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चीन विवाद और कांग्रेस : जब ममता, मायावती, शरद पवार और स्टालिन समझ सकते हैं तो राहुल गांधी क्यों नहीं?

Tue, 23 Jun 2020 05:20 PM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Tue, 23 Jun 2020 05:20 PM IST
सार

  • राहुल गांधी और  सोनिया गांधी जनभावनाओं और जमीनी सच्चाई से अभी भी पूरी तरह कटे हुए हैं।
  • कांग्रेस जनभावनाओं के उलट केवल मोदी के विरुद्ध अपने नफरती एजेंडे पर आकर टिक गई है।
  • सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और पुलवामा पर जिस अंदाज में राहुल ने सवाल उठाए उन्हें देश की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया।
  •  

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चीन विवाद को लेकर राहुल गांधी के बयान कांग्रेस को कमजोर कर रहे हैं। - फोटो : PTI

विस्तार

राहुल गांधी कांग्रेस के लिए तब तक अपरिहार्य राजनीतिक समस्या बने रहेंगे जब तक वे संसदीय राजनीति में सक्रिय रहेंगे। उनके बिना देश की स्वाभाविक शासक पार्टी का कोई भी विमर्श पूरा नही हो सकता है क्योंकि उनकी अमोघ शक्ति है उनका उपनाम।

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कांग्रेस के इतिहास में राहुल गांधी सबसे नाकाम गांधी हैंं लेकिन इसके बावजद यह ऐतिहासिक पार्टी इस अनमने नेता के परकोटे से बाहर नहींं आना चाहती है। चीन के साथ ताजा गतिरोध को लेकर राहुल औऱ उनकी मां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भूमिका ने एक बार फिर यह प्रमाणित कर दिया है की पार्टी के शिखर पर राष्ट्रीय हितों और भारत के जनमन को समझने की बुनियादी समझ खत्म हो गई है।
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इस मामले पर बुलाई सर्वदलीय बैठक में जिस तरह शरद पंवार, उद्धव ठाकरे, स्टालिन, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मायावती, रामगोपाल यादव, सरीखे नेताओं ने टीम इंडिया की तरह एकजुटता दिखाते हुए देश दुनिया को सुस्पष्ट सन्देश दिया वह सामयिक तो था ही आम देशवासियों की भावनाओं को भी अभिव्यक्त करता है।
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सवाल यह उठेगा ही कि राहुल गांधी और  सोनिया गांधी जनभावनाओं और जमीनी सच्चाई से अभी भी पूरी तरह कटे हुए हैं? या गांधी परिवार मोदी के विरूद्ध अपनी निजी दुश्मनी को भुनाने के लोभ में राष्ट्रीय हितों को भी अनदेखा करने से नही चुकता है।

जिस सर्वदलीय बैठक में देश की सभी पार्टियों ने एक स्वर में सरकार के माध्यम से भारतीयता को मुखर किया उसके बाद समझा जा रहा था कि कांग्रेस अपने रुख में बदलाव लाएगी। लेकिन राहुल गांधी ने फिर एक ट्वीट कर प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लिया उन्होंने इस बार सवाल पूछने की जगह मोदी को आत्मसमर्पित नेता के रूप में तंज कसा।

सवाल पूछना लोकतंत्र का आभूषण है, लेकिन यह राष्ट्रीय हितों से ऊपर नहींं हो सकता है देश के रक्षा मंत्री रहे शरद पवार 1962 के बाद शांति बहाली दल के जिम्मेदार सदस्य रहे हैंं उन्होंने जो कुछ कहा उसे समझने की जगह राहुल गांधी चीनी प्रोपेगेंडा टीम के सदस्य की तरह व्यवहार करके कांग्रेस की विश्वनीयता को ही कमजोर कर रहे हैंं।

यह ध्यान देने वाली बात है कि राहुल और सोनिया के रुख से विपक्ष में भी यह पार्टी अलग-थलग पड़ती जा रही है। तमिलनाडु, बंगाल,महाराष्ट्र, यूपी ओडीसा जैसे राज्यो में जिन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ उसका एलायंस है वे भी चीन के मुद्दे पर कांग्रेस की भूमिका को खारिज कर प्रधानमंत्री मोदी के साथ मजबूती से खड़ी है।

सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और पुलवामा पर जिस अंदाज में राहुल ने सवाल उठाए उन्हें देश की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया...

