अमृत महोत्सव वर्ष: आध्यात्मिक परंपरा को जागृत करने वाली महान विभूतियों को याद करने का समय
भारत आजाद हुआ 15 अगस्त 1947 को संयोग से यह तिथि महर्षि अरविंद का पचहतरवां जन्म दिन था और आज जब भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तो महर्षि अरविंद का 150वां साल भी इसी साल पूरा हो रहा है।
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विस्तार
भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में सन् 1893 का साल कई दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है। सन् 1893 में स्वामी विवेकानंद जी का शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण, महर्षि अरविंद का इंग्लैण्ड से भारत वापसी, महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका प्रस्थान और एनी बेसेंट का भारत आगमन। इन चारों विभूतियों में एक सामान्य बात यह है कि ये भारत की सुप्त आध्यात्मिक परंपरा को जागृत कर विश्व को एक नई सभ्यता-संस्कृति से परिचित कराना चाहते थे, ताकि भारत समेत दुनिया को पश्चिम की पतनशील सभ्यता-संस्कृति से मुक्ति की राह मिल सके।
स्वामी विवेकानंद दुनिया को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि दूसरे देशों में समन्वय वालात् लाने का प्रयत्न किया गया. अर्थात किसी एक ही जाति की संस्कृति को शेष अन्य जातियों पर लादकर। उसके परिणाम स्वरूप एक अल्पकालिक शांतिपूर्ण जीवन की उत्पत्ति हुई और फिर विघटन हो गया।
इसके विपरीत भारत में समस्या जितनी विराट रही, पर्यटन उतना ही सौजन्यपूर्ण रहा और अति प्राचीनकाल से ही विभिन्न समुदायों के रीतिरिवाजों और विशेषकर धर्मों के प्रति सहिष्णुता बरती गई। परिणाम यह हुआ कि अभेद प्रतीत होने वाले दुर्ग भी ढ़हकर खंडहर हो गए, उदाहरण हैं- यूनान,रोम और नार्मन लोग।
महर्षि अरविंद की भी यही राय थी कि भारत अपने अतीत के उदघाटन में अपने भविष्य की आशा देखता है। मानव प्रगति के अगले महान कर्म में भौतिक नहीं, आधात्मिक, नैतिक और अतीन्द्रिय विकास करना है, और इसके लिए स्वतंत्र एशिया तथा उसके अंतर्गत स्वतंत्र भारत को अगुवा होना चाहिए। यहां ध्यान देना जरूरी है कि महर्षि अरविंद की यह घोषणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दिनों की है।
महर्षि अरविंद का 150वां जन्मदिवस
भारत आजाद हुआ 15 अगस्त 1947 को, संयोग से यह तिथि महर्षि अरविंद का 75वां जन्म दिन था, और आज जब भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, तो महर्षि अरविंद का 150वां साल भी इसी साल पूरा हो रहा है।
15 अगस्त 1947 को अपने रेडियो संदेश में महर्षि अरविंद घोषणा करते हैं कि यह दिन उनके लिए प्राचीन युग की समाप्ति तथा नए युग के सूत्रपात की निशानी है। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हम अपने जीवन और क्रियाओं से इस दिन को मानवता के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आधात्मिक भविष्य तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए एक नए युग के शुभारंभ का महत्वपूर्ण दिन बना सकते है।
महर्षि अरविंद के क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन की आयु कम ही रही है।अलीपुर षडयंत्र मामले में जेल से रिहा होने के बाद 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा के ऐतिहासिक भाषण के बाद उन्हें पहले चंदरपुर और फिर पांडिचेरी जाने का दैवीय आदेश प्राप्त होता है, जो जीवन लीला समाप्ति तक उनकी आधात्मिक और रचनात्मक गतिविधियों का केंद्र रहा। उनकी यह लीला 5 दिसंबर 1950 को पूरी हुई।
यूरोपीय सभ्यता के चमकदार सितारे उनीसवीं सदी के अंतिम दशक तक बिल्कुल धूमिल होने लगे थे। इस तथ्य को पश्चिम के विद्वान भी रेखांकित करने लगे थे। सन् 1891 में मैडम एच पी बलावत्स्की ने 'सभ्यता कला और सौंदर्य की मृत्यु' शीर्षक से लिखे एक लेख, जो उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पूर्व लिखा था, उसमें कहा कि- घिनौने कोढ़ की तरह हमारी सभ्यता पूरे विश्व को चारों ओर से खाती चली जा रही है। उसने मनुष्य के ह्रदय को पत्थर बना दिया है। वह शब्दों से परे स्वार्थी, लोलुप और पाशविक हो चुकी है।
यूरोपीय सभ्यता की पतनशीलता की यह भविष्यवाणी फ़ारसी के मशहूर शायर अल्मा इकबाल के एक शेर में भी बयां किया गया है। सन् 1907 में वे पश्चिम को स्पष्ट चेतावनी देते हैं-
