स्वतंत्रता दिवस विशेष: टूरिया जंगल सत्याग्रह और आदिवासी महिलाओं की शहादत
आम धारणा है कि स्वतंत्रता आंदोलन में पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय शहरी लोगों ने ही योगदान किया है। ग्रामीणजनों की भागीदारी की बात तो एक बार दबे स्वर में स्वीकार कर भी ली जाती है लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में सुदूर जंगलों में रहने वाले अशिक्षित और गरीब आदिवासियों के किस्से कम सुनाई देते हैं। पुरुष आदिवासियों का जि़क्र तो फिर भी इतिहास की किताबों में मिल भी जाता है, लेकिन आदिवासी महिलाओं की बात कोई करता सुनाई नहीं देता।
आम धारणा है कि स्वतंत्रता आंदोलन में पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय शहरी लोगों ने ही योगदान किया है। ग्रामीणजनों की भागीदारी की बात तो एक बार दबे स्वर में स्वीकार कर भी ली जाती है लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में सुदूर जंगलों में रहने वाले अशिक्षित और गरीब आदिवासियों के किस्से कम सुनाई देते हैं। पुरुष आदिवासियों का जि़क्र तो फिर भी इतिहास की किताबों में मिल भी जाता है, लेकिन आदिवासी महिलाओं की बात कोई करता सुनाई नहीं देता।
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विस्तार
वो साल 1930 के अक्टूबर की 09 तारीख थी। दिन था गुरुवार। आजादी के आंदोलन का बेहद सुनहरा लेकिन गुमनाम दिन। इसी दिन घटी थी ये लोमहर्षक और अनसुनी दास्तां, या यूं कहें कमसुनी दास्तां।
इस दिन सिवनी जिले के आदिवासी-वनग्राम टूरिया की गरीब-अनपढ़ आदिवासी महिलाओं ने अंग्रेजों को ललकारते हुए कहा था-
‘हम आजादी के मतवाले हैं, मर जाना पसंद करेंगे लेकिन झुकना नहीं।’
ऐसा उन्होंने इसलिए कहा था क्योंकि जिले के प्रमुख और उस दौर के सबसे ताकतवर अंग्रेज अधिकारी डिप्टी कमिशनर यानि कलेक्टर सीमेन ने जिद ठान ली थी कि ‘टूरिया में आंदोलन कतई नहीं होने दिया जाएगा।’ असल में उसे ये बात हजम ही नहीं हो रही थी कि अपढ़ नंगे-भूखे आदिवासी, ऊपर से ये महिलाएं (आदिवासी) उसके इलाके में सत्याग्रह करेंगे। इससे तो उसकी इज्जत की बैंड ही बज जाएगी। सो उसने गुस्से में मातहतों को आदेश दिया ‘टूरिया बीन टॉट अ लेसन।’
टूरिया के लोगों को सबक सिखाने का ये आदेश उसने बाकायदा एक चिट पर लिखकर दिया। अपने अर्दली से कहा कि इंस्पेक्टर सदरूद्दीन तक पहुंचाया जाए। इंस्पेक्टर सदरूद्दीन और इलाके रेंजर मेहता को सीमेन के इस आदेश का पालन करना ही करना था। रेंजर का रोल यहां इसलिए आता है, क्योंकि ये आंदोलन ‘जंगल सत्याग्रह’ का हिस्सा था, जिसमें जंगल कानूनों को तोड़ने का काम सत्याग्रही करते थे और गिरफ्तारी देते थे। बता दें, छोटे से कागज पर खिली ये साधारण-सी चिट आगे जाकर कोर्ट में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी।
