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नेहरू बनाम मोदी और चीन-09: कूटनीतिक भोलापन और चीनी चाय

Dayashankar shukla दयाशंकर शुक्ल सागर
Updated Wed, 29 Jul 2020 02:05 PM IST
सार

  • ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर चीन ने 2015 के बाद भारत में वह मशीनें भेजनी शुरू कर दीं जिन पर प्रदूषण की वजह से न केवल अमेरिका व यूरोप बल्कि खुद चीन में प्रतिबंधित थीं।
  • भारत में चीन का कारोबार बदस्तूर फलता फूलता रहा।
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भारत-चीन की इस नई दोस्ती को हमारा विदेश मंत्रालय 'एशियाई शताब्दी" के रूप में देख रहा था- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तो जो हुआ अंदेशा उसी का था। चीन इतनी आसानी से पीछे हटने वाला नहीं है. लद्दाख सीमा पर वह अड़ियल घोड़े की तरह अड़ गया है।

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रक्षामंत्री ने कहा- चीन से वार्ता सफल होगी इसकी कोई गारंटी नहीं है, इसलिए वायुसेना हर वक्त तैयार रहे। यानी तलाक के बाद अब हाथा पाई की भी नौबत आ सकती है। चलिए अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हैं ताकि आप समझें कि आखिर से नौबत आई क्यों?
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‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर चीन ने 2015 के बाद भारत में वह मशीनें भेजनी शुरू कर दीं जिन पर प्रदूषण की वजह से न केवल अमेरिका व यूरोप बल्कि खुद चीन में प्रतिबंधित थीं। ये मशीनें चीन के लिए कबाड़ से ज्यादा कुछ नहीं थीं। ऐसी मशीनें भी भारत सस्ते दामों पर खरीद रहा था।
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कुछ पर्यावरणविदों ने इसके खिलाफ आवाज उठाया तो चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने दो टूक छापा कि "भारतीयों को सेकेंड हैंड मशीनों को लेकर बहुत ज़्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि विकासशील देश की औद्योगिक क्षमताएंं ऐसे ही बढ़ती हैं।" तब ‘मेक इन इंडिया’ का गुणगान कर रहा हिंदी मीडिया ये सब खबरें नहीं छाप रहा था।

भारत-चीन की इस नई दोस्ती को हमारा विदेश मंत्रालय 'एशियाई शताब्दी" के रूप में देख रहा था। भारत के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर आज भी आपको इस 'अमर दोस्ती' के लेख मिल जाएंगे। देखते-देखते एशिया की दो उभरती ताकतों भारत और चीन की दोस्ती ने बाकायदा 'एबीसीडी' की एक नई वर्णमाला तैयार कर दी।

इसका मतलब था ‘ए’ फॉर एशिया, ‘बी’ फॉर बिजनेस, ‘सी’ फॉर कल्चर और ‘डी’ फॉर डिप्लोमेसी और डेवलपमेंट। सुनने में यह फॉर्मूला बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन जो चीन का इतिहास जानते हैं, वे अंदाजा लगा सकते हैं कि यह वर्णमाला कितनी घातक साबित हो सकती है।

भारत ने चीनी राष्ट्रपति के सामने यह मुद्दा उठाया लेकिन...

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पीएम मोदी ने कहा कि भारत और चीन विश्व शांति के लिए अहम भूमिका निभा सकते हैं- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

इसी कड़ी में सितम्बर 2014 को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग मोदी के निमंत्रण पर अहमदाबाद पहुंचे, जिस तरह से मोदी ने उनकी आगवानी की, उससे साफ हो गया था कि चीन को लेकर मोदी नेहरू का राह पर आगे जाएंगे। इस यात्रा के दौरान कैलाश मानसरोवर यात्रा के नए मार्ग और रेलवे में सहयोग समेत12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

इसके अलावा दोनों देशों ने क्षेत्रीय मुद्दों और चीन के औद्योगिक पार्क से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन चालाक चीन अपनी धूर्त चालें चल रहा था। इसी दौरान चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के करीब 1000 जवान पहाड़ी से जम्मू कश्मीर के चुमार क्षेत्र में घुस आए।

भारत ने चीनी राष्ट्रपति के सामने यह मुद्दा उठाया, लेकिन अपनी तरफ से वार्ता में कोई खलल नहीं पड़ने दिया। 18 जून साल 2017 को डोकलाम पर सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर से दोनों देशों के बीच तनाव शुरू हुआ और यह लगभग 73 दिनों तक चला, लेकिन इससे भी किसी ने सबक नहीं लिया।

