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दूसरा पहलू: साबुन ने कैसे सदियों से सभ्यता को सुरक्षित रखा... दुनिया में हर साल 50 अरब डॉलर का खर्च
Mon, 05 May 2025 07:52 AM IST
शुभम कुमार
पॉल ई रिचर्डसन
पॉल ई रिचर्डसन
Published by: शुभम कुमार
Updated Mon, 05 May 2025 07:52 AM IST
सार
टेडपोल (मेढ़क के बच्चे) की तरह साबुन के अणु का सिर गोल और पूंछ लंबी होती है। ये ही गुण साबुन को फिसलनयुक्त और सफाई में असरदार बनाते हैं। पानी में घुल जाने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफिलिक’ कहते हैं, जबकि पानी में नहीं घुलने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफोबिक’ कहते हैं। जैसे कि तेल या चिकनाई, जिसे सिर्फ पानी से नहीं हटाया जा सकता।
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पॉल ई रिचर्डसन
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
हजारों वर्ष पहले, हमारे पूर्वजों ने कुछ ऐसा खोजा, जो उनके शरीर और कपड़ों को साफ कर सकता था। किस्से के मुताबिक, किसी के भोजन में मौजूद वसा राख में गिर गई। वे यह देखकर हैरान रह गए कि वसा और राख के मिलने से एक ऐसा पदार्थ बना, जो चीजों को साफ कर सकता था। उस समय में यह उन्हें किसी जादू से कम नहीं लगा होगा।
खैर, यह तो एक किंवदंती है, पर सच्चाई यह है कि साबुन की खोज लगभग पांच हजार वर्ष पहले दक्षिणी मेसोपोटामिया के प्राचीन शहर बेबीलोन (आज का इराक) में हुई थी। समय के साथ दुनिया भर के लोग साबुन का इस्तेमाल करने लगे। 1600 ईस्वी तक अमेरिकी उपनिवेशों में साबुन का उपयोग आम हो गया था, जो तब घर पर ही बनता था। साल 1791 में फ्रांस के रसायनशास्त्री निकोलस लेब्लांक ने पहली बार साबुन बनाने की प्रक्रिया का पेटेंट करवाया।
आज दुनिया भर में हर साल लगभग ‘50 अरब डॉलर’ सिर्फ विभिन्न तरह के साबुन पर खर्च होते हैं। भले ही अरबों लोग रोज साबुन का इस्तेमाल करते हैं, फिर भी अधिकांश लोग नहीं जानते कि यह कैसे काम करता है। पानी दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन परमाणु से मिलकर बना होता है। पानी में घुल जाने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफिलिक’ (जल-प्रेमी) कहते हैं। जबकि पानी में नहीं घुलने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफोबिक’ कहते हैं। जैसे कि तेल या चिकनाई, जिसे सिर्फ पानी से नहीं हटाया जा सकता।
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साबुन में हाइड्रोफिलिक और हाइड्रोफोबिक, दोनों गुण होते हैं। टेडपोल (मेढ़क के बच्चे) की तरह साबुन के अणु का सिर गोल और पूंछ लंबी होती है; सिर हाइड्रोफिलिक होता है, तथा पूंछ हाइड्रोफोबिक होती है। यही गुण साबुन को फिसलनयुक्त और सफाई में असरदार बनाता है। गंदगी हाइड्रोफिलिक और हाइड्रोफोबिक दोनों का मिश्रण होती है। इसलिए सिर्फ पानी से हाथ धोने पर गंदगी का हाइड्रोफिलिक हिस्सा दूर होता है, लेकिन साबुन से हाथ धोने पर हर तरह की गंदगी दूर हो जाती है।