बहरहाल, जवाब में आदिवासी महिलाओं ने सीना तानकर कहा, ‘आंदोलन तो होगा, और जरूर होगा। और ये भी भरोसा रखो, तुम गोली चलाओगे तो हम पीठ नहीं दिखाएंगे, गोली हमारे सीने पर ही लगेगी।’
‘कट टू टूरिया स्मारक’
सिवनी जिला मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बॉर्डर पर स्थित है। इसके दूसरे सिरे पर नागपुर है। यह जिला जबलपुर और नागपुर के मध्य में पड़ता है। जिला मुख्यालय से लगभग 52 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ग्राम खवासा। यह मध्य प्रदेश का अंतिम गांव है।
यहां से लगभग 09 किलोमीटर की दूरी पर है आदिवासी-वनग्राम टूरिया। यहां एक स्मारक है जिसे टूरिया स्मारक के नाम से जाना जाता है। वैसे तो सभी स्मारक अपने गर्भ में एक खास घटना की जानकारी छुपाए रहते हैं, लेकिन यह स्मारक एक अलग ही रोमांचक और लोमहर्षक किस्से को बयां करता है, एक खास मिथक को तोड़ता है।
आम धारणा है कि स्वतंत्रता आंदोलन में पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय शहरी लोगों ने ही मुख्य भूमिका अदा की है। ग्रामीण जनों की भागीदारी की बात तो एक बार दबे स्वर में स्वीकार कर भी ली जाती है लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में सुदूर जंगलों में रहने वाले अशिक्षित और गरीब आदिवासियों के किस्से कम सुनाई देते हैं। पुरुष आदिवासियों का जिक्र तो फिर भी इतिहास की किताबों में मिल भी जाता है, लेकिन आदिवासी महिलाओं की बात कोई करता सुनाई नहीं देता।
टूरिया सत्याग्रह और उसके फलस्वरूप हुआ गोलीकाण्ड इसी मिथक को तोड़ता है।
टूरिया गोलीकाण्ड क्या है, क्यों हुआ था ?
टूरिया गोलीकाण्ड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वो चमकता पन्ना है, जिसका जि़क्र इतिहास की कुछेक किताबों में मिलता तो है, लेकिन बस फार्मेलिटी के लिए। देश आज इक्कीसवीं सदी का चौथाई हिस्सा पार करने की कगार है। इस दौर में महिला जाग्रति की गूंज बहुत जोर से सुनाई दे रही है।
समाज के विकास में आज महिलाओं की भागीदारी का शोर चहुं ओर है। सच भी है, लेकिन कल्पना कीजिए आज से 95-100 बरस पहले के हालात की। खासतौर पर इंटीरियर में बसे गांवों में रहने वाली पढ़ाई लिखाई से दूर अशिक्षित आदिवासी और गरीब महिलाओं की। आपको ये जानकर हैरत होगी कि सुदूर जंगल में बसे इस वनग्राम की इन्हीं महिलाओं ने अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ाकर रख दिए थे।
सोचकर रोमांच होता है, कैसा रहा होगा वो सीन ?
एक ओर संगीन की उठी हुई नोकें, तो सामने घांस काटने के लिए हाथ में हंसिया लिए, जंगल कानून तोड़ने और सत्याग्रह करने को कृतसंकल्पित आदिवासी महिलाएं। साथ में कंधे से कंधा लगाए पुरूष।
अंतत: दुखद गोली चलाने के आदेश। क्या परिणाम निकला इस गोली कांड का ? आगे बताएंगे पहले इस आंदोलन की पृष्ठभूमि को समझ लें, जिस जंगल सत्याग्रह के चलते ये आंदोलन और अंतत: गोलीचालन हुआ वो जंगल सत्याग्रह क्या है ?
क्या है जंगल सत्याग्रह?
