को आतिशबाजी देखने के लिए आमंत्रित किया। चूंकि चीन में कोई भारतीय राजदूत नहीं था, ब्रिजेश मिश्र (जो बाद में अटल के कार्यकाल में उनके प्रमुख सचिव व भारत के सुरक्षा सलाहाकार बने) समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
माओत्से तुंग ने सभी विदेशी मेहमानों के साथ हाथ मिलाया लेकिन जब वह ब्रिजेश मिश्रा का नम्बर आया तो माओ ने एक अप्रत्याशित संदेश दिया। माओ ने कहा-'भारत एक महान देश है। वह बरसों से चीन का दोस्त रहा है। उन्हें फिर दोस्त बन जाना चाहिए।'
माओ की इस पहल को भारत के कम्युनिस्टों ने माओ स्माइल यानी 'माओ मुस्कुराहट' का नाम दिया। मिश्रा ने तुरंत पीएमओ को फोन लगाया और ये जानकारी दी। वे बहुत उत्साहित थे। बाद में 2000 में छपे एक मौखिक इंटरव्यू में, मिश्रा ने कहा कि भारत ने माओ के इशारे का पूरा फायदा नहीं उठाया और उसे तुरंत पालन करना चाहिए था।
मिश्रा हमेशा यह मानते थे कि इंदिरा गांधी के इच्छुक होने के बावजूद पी.एन.हक्सर, (इंदिरा के शक्तिशाली प्रमुख सचिव) उन लोगों में से थे जिन्होंने माओ के इशारे पर चलने और चीन के साथ एक नया रिश्ता बनाने से रोका था। हालांकि हक्सर खुद एक काॅॅमरेड थे। कश्मीरी ब्राह्मण थे। इलाहाबाद से वकालत की थी, फिर कई मुल्कों में भारत के राजदूत रह चुके थे। उसूलों के पक्के इंसान थे।
दरअसल उस वक्त हक्सर और इंदिरा दोनों का पूरा फोकस पाकिस्तान को दो टुकडों में बांटना था। बांग्लादेश को अलग देश बना कर वे उसमें कामयाब भी हो गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन अपना सिर पिट रहे थे।
इस घटना के दो साल बाद आजादी के 25वीं सालगिरह पर 15 अगस्त 1972 को इंदिरा ने लोकसभा में आधी रात की बैठक में वही बात कही जो इन दिनों मोदी अपने भाषणों में लगातार कह रहे हैं। इंदिरा ने कहा था- 'भारत की नीति दोस्ती की रही है लेकिन किसी के आगे झुकने की नहीं रही है.' (इंदिरा गांधी इंडिया : द स्पीचेस ऑफ इंदिरा गांधी पेज 215)
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