विश्लेषण: अमेरिका के टैरिफ युद्ध का भारत और वैश्विक भूराजनीति पर प्रभाव
- अमेरिका की दिग्गज निवेशक कंपनी जेफरीज ने दावा किया है कि भारत पर थोपा गया बेतहाशा टैरिफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत खुन्नस का परिणाम है। अमरीकी अर्थशास्त्री रिचर्ड वोल्फ का मानना है कि अमेरिका भारत के विरुद्ध दबंग की तरह व्यवहार कर रहा है।
विस्तार
एंथोनी हॉपकिंस का एक कथन याद आ रहा है कि 'शक्ति' किसी व्यक्ति को नहीं बदलती, उसे पूरी तरह से खोल देती है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के घोषित अविवेकपूर्ण टैरिफ युद्ध ने उन्हें पूरी दुनिया के सामने एक तरह से 'एक्सपोज' कर दिया है। अमेरिका के निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस निर्णय को मानसिक दिवालियापन का सटीक उदाहरण बताया है।
अमेरिका की दिग्गज निवेशक कंपनी जेफरीज ने दावा किया है कि भारत पर थोपा गया बेतहाशा टैरिफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत खुन्नस का परिणाम है। अमरीकी अर्थशास्त्री रिचर्ड वोल्फ का मानना है कि अमेरिका भारत के विरुद्ध दबंग की तरह व्यवहार कर रहा है। भारत को यह बताना की मौजूदा वैश्विक भूराजनीति में भारत को कैसा व्यवहार करना चाहिए? ठीक वैसा ही है जैसे चूहा हाथी को मुक्का मारकर बातवे कि हाथी को किस ओर जाना है?
ये तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के घोषित टैरिफ युद्ध की कुछ तात्कालिक झाकियां हैं। अमेरिका को दीर्घकालिक तौर पर इससे भी बुरे परिणाम भुगतने के प्रति अमरीकी अर्थशास्त्री सचेत कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि बार-बार टैरिफ को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से अमेरिका को सन् 1930 जैसी महामंदी का सामना करना पड़ सकता है। उस महामंदी का बड़ा कारण (Smoot-Hawley) का टैरिफ ही था।
टैरिफ का पहले भी देखा गया है असर
अमरीकी महामंदी का असर यह हुआ कि विश्व व्यापार में 65% का घाटा हुआ। वैश्विक स्तर पर राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई।यूरोप में फासीवादी और नाजीवाद का उदय हुआ। दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध के संकट का सामना करना पड़ा। पूरी दुनिया में लम्बे समय तक राजनीतिक उथल - पुथल मची रही और आर्थिक सुस्ती का माहौल बरकरार रहा।
सन् 2008 में भी अमरीकी मंदी का एक बड़ा कारण सरकारी संरक्षण ही था।उस दौर से तो अमेरिका निकलने में कामयाब रहा।पर तब से अमरीकी समाज में असमानता और कर्ज की संस्कृति और गहरी हो गयी है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया निर्णय से ऐसा दिखता नहीं कि अमेरिका ने अपने ही इतिहास से कोई सबक सीखा है। इतिहास के बारे में ठीक ही दावा किया जाता है कि इतिहास से जो सबक नहीं सीखते इतिहास उन्हें सजा देता है। इस लिए राष्ट्रपति ट्रम्प का टैरिफ युद्ध में उतरने का निर्णय आर्थिक विवेक के बजाय राजनीतिक नासमझी में लिया गया निर्णय ही प्रतीत हो रहा है।
अमरीकी अर्थशास्त्री जैफरी सॉक्स यह कहना कि अमेरिका भारत को कभी आर्थिक रूप से सफल होता नहीं देख सकता है।" पर भारत के इस आर्थिक चमत्कार का क्या कहेंगे कि डोनाल्ड ट्रम्प जिसे 'डेड इकोनॉमी' कह रहे थे, उसने कमाल का आर्थिक प्रदर्शन करते हुए 7.8 % की विकास दर हासिल कर पूरी दुनिया को अपने आर्थिक प्रदर्शन से चमत्कृत कर दिया है।
अमरीकी राजनय में भी यह बात शिद्दत से महसूस किया जा रहे हैं कि 'टैरिफ युद्ध' का असर सिर्फ व्यापार पर ही नहीं बल्कि इसकी अन्तिम परिणित दुनिया में नये गठबंधनों और शक्ति संतुलन के नये समीकरण बनने के रूप में भी सामने आ सकते हैं।
अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है विपरीत असर