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राहुल गांधी के ट्वीट सनसनी तो फैला रहे हैं लेकिन पार्टी को जनता से दूर कर रहे हैं। - फोटो : PTI

इसका मतलब यही है कि कांग्रेस जनभावनाओं के उलट केवल मोदी के विरुद्ध अपने नफरती एजेंडे पर आकर टिक गई है। यह संसदीय राजनीति के भारतीय हितों के लिए दुःखद इसलिए भी है क्योंकि कांग्रेस ने इस देश राजनीति और शासन को 60 वर्षों तक चलाया है।

तथ्य यह भी है कांग्रेस परिवार और उसकी सल्तनत से आगे की समझ गंवा बैठी है उसके लिए लोकतंत्र का मतलब केवल पार्टी और परिवार का प्रभुत्व ही है इसलिए गैर कांग्रेसी दल और सरकार उसे स्वीकार नहींं है। कारगिल युद्ध के दौरान भी जब अटल जी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी तब भी कांग्रेस ने उसका बहिष्कार किया था।

क्योंकि उसके थिंक टैंक को लगता है कि देश की सत्ता पर स्वाभाविक दावा केवल एक ही परिवार का है और फिर मोदी ने जिस अखिल भारतीय स्वीकार्यता के साथ परिवार के प्रभुत्व को जमीदोज किया है उसने एक अंतहीन औऱ विवेकहीन प्रतिशोध से पार्टी नेतृत्व को भर दिया है।

वामपन्थी मानसिकता वाले सलाहकारों ने इस पार्टी के मन मस्तिष्क में यह सुस्थापित कर दिया है कि जब तक मोदी का मानमर्दन नहींं होगा तब तक उसके पुराने दिन नहींं लौट सकते हैंं। यही कारण है कि हर मसले की महत्ता को समझे बगैर मां-बेटे की तोप मोदी की तरफ गरजने लगती है।

सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और पुलवामा पर जिस अंदाज में राहुल ने सवाल उठाए उन्हें देश की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया और अब चीन के मुद्दे पर भी देश की जनभावनाओं को समझने के स्थान पर राहुल सोनिया प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर रहे है।

सवाल यही है कि देश के मिजाज को जब ममता, मायावती, शरद, स्टालिन समझ सकते हैंं तो सबसे पुरानी पार्टी के सलाहकारों को यह समझ क्यों नही आ रहा है। इसका एक सुस्थापित पक्ष अब यह भी है कि राहुल गांधी को न भारत की समझ है न कांग्रेस इतिहास और न ही शासन की।

मोदी और जिनपिंग की शिष्टाचार भेंटों और झूला झुलाने पर सवाल खड़ा करने से पहले कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि...

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सोनिया-राहुल गांधी क्या सलाहकारों को बदल पाएंगे ? - फोटो : PTI

वह अपनी ही समझ के उन सलाहकारों से घिरे हैंं जिन्हें मोदी और संघ से निजी नफरत है और वे केवल वातानुकूलित माहौल में इंकलाबी प्रलाप के सिद्धहस्त हैंं। शेष नेता पर्सनेलिटी कल्ट से पैदा हुए हैं इसलिए वे चाहकर भी मां-बेटे के नेतृत्व को झेलने के लिए विवश हैंं।

राहुल गांधी के सवाल पूछने पर किसी को आपत्ति नहींं होना चाहिए, लेकिन क्या जो सवाल राहुल और उनकी पार्टी से चीन को लेकर पूछे जा रहे हैंं उनका जवाब भी इस स्वाभाविक शासक दल को नहींं देना चाहिए? क्या राहुल उस समझौते का ड्राफ्ट देश को बताने के लिए तैयार हैंं जिसे 2008 में उन्होंने अपनी मां की मौजूदगी में जिनपिंग के साथ साइन किया था।

मोदी और जिनपिंग की शिष्टाचार भेंटों और झूला झुलाने पर सवाल खड़ा करने से पहले कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि जब डोकलाम में भारत और चीन के बीच गलवान जैसी स्थिति थी तब राहुल गांधी चीनी राजदूत के साथ क्या गुप्तगू कर रहे थे?

क्यों लोकसभा में उसके नेता अधीर रंजन की चीनी निंदा को पार्टी ने उनकी निजी राय बताया था। राहुल अगर मोदी को चीन के आगे आत्मसमर्पित पीएम निरूपित कर रहे हैंं तो उन्हें अपने नाना का इतिहास भी अपने सलाहकारों से मंगवाना चाहिए।

तथ्य यह है कि परिवार को देश के प्रधानमंत्री पर भरोसा नहींं है वह तभी पीएम को अधिमान्यता देता है जब या तो परिवार का कोई सदस्य पीएमओ में हो या फिर डॉ मनमोहन सिंह जैसा। यही कांग्रेस का बुनियादी संकट है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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