तुम्हारी तहज़ीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करेगी
जो शाखे नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायेदार होगा।।
इस चेतना से सम्पन्न एनी बेसेंट सन् 1893 में भारत आई। सन् 1902 में उन्होंने ब्रिटिश शासन को लिखा कि
विश्व की रक्षा जिस आधात्मिकता से संभव है, उस आध्यात्मिकता के अभिभावक भारत को स्वतंत्र करना अनिवार्य है।
मद्रास में होम रूल की स्थापना
भारत की स्वतंत्रता को उन्होंने अपनी मातृभूमि आयरलैंड के प्रश्न के साथ भी जोड़ा। भारत में एनी बेसेंट ने लोकमान्य तिलक के साथ होमरूल आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, पर वे उग्रवाद को क्रांतिकारियों से अलग रखना चाहती थीं। सन् 1913 में बेसेंट ने मद्रास में होम रूल की स्थापना किया।
जवाहरलाल नेहरू होमरूल लीग के इलाहाबाद के सचिव थे। हालांकि एनी बेसेंट ने महात्मा गांधी के असहयोग और खिलाफत आंदोलन का विरोध किया। अलीपुर षडयंत्र मामले से रिहा होने के बाद महर्षि अरविंद ने भी होमरूल आंदोलन में सक्रिय होने का मन बनाया था। इसका मतलब यह होता कि अपने अब तक किए कामों से पलायन। वजह यह कि होमरूल आंदोलन का कुल पर्यटन यह था कि अंग्रेज भारतीयों के साथ उदार व्यवहार करें।
भारत में शिक्षा और विशेषकर नारी शिक्षा के प्रति एनी बेसेंट के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।महमना पंडित मदान मोहन मालवीय और एनी बेसेंट के सफल प्रयास से ही सेंट्रल हिन्दू कॉलेज और काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के मंदिर का सपना साकार हुआ।
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका जाने के पहले इंग्लैंड से वकालत की शिक्षा पूरी कर भारत लौट चुके थे। इंग्लैंड प्रवास के दौरान वे यूरोपीय सभ्यता के खामियों से खासा परिचत हो चुके थे। दक्षिण अफ्रीका से भारतीयों की दुर्दशा पर अपना प्रतिवेदन पेश करने के लिए वे फिर लंदन की यात्रा पर जाते हैं। लंदन से लौटते हुए समुद्री जहाज में उनके विचारों का बीज रूप 'हिन्द स्वराज' के रूप में सामने आता है।
यह पुस्तिका है तो पाठक-सम्पादक संवाद के रूप में, पर वार्ताकार स्वयं महात्मा गांधी और उनके मित्र प्राण जीवन मेहता है। यह पुस्तिका दरअसल यूरोपीय सभ्यता के परिरोध में नव सभ्यता विरोध का आगाज़ है। गांधी जी अपने इस यात्रा के दौरान विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व में भारतीय विद्यार्थियों के हिंसात्मक आंदोलन से भी परिचित हो चुके थे।
दक्षिण अफ्रीका में 11 सितम्बर 1906 को जोहान्सबर्ग के जुइश इम्पीरियल थियेटर ग्राउंड से जिस सत्याग्रह के मंत्र की खोज किया, उस मंत्र को ही भारत की आजादी के लिए इस्तेमाल किया। सत्याग्रह के साथ उनका प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों की मुक्ति भले साधन बना। पर यह मंत्र ही भारत की आजादी के बाद उनके मृत्यु का कारण बना।
आजादी का अमृत महोत्सव
भारत की आजादी के इस अमृत महोत्सव के अवसर पर इन विभूतियों के योगदान पर चर्चा से एक बात स्पष्ट है कि भारत को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति भले मिली हो, पर जैसा स्वामी विवेकानंद ने भविष्यवाणी की थी कि, अगर भारत सामाजिक और राजनीतिक मामलों में फंसा रहा, तो उसका सर्वथा नाश हो जाएगा। आधात्मिक और धार्मिक उन्नयन के द्वारा ही भारत की यश और कृति दुनिया में फैल सकती है। इसमें इतना और जोड़ने की जरूत है कि, यह राह ही भारत को विश्व गुरु के सिंहासन पर विराजमान करेगा।
आज देश का दुर्भाग्य है कि जिस महर्षि अरविंद ने अपने 15 अगस्त 1947 के संदेश में रेखांकित किया कि हिंदुओं और मुसलमानों के रूप में प्राचीन सम्प्रदायिक वर्गीकरण अब देश के राजनीतिक विभाजन के रूप में सुदृढ़ होता प्रतीत हो रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस निश्चित तथ्य को हमेशा के लिए निश्चित अथवा कुछ अधिक के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह स्थिति जारी रही तो भारत गंभीर रूप से कमजोर अथवा विकलांग हो जाएगा। भारत का आंतरिक विकास और प्रगति बाधित होगी। जनता में फूट एक और आक्रमण या विदेशी की आशंका बनी रहेगी।
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