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दूसरा पहलू: बहादुरगढ़ में हैं, तो जरा ‘जबान संभाल के’ बोलें, गालियां छुड़ाने को समाज की पहल का सकारात्मक असर

Mon, 08 Sep 2025 06:31 AM IST
Navin Singh Patel नवीन सिंह पटेल
Updated Mon, 08 Sep 2025 06:31 AM IST
सार

हरियाणा के झज्जर जिले के औद्योगिक क्षेत्र बहादुरगढ़ में गालियां छुड़ाने की पहल का हो रहा सकारात्मक असर।  ब्रिगेडियर होशियार सिंह मेट्रो स्टेशन के बाहर हस्ताक्षर अभियान चलाकर संकल्प दिलाया गया कि हम न किसी को गाली देंगे, न ही देने देंगे।  हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान नीलोखेड़ी (करनाल) से जुड़ीं ललिता राठी की पहल पर ‘जबान संभाल के’ अभियान की शुरुआत हुई। 350 सरकारी मुलाजिम भी इस पहल का हिस्सा बन गए हैं।

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In Bahadurgarh Haryana speak carefully initiative of society to stop abuses has a positive effect
गालियों के खिलाफ हरियाणा में सकारात्मक पहल - फोटो : एआई जनित तस्वीर (चैट जीपीटी)

विस्तार

गालियां राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हो गई हैं। गालियां तरक्कीपसंद समाज की निशानी नहीं होतीं। ये कमजोर और अविकसित समाज का ही संकेतक हैं। इसके बरक्स दिल्ली से सटे हरियाणा के बहादुरगढ़ (झज्जर) में संघर्षशील जनकल्याण सेवा समिति सांखोल का गाली-मुक्त समाज बनाने का ‘जबान संभाल के’ अभियान उम्मीद की एक नई किरण है। यह पहल सिर्फ दो साल पुरानी है। इस वर्ष रक्षाबंधन पर ब्रिगेडियर होशियार सिंह मेट्रो स्टेशन के बाहर हस्ताक्षर अभियान चलाकर संकल्प दिलाया कि हम न किसी को गाली देंगे, न ही देने देंगे। यहां महिलाओं ने ऐसी राखियां बनाकर बांटीं, जिनमें भाइयों से गाली न देने का वचन लेने का संदेश लिखा था।

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संयोग से यह पहल हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान नीलोखेड़ी (करनाल) से जुड़ी एक महिला (ललिता राठी) के ही दिमाग में कौंधी थी। क्यों? के सवाल पर ललिता बताती हैं कि मेरी परवरिश गाली-मुक्त परिवार में हुई। कॉलेज में भी ऐसा माहौल नहीं देखा। लेकिन, कुछ बरस पहले जब महिला सरपंचों को ट्रेनिंग देने गांवों में गई, तो छोटे-छोटे बच्चों तक को गालियां देते पाया। यहीं से विचार आया। बिगड़ी जबान को सुधारने का संबल बने संस्था के अध्यक्ष और सोनीपत के पीएमश्री केंद्रीय विद्यालय में भूगोल शिक्षक मनीष सांखोल और उनकी 350 सरकारी मुलाजिमों की सामाजिक कार्यों से जुड़ी टीम। अब इसी के संकल्पों में नया टैग है-गाली-मुक्त समाज की कोशिश। मनीष कहते हैं, हमने विचारों की चिंगारी को आग लगा दी है, ज्वाला बनाने का दायित्व सबका है।
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महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है कि ‘वाणी ही मित्र बनाती है, वाणी ही शत्रु।’ बौद्ध दर्शन में भी गाली या कटु भाषा वर्जित है। कबीर, तुलसी, नानक जैसे संतों का सार है...कटु वचनों से वैमनस्य फैलता है, मधुर वाणी से प्रेम। विश्व इतिहास देखें, तो यूनानी सभ्यता ने भी अपमानजनक शब्दों को दंडनीय माना है। चीन-जापान भी गालियों को अत्यंत असभ्य मानते हैं। यूरोपीय समाज में गालियां आम बोलचाल में आ गईं, लेकिन कई सभ्यताओं में इनका प्रयोग निंदनीय है। हालांकि, गालियों पर शोध निष्कर्षों से चर्चित हुए कील विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी रिचर्ड स्टीफेंस के मुताबिक, गालियां दे लेने से दर्द घट जाता है। उन्हें कुछ शोध में मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति बढ़ी मिली। वहीं जो लोग रोजाना गालियां देते हैं, उन्हें फायदा कम होता है। ‘जबान संभाल के’ जैसे सामाजिक यज्ञों में हम-आप भी कुछ आहुतियां दे दें, तो एक ऐसा आदर्श समाज बनते देर नहीं लगेगी, जहां शब्द घाव नहीं देंगे, बल्कि मरहम हो जाएंगे।

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