साबुन के अणु आपस में मिलकर गंदगी को चारों ओर से घेर लेते हैं, जिससे मिसेल संरचना बनती है। यह संरचना बुलबुले की तरह दिखती है, जो गंदगी को फंसा लेती है और बहता पानी इसे पूरी तरह से धो देता है। गंदगी के अलावा, शरीर में कई तरह के सूक्ष्मजीव होते हैं, जैसे कि बैक्टीरिया। स्नान नहीं करने पर ये शरीर में बदबू पैदा करते हैं। साबुन इन सूक्ष्मजीवों की बाहरी झिल्ली को तोड़ देता है और पानी उनके शरीर के अवशेषों को धो देता है। कम से कम बीस सेकंड तक साबुन से रगड़-रगड़कर हाथ धोने चाहिए। है न कमाल की बात कि साबुन की छोटी-सी टिकिया ने सदियों से मानव सभ्यता को सुरक्षित रखा है! (द कन्वर्सेशन से)
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खैर, यह तो एक किंवदंती है, पर सच्चाई यह है कि साबुन की खोज लगभग पांच हजार वर्ष पहले दक्षिणी मेसोपोटामिया के प्राचीन शहर बेबीलोन (आज का इराक) में हुई थी। समय के साथ दुनिया भर के लोग साबुन का इस्तेमाल करने लगे। 1600 ईस्वी तक अमेरिकी उपनिवेशों में साबुन का उपयोग आम हो गया था, जो तब घर पर ही बनता था। साल 1791 में फ्रांस के रसायनशास्त्री निकोलस लेब्लांक ने पहली बार साबुन बनाने की प्रक्रिया का पेटेंट करवाया।
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आज दुनिया भर में हर साल लगभग ‘50 अरब डॉलर’ सिर्फ विभिन्न तरह के साबुन पर खर्च होते हैं। भले ही अरबों लोग रोज साबुन का इस्तेमाल करते हैं, फिर भी अधिकांश लोग नहीं जानते कि यह कैसे काम करता है। पानी दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन परमाणु से मिलकर बना होता है। पानी में घुल जाने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफिलिक’ (जल-प्रेमी) कहते हैं। जबकि पानी में नहीं घुलने वाले अणुओं को ‘हाइड्रोफोबिक’ कहते हैं। जैसे कि तेल या चिकनाई, जिसे सिर्फ पानी से नहीं हटाया जा सकता।
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साबुन में हाइड्रोफिलिक और हाइड्रोफोबिक, दोनों गुण होते हैं। टेडपोल (मेढ़क के बच्चे) की तरह साबुन के अणु का सिर गोल और पूंछ लंबी होती है; सिर हाइड्रोफिलिक होता है, तथा पूंछ हाइड्रोफोबिक होती है। यही गुण साबुन को फिसलनयुक्त और सफाई में असरदार बनाता है। गंदगी हाइड्रोफिलिक और हाइड्रोफोबिक दोनों का मिश्रण होती है। इसलिए सिर्फ पानी से हाथ धोने पर गंदगी का हाइड्रोफिलिक हिस्सा दूर होता है, लेकिन साबुन से हाथ धोने पर हर तरह की गंदगी दूर हो जाती है।
साबुन के अणु आपस में मिलकर गंदगी को चारों ओर से घेर लेते हैं, जिससे मिसेल संरचना बनती है। यह संरचना बुलबुले की तरह दिखती है, जो गंदगी को फंसा लेती है और बहता पानी इसे पूरी तरह से धो देता है। गंदगी के अलावा, शरीर में कई तरह के सूक्ष्मजीव होते हैं, जैसे कि बैक्टीरिया। स्नान नहीं करने पर ये शरीर में बदबू पैदा करते हैं। साबुन इन सूक्ष्मजीवों की बाहरी झिल्ली को तोड़ देता है और पानी उनके शरीर के अवशेषों को धो देता है। कम से कम बीस सेकंड तक साबुन से रगड़-रगड़कर हाथ धोने चाहिए। है न कमाल की बात कि साबुन की छोटी-सी टिकिया ने सदियों से मानव सभ्यता को सुरक्षित रखा है! (द कन्वर्सेशन से)