इंडिया गठबंधन: पहले ही ‘फरमान’ पर उठे सवाल, एंकरों की सूची जारी करने पर विवाद गहराया
इंडिया गठबंधन की प्रेस विज्ञप्ति में जिन 14 एंकरों के नाम हैं, क्या सिर्फ वही इस पूरी स्थिति के मुख्य ‘आरोपी’ हैं या वे सिर्फ इसके प्रतिनिधि मात्र हैं? क्या तथाकथित गोदी मीडिया का जो नैरेटिव पिछले नौ सालों से चलता आ रहा है, उसके पीछे सिर्फ कुछ चेहरे मात्र हैं?
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विपक्षी गठबंधन इंडिया ने जब से 14 टीवी एंकरों के कार्यक्रमों में अपने प्रवक्ता को न भेजने और उनका बहिष्कार करने का ऐलान किया है, मीडिया के तमाम मंचों पर इसे लेकर अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या खबरिया चैनलों के मौजूदा स्वरूप या टीवी बहसों में विपक्ष के प्रवक्ताओं पर एंकर के आक्रामक तरीके से हावी होने के पीछे सिर्फ ये चेहरे जिम्मेदार हैं या फिर उनके पीछे कोई अप्रत्यक्ष दबाव रहता है?
इंडिया गठबंधन की प्रेस विज्ञप्ति में जिन 14 एंकरों के नाम हैं, क्या सिर्फ वही इस पूरी स्थिति के मुख्य ‘आरोपी’ हैं या वे सिर्फ इसके प्रतिनिधि मात्र हैं? क्या तथाकथित गोदी मीडिया का जो नैरेटिव पिछले नौ सालों से चलता आ रहा है, उसके पीछे सिर्फ कुछ चेहरे मात्र हैं?
न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) ने इंडिया गठबंधन के इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसकी तुलना इमरजेंसी के दौर से की है और कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया की दुहाई देने वाले इन दलों का यह फैसला क्या लोकतंत्र और पत्रकारों के सवाल उठाने के अधिकार के खिलाफ नहीं है।
इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा ने भी अपने ट्वीट और अपने कार्यक्रम में गठबंधन की ओर से किए गए इस फैसले को वापस लेने की अपील की है और कहा है कि टीवी एंकर्स अपने डीबेट शो के जरिये अपना काम कर रहे हैं और उनके करोड़ों दर्शक उनके साथ हैं।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त का भी मानना है कि इंडिया गठबंधन की ओर से एंकरों की सूची जारी कर उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार करने का फैसला हड़बड़ी में लिया गया फैसला है, लेकिन जयशंकर गुप्त ये सवाल भी उठाते हैं कि आखिर तमाम चैनलों ने लंबे समय से सरकार पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक विश्लेषकों को बुलाने पर रोक क्यों लगा रखी है? वह कहते हैं कि कुछ समय पहले तक सत्ताधारी पार्टी ने भी तो एक चैनल का बहिष्कार कर रखा था और अपना कोई प्रतिनिधि किसी भी डिबेट शो में नहीं भेजते थे। अभी भी एक चैनल के एक मुखर एंकर के डिबेट शो में यह पार्टी अपना प्रतिनिधि या प्रवक्ता नहीं भेजती। उनका कहना है कि विपक्षी गठबंधन को इन चौदह एंकर्स की सूची जारी करने को सही या गलत कहने से पहले यह भी समझना जरूरी है कि दरअसल एंकर्स का रिंग मास्टर कोई और होता है जो सत्ता की गोद में बैठा होता है।
विपक्षी गठबंधन के फैसले को लेकर प्रतिक्रिया
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा भी विपक्षी गठबंधन के इस फैसले को सही नहीं मानते लेकिन वह उन चैनलों के एंकर और मालिकानों पर सवाल भी उठाते हैं कि जिस तरह सरकार से सवाल पूछने के बजाय एंकर्स विपक्ष पर एकतरफा तरीके से सवाल पूछते हैं और उन्हें अपनी बात तक कहने का मौका नहीं देते, उसे पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता।
दरअसल एंकर तो महज एक चेहरा है। बेहतर होता कि गठबंधन के नेता एंकरों की सूची जारी करने से पहले उन चैनलों के प्रबंधन को पत्र लिखकर अपनी बात रखते या अपनी आपत्ति दर्ज कराते। कुछ एंकरों की सूची जारी कर वो खुद कटघरे में खड़े हो गए हैं। यह जो भी स्थिति पैदा हुई है, बेशक वह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
एडिटर्स गिल्ड के प्रमुख सदस्य भारत भूषण फिलहाल मणिपुर पर जारी अपनी रिपोर्ट की वजह से अदालती दांवपेंच में उलझे हैं, एडिटर्स गिल्ड के चार सदस्यों (सीमा मुस्तफा, सीमा गुआ, भारत भूषण और दीपक कपूर) के खिलाफ मणिपुर हिंसा पर दी गई रिपोर्ट को लेकर एफआईआर दर्ज की गई है। लेकिन वह भी कमोबेश यही राय रखते हैं कि विपक्षी गठबंधन को चंद एंकरों की सूची जारी करने के बजाय चैनलों के प्रबंधन और उनकी नीतियो पर सवाल उठाना चाहिए।
इस बारे में वह अपना विश्लेषण जल्दी ही विस्तार से लिखने वाले हैं। बेशक एडिटर्स गिल्ड के कुछ सदस्यों की राय में डिबेट शो में एंकर का हावी होना, विपक्ष पर आक्रामक होना, उन्हें बोलने न देना उचित नहीं है। इसके कारण चाहे जो हों, लेकिन मीडिया के गिरते स्तर के लिए ये स्थितियां जिम्मेदार हैं।
गौरतलब है कि ‘इंडिया’ गठबंधन की मुंबई बैठक के दौरान भी प्रेस वार्ता के दौरान जिस तरह अलग से राहुल गांधी, लालू यादव समेत कई नेताओं ने मीडिया से कहा था कि हम जानते हैं कि आप पर बहुत दबाव है, लेकिन आपको सच का साथ देना चाहिए और गठबंधन सरकार बनते ही मीडिया दबावमुक्त हो जाएगा और खुलकर अपना काम करेगा।
राहुल गांधी भी कई बार अपनी सभाओं और कार्यक्रमों में मीडिया की स्थिति पर बोला है और मीडियाकर्मियों को सच का साथ देने की अपील की है। पर जिस तरह गठबंधन की समन्वय समिति की शुरुआती बैठक में ही इस तरह का फैसला लेकर मीडिया को लेकर तैयार की जा रही ‘इंडिया’ की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं और इसके शीर्ष नेताओं पर यह जबाव पड़ने लगा है कि वह ऐसे फैसले को वापस लें अन्यथा आने वाले चुनाव में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
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