गांधी जी के सत्याग्रह की आग 1923 से सिवनी में धधक रही थी। 13 अप्रैल 1923 को जब नागपुर में झण्डा सत्याग्रह हुआ तो इसकी आग सिवनी तक भी पहुंची। अनेक सत्याग्रही यहां बंदी बनाए गए।
अब आता है 1930। यह बरस गांधी जी के नमक सत्याग्रह के लिए जाना जाता है, जिसकी शुरूआत मशहूर दांडी मार्च से हुई थी। 12 मार्च 1930 से 5 अप्रेल 1930 तक चले दांडी मार्च को नमक सत्याग्रह के नाम से पुकारा जाता है। अंग्रेज सरकार ने जब 1930 में नमक पर कर लगा दिया तो महात्मा गांधी ने इस कानून के खिलाफ यह आंदोलन छेड़ा।
उन्होंनें सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गांव दांडी तक 390 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। उन्होंने समुद्र तट से प्राकृतिक नमक उठाकर नमक कानून को तोड़ा। इस सविनय अवज्ञा आंदोलन की लहरें समुद्री तटों से दूर बसे हिंदुस्तान के तमाम शहरों और गांवों तक पहुंच गई। इसकी आंच से सीपी और बरार तक फैली। मध्य प्रदेश तब था नहीं इसका यही नाम था सीपी एण्ड बरार। सिवनी इसका हिस्सा था जो अब जिला है। खैर, इसका असर भी सिवनी में दिखाई दिया।
नमक बनाम जंगल सत्याग्रह
जिन इलाकों में समुद्र नहीं था वहां तो नमक उठाकर कानून तोड़ा नहीं जा सकता था अत: ऐसे इलाकों में दूसरी तरह से कानून तोड़ा जाता था। मध्य प्रदेश चूंकि घने जंगलों वाला प्रदेश था अत: यहां नमक सत्याग्रह को जंगल सत्याग्रह के रूप में अपनाया गया। स्वदेशी नमक पर जिस तरह गोरों को कब्जा था वैसे ही देशी जंगलों के संसाधन पर भी अंग्रेज सरकार काबिज थी।
जंगल सत्याग्रह ने नगरों-कस्बों तक सीमित नमक सत्याग्रह को सुदूर वन क्षेत्रों में पहुचा दिया था। यहां वन कानूनों को तोड़कर इस सत्याग्रह को अंजाम दिया जाता था। वन बाहुल्य सिवनी जिले में ठीक यही हुआ। जिसकी परिणिति थी टूरिया गोलीकांड।
जंगल-सत्याग्रह की शुरूआत जिला मुख्यालय सिवनी से हुई। स्वयं सेवक यहां से 16 किलोमीटर दूर स्थित चंदन बगीचे में घास काटकर सत्याग्रह को अंजाम दिया करते थे।
इन सत्याग्रहियों पर धारा 394/114 ताजीराते हिंद तथा 26 फारेस्ट एक्ट के तहत मुकदमा चलाकर सजा एवं जुर्माना किया जाता था। जब सत्याग्रहियों की संख्या लगातार बढ़ने लगी तो थक हार कर अंग्रेज प्रशासन ने सजा-जुर्माना बंद कर दिया। फिर बस इतना करने लगे कि वो सत्याग्रहियों को पकड़ते और जंगल में छोड़ आते।
टूरिया ने सत्याग्रह को दिया नया मोड़
यहां के आदिवासियों के मन में भी देश प्रेम की भावनाएं हिलौरे ले रही थीं। जो जंगल सत्याग्रह के माध्यम से प्रस्फुटित हुईं। इन आदिवासियों के नेता थे मूकाजी सोनवाणे उर्फ मूकाजी लोहार। 09 अक्टूबर को टूरिया में वन कानून तोड़कर सत्याग्रह करने की घोषणा पहले ही हो चुकी थी। डिप्टी कमिश्नर ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कमर कस ली थी। अपने मातहतों को आदेश भी दे दिया था कि ‘टूरिया को हर हाल में सबक सिखाना है।’
कृत्संकल्पित सत्याग्रही अपने कौल पर अडिग थे और 09 अक्टूबर के दिन 1930 के दिन को टूरिया गांव के नाम को राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखने को कृत संकल्पित थे। सत्याग्रह से पहले खवासा के श्री राम प्रसाद और मूकाजी लोहार ने जोश भरे भाषण देकर आसपास के ग्रामवासियों को प्रोत्साहित किया। दूसरे दिन सुबह ही पुलिस टूरिया गांव पहुंच गई।
आदिवासी महिलाओं को महत्वहीन और अनपढ़ समझने वाले लोगों की आंखें ये देखकर हैरत में पड़ गईं कि इंटीरियर में रहने वाली ये महिलाएं तथा कथित सभ्य समाज की भाषा में जिन्हें गंवार कहकर पुकारा जाता है, अपने भीतर देशभक्ति का कितना बड़ा ज्वालामुखी समेटे हुए हैं। जैसा उन्होंने कहा था कि हम पीठ नहीं दिखाएंगे, गोली हमारे सीने पर ही लगेगी।
वैसा ही हुआ। सत्याग्रह हुआ, वन कानून तोडा गया, संगीनें गरजीं, गोलियां भी चलीं।
आदिवासी महिलाओं की अप्रतिम शहादत
कट टू डिप्टी कमिश्नर सीमेन का आफिस।
सीमेन के सवाल, अधीनस्थ के जवाब।
कितने मरे? तीन औरतें एक आदमी।
सभी स्पॅाट पर? नहीं एक औरत स्पॉट पर, बाकी दो औरत और एक पुरूष अस्पताल में।
मरने वालों के नाम ?