भारत में चीन का कारोबार बदस्तूर फलता फूलता रहा। दोस्ती के झूले आसमान छू रहे थे। डोकलाम को अभी एक साल पूरा नहीं हुआ कि मोदी का चीन का एक नया दौरा बन गया। 27 अप्रैल 2018 में मोदी अपने दो दिन के दौरे पर चीन के उस वुहान शहर में पहुंचे, जहां से इस मुलाकात के एक साल बाद दुनिया में कोरोना की शुरूआत हुई।

सत्ता में आने के बाद ये मोदी की चौथी चीन यात्रा थी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उनकी अगवानी करने पेचिंग से वुहान पहुंच गए। रंगारंग कार्यक्रम हुए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल भी उनके साथ थे। पीएम मोदी ने कहा कि भारत और चीन विश्व शांति के लिए अहम भूमिका निभा सकते हैं।

मोदी ने वहां कहा- 'ये भारतीयों के लिए गर्व की बात है। मैं भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री हूं जिसकी अगवानी के लिए आप (शी जिनपिंग) दो-दो बार राजधानी से बाहर आए हैं। " पीएम ने कहा कि 'यह भारत के प्रति आपका प्यार और सम्मान दर्शाता है।'

भारत का बयान चीन से दो सौ शब्द ज्यादा था...

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शी जिनपिंग से मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पुराने दिन भी याद किए- फाइल फोटो - फोटो : AFP

अब लग रहा है शी जिनपिंग तब सोच रहे होंगे 'पूरब देस से आया ये भारतीय मेहमान कितना भोला और मासूम है।" शी जिनपिंग से मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पुराने दिन भी याद किए। उन्होंने कहा, 'जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था, तब मुझे वुहान आने का गौरव प्राप्त हुआ था।

मैंने यहां के बांध के बारे में बहुत सुना था, जिस स्पीड से आपने (शी जिनपिंग) इस बांध का निर्माण कराया, उसने मुझे प्रेरित किया। मैं तब यहां एक स्टडी टूर पर आया था और उस बांध पर एक पूरा दिन बिताया।

दोनों नेताओं ने उस चर्चित ईस्ट लेक के किनारे डिनर किया जो कभी चीन के क्रांतिकारी नेता माओत्से तुंग का पसंदीदा पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। दोनों नेता झील के किनारे काफी देर टहलते रहे। दोनों ने बोट में यात्रा की, साथ में चीनी चाय की सिप ली। ये सब एक तरह का "कूटनीतिक हनीमून" जैसा था।

देखा जाए तो मोदी की इस यात्रा से भारत को कुछ नहीं हासिल हुआ। कुल मिलाकर यह यात्रा निरर्थक रही। किसी विवाद पर कोई बात नहीं हुई। न सीमा पर, न डोकलाम पर, न तिब्बत पर, न व्यापारिक असंतुलन पर, न परमाणु सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता पर, न मसूद अजहर के आतंकी होने की घोषणा किए जाने पर शायद इसीलिए कोई औपचारिक संयुक्त वक्तव्य तक जारी नहीं हुआ।

मजे की बात यह कि शी और मोदी ने अकेले में कई बार बात की। उनके साथ कोई भी अफसर नहीं था। डोभाल साहब भी नहीं। दोनों तरफ दुभाषिए जरूर थे, क्योंकि शायद शी को अंग्रेजी नहीं आती और मोदी को चीनी,  बाद में दोनों देशों ने अलग-अलग बहुत छोटे से कोई (एक हजार शब्दों से भी कम) बयान जारी किए।

भारत का बयान चीन से दो सौ शब्द ज्यादा था। दोनों बयानों को पढ़कर आप ये नतीजा निकाल सकते हैं कि अब वह दिन दूर नहीं कि भारत-चीन फिर भाई-भाई होंगे और दोनों देशों के संबंध अब सातवें आसमान पर पहुंचने वाले हैं।

भारत-चीन सीमा विवाद अब पुरानी बात हो गई। ये अध्याय अब हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। वैसे भी तरक्की कर चुके चीन को अब उस जमीन की क्या जरूरत जिसे खुद नेहरू र्निजन, बंजर और बिना किसी काम की मानते थे।

तय हुआ कि दोनों देश आतंकवाद से मिलकर लड़ेंगे, सीमा पर मुठभेड़ नहीं होगी, व्यापार और निवेश बढ़ेगा, दोनों की फौजें आपसी संपर्क बढ़ाएंगी, दोनों महान नेता बार-बार मिलते रहेंगे वगैरह वगैरह। हां शी ने नेहरू और चाउ के पंचशील का जिक्र जरूर किया, लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि चाऊ ने नेहरू को धोखा कैसे दिया था। इस यात्रा को 'वुहान स्पिरीट' का नाम दिया गया।

जारी...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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