इस अर्थ में दुनिया में एक ध्रुवीय के बजाय बहुध्रुवीय केन्द्र उभरने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। यूरोपीय संघ, आसियान देशों और ब्रिक्स देशों में भी अमरीकी निर्भरता से मुक्त होने की अकुलाहट साफ दिखायी दे रही हैं। इन नित्य नये बनते -बिगड़ते कूटनीतिक-व्यापारिक और सामरिक साझेदारी से अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ने के लक्षण साफ दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इस घोषित टैरिफ युद्ध से अमरीकी आयात महंगा होगा, निर्यात और निवेश पर भी इसका असर पड़ सकता है। विदेशी निवेशक अपनी पूंजी दूसरे देशों में स्थानांतरित कर सकते हैं। अमेरिका में आयात पर आधारित घरेलू इस्तेमाल की चीजें महंगी हो सकती है। विश्व व्यापार और बाजार में अस्थिरता पैदा होगी और अमेरिका के कृषि उत्पाद जैसे मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पाद की मांग कम हो सकती है।
अमेरिका के टैरिफ युद्ध ने पूरी दुनिया के सामने उसके इस अघोषित प्रवृति को भी उजागर कर दिया है कि आर्थिक और सैन्य दृष्टि उभर रहे किसी भी देश से जहां उसके अपने हित टकराने की तनिक भी संभावना हो, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई न कोई बहना तलाश ही लेता है। कभी मानवधिकार के हनन और कम्युनिज्म के नाम पर रूस का विरोध और पूरी दुनिया को शीतयुद्ध की खेमेबंदी में खड़ा करने की कूटनीति से अब दुनिया अनजान नहीं है।
अमेरिका और रूस के जारी शीत युद्ध के दौर में कल्पित 'स्टार वार' परियोजना ने रूस को तबाह करने में कैसी भूमिका निभाई थी? उसके बाद चीन के साथ भी कुछ वैसे ही कूटनीतिक व्यवहार करने का नतीजा है कि आज चीन न सिर्फ अमेरिका की किसी चुनौती का डटकर मुकाबला कर रहा है, बल्कि पूरी दुनिया में अमेरिका के सामने कठिन चुनौती पेश कर रहा है।
इसका परिणाम यह सामने आ रहा है कि वैश्विक शक्ति संतुलन की केन्द्रीय धुरी बनने की रणनीतिक उधेड़बुन में लगा अमेरिका खुद अलग- थलग पड़ता नज़र आ रहा है। भारत की अगुवाई वाले ब्रिक्स देशों ( ब्राजील, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका आदि) के बीच आपसी बनती दिख रही सहमति आज हर लिहाज से विश्व शक्ति संतुलन का पलड़ा ब्रिक्स की तरफ झुकता नज़र आ रहा हैं।
जनसांख्यिकी और आर्थिकी लिहाज से वैश्विक आबादी का 49.9% ग्लोबल जी. डी. पी. का 40% और वैश्विक उत्पादों का 38% हिस्सेदारी इन देशों की हैं। भारत सन् 2026 में ब्रिक्स देशों की अध्यक्षता भी करने जा रहा है।
इसकी तुलना में अमेरिका की अगुवाई वाले जी -7 देशों में शामिल जापान ने भी अमरीकी शुल्क नीति के विरोध में भारत के साथ दस साल के दीर्घकालिक समझौते पर सहमति हुई है. जापानी प्रधानमंत्री इशिबा ने दावा किया है कि "जापान की आधुनिक तकनीक और भारत की बेहतरीन प्रतिभा एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों देशों की साझेदारी भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अहम है।"
'अमेरिका का निर्णय अमेरिका के ही राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं'
चीन के (रविवार से) तियानजिन में शुरू हो रहे शंघाई सहयोग संघ (एस. सी. ओ.) के सम्मेलन में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार और सीमा विवाद पर भी सकारात्मक सहमति का संयोग बनता दिखाई दे रहा है। भारत और चीन के बीच बातचीत से सारे मतभेद हल होने का सीधा अर्थ है एशिया में भारत और चीन को एक दूसरे से अलग -थलग रखने की अमेरिका की रणनीतिक चातुरी का असफल होना है। इसलिए दिग्गज निवेशक कम्पनी जेफरीज यह कहना ठीक प्रतीत होता है कि "अमेरिका का यह निर्णय अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं है।"
जिस तरह की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बनती दिख रही है उसका कुल निष्कर्ष यह कि अमेरिका खुद अपने बुने टैरिफ युद्ध में बुरी तरह से उलझ गया लगता है। फिर भी अमरीकी वित्त मंत्री स्काट बेसेंट को उम्मीद है कि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते की संभावना बिल्कुल क्षीण नहीं हुई है। फिलहाल तो ऐसा लगता है कि टैरिफ युद्ध के बहाने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कूटनीति उस अंधेरी सुरंग में घुस गयी है, जहां से निकलने का कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा है।
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