एक-रानी बाई साकिन खम्बा (गांव), दो- देभोबाई साकिन भीलवा। तीन- मुड्डे बाई साकिन खामरीठ और 4- बिरझू भाई साकिन मुरझोड़।
घायल कितने हुए? 30 के लगभग।
सीमेंट की लिखी चिट मिली: अदालत में सनसनी
लेखक घनश्याम सक्सेना अपनी किताब ‘जंगल सत्य और जंगल सत्याग्रह’ में कोर्ट की कारवाई में आए दिलचस्प मोड़ का जि़क्र करते हुए लिखते हैं। इन चार निर्दोष और भोले ग्रामवासियों की हत्या से भी सीमेन को संतुष्टि नहीं हुई। उसने 18 अन्य ग्रामीणों पर भी मुकदमे चलाने के आदेश दिए। सिवनी के दो वकीलों सर्वश्री पी.डी. जटार और एन.एन. सील ने इनका बचाव करने का निर्णय लिया। ताकि प्रशासन के बर्बर रवैये का पर्दाफाश किया जा सके।
जब एडवोकेट सील इस प्रकरण का रिकार्ड देख रहे थे तभी उन्हें एक सीलबंद लिफाफे में रखा सीमेन की वह चिट मिली, जिसमें उन्होंने टूरिया के ग्रामीणों को सबक सिखाने का आदेश दिया था। जाहिर है इंसपेक्टर सदरूद्दीन ने इसे अपने बचाव के लिए रख छोड़ा था। यह चिट मिलने से अदालत में सनसनी फैल गई।
जब झुकना पड़ा सरकार को
खबर मिलते ही सीमेन अदालत में आ धमका। आगबबूला होकर पूछने लगा ये चिट को रिकार्ड में कैसे शामिल किया गया। सीमेन के क्रोध की परवाह न करते हएु बचाव पक्ष के वकीलों ने इस चिट की प्रतिलिपि पाने के लिए अदालत में अर्जी लगा दी। मजिस्ट्रेट ने एडवोकेट्स को अपने केबिन में बुलाकर कहा कि यदि वे सीमेन की चिट की कापी हासिल करने पर जोर नहीं दें, तो सभी अभियुक्तों को जमानत दी जा सकती है।
वकील राजी नहीं हुए और उन्होंने हाईकोर्ट से मामला सिवनी से स्थानांतरित होने के लिए अर्जी लगा दी। हाईकोर्ट ने मामला तो स्थानांतरित नहीं किया लेकिन सरकार ने सीमेन का तबादला जरूर कर दिया, तो इस तरह जिन्हें लोग अनपढ आदिवासी और गंवार कहकर पुकारते हैं, उन्होंने उस दौर के सबसे ताकतवर डिप्टी कमिश्नर से न सिर्फ लोहा लिया, बल्कि अपनी जान भी निछावर कर दी और अंतत: सरकार को झुकाते हुए डिप्टी कमिश्नर को स्थानांतरित करने पर मजबूर भी कर दिया।
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