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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: वी.के.मूर्ति- प्रकाश का जादूगर

Mon, 29 Apr 2024 09:27 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Mon, 29 Apr 2024 09:27 PM IST
सार

बहुत कम लोग जानते हैं कि वी.के. मूर्ति स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे इसीलिए जब श्याम बेनेगल ने 1992 में दूरदर्शन के लिए जवाहर लाल नेहरू की किताब पर आधारित 53 एपिसोड का लोकप्रिय सीरियल ‘भारत एक खोज’ बनाया तो उन्होंने कैमरा संभालने के लिए वी. के. मूर्ति को आमंत्रित किया। 

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history of world cinema V. K. Murthy Indian cinematographer films and awards
सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock

विस्तार

जिनका स्क्रीन नाम वी. के. मूर्ति है, असल में उनका पूरा नाम वेंकटराम पंडित कृष्णमूर्ति है। वी.के. मूर्ति को ‘गुरु दत्त के सिनेमा की रोशनी’ कहा जाता है, क्योंकि यदि वी. के. मूर्ति गुरु दत्त की फिल्मों का कैमरा न संभालते तो ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ (गुरुदत्त द्वारा निर्देशित), ‘साहिब बीवी और गुलाम’ (गुरु दत्त ने प्रड्यूस की थी) जैसी फिल्में वो न होतीं, जिन्होंने भारतीय फिल्म इतिहास में सदा के लिए अपना स्थान सुरक्षित कर लिया है, इसीलिए गुरु दत्त के साथ कैमरामैन वी. के. मूर्ति का नाम नत्थी है, एक का नाम लेते दूसरे का नाम स्वत: आ जाता है।

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वी. के. का जन्म 26 नवम्बर 1923 को मैसूर में हुआ था। करीब सौ साल पहले जन्मे प्रकाश के इस जादूगर ने लंबी उम्र पाई क्योंकि उम्र से संबंधित बीमारियों के कारण बेंगलुरु में जब वे 7 अप्रैल 2014 को गुजरे तो उनकी उम्र 91 साल थी। उनके गुजरने पर सिने-प्रेमियों ने उन्हें खूब याद किया, मगर दु:ख है, जिस बिरादरी से वे थे, मतलब बॉलीवुड के बहुत कम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। 
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उन्होंने पहले देवानंद के कैमरामैन वी. रत्रा के सहायक के रूप में काम किया, बाद में उनकी प्रतिभा को गुरुदत्त ने पहचाना और इस तरह वे कुछ भारतीय फिल्मों को कालजयी बनाने में प्रमुख भूमिका निबाहने के बायस बने। गुरु दत्त की फिल्मों की हॉन्टिंग इमेजेज के लिए वी. के. मूर्ति जाने जाते हैं, एक उदाहरण अक्सर दिया जाता है।
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उदाहरण है, गुरु दत्त की एक प्रमुख फिल्म ‘कागज के फूल’ (भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म) का प्रसिद्ध गीत ‘वक्त ने किया क्या हसीन सितम...’ के फिल्मांकन का। वे स्टूडियो में प्रकाश की एक किरण पकड़ते हैं और उसे दो आईनों पर उछालते हुए फर्श पर गिराते हैं। यह ऐसा फिल्मांकन है, जिसे विशेषज्ञों ने खूब सराहा है। ऐसे कुशल कलाकार को देर से ही सही, पर 2008 में दादा साहेब फालके पुरस्कार मिलना अच्छा लगता है।

यह भी गौरतलब है, वे यह पुरस्कार पाने वाले पहले सिनेमाटोग्राफर हैं। इसके पहले 2005 में उन्हें एम्सटर्डम में दि इंटरनेशनल इंडियन फिल्म अकादमी लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त हुआ था।


गुरु दत्त और वी.के. की जोड़ी

आईने से प्रकाश को प्रतिबिंबित करना वी.के. की विशेषता है, इसी विशेषता के कारण गुरु दत्त ने उन्हें पहचाना। असल में गुरु दत्त पहली बार निर्देशन कर रहे थे, फिल्म थी नवनिकेतन की ‘बाजी’ (1951)। इसके एक दृश्य के लिए वी.के. ने सुझाव दिया था। क्लब के इस दृश्य में कैमरा आईने से प्रतिबिंबित हो देव आनंद की ओर पैन करता है, कैमरा वहां पहुंचता है, जहां गीता बाली अपने समूह के साथ नृत्य कर रही हैं।

कैमरे के इसी सहज प्रवाह ने गुरु दत्त को प्रभावित किया और उन्होंने अपनी अगली फिल्म ‘जाल’ के लिए उन्हें अपना कैमरामैन नियुक्त किया। तब शायद दोनों ने सोचा न होगा कि यह संबंध इतना लम्बा चलेगा। दोनों का साथ तब भी बना रहा जब निर्देशन कोई और कर रहा था। मैं बात कर रही हूं, फिल्म ’12 ओ’क्लॉक’ की। इस फिल्म के हीरो गुरु दत्त थे, मगर निर्देशन प्रमोद चक्रवर्ती ने किया था।

ऐसा नहीं है कि गुरु दत्त और वी.के. मूर्ति का संबंध सदैव बहुत दोस्ताना रहा। दोनों में खटपट होती थी। नसरीन मुन्नी कबीर की किताब में वहीदा रहमान बताती हैं, दोनों एक-दूसरे को खूब समझते थे, फिर भी तनातनी होती थी। गुरुदत्त काम को तत्काल होता देखना चाहते थे। वे मूर्ति को शॉट समझाते, ऐसे शॉट जो बहुत जटिल होते और अधैर्य के साथ तुरंत उसे पूरा हुआ देखना चाहते थे।

इन शॉट्स में ट्रॉली की गति, कठिन कोण, क्लोजअप आदि गुथे होते, जिसमें कैमरामैन को समय लगता और गुरु दत्त ताव में सेट छोड़ कर चले जाते, लेकिन मूर्ति गुरु दत्त को एक बहुत गंभीर व्यक्ति मानते थे, ऐसा व्यक्ति जो प्रयोग करना चाहता था। एक के सपने को दूसरे ने ऐसे साकार किया कि लोग मूर्ति को ‘गुरु दत्त की आंख’ कहने लगे।

‘पाकीजा’-रजिया सुल्तान’ की शूटिंग

वी. के. मूर्ति केवल गुरु दत्त की आंख नहीं थे, क्योंकि उन्होंने गुरु दत्त की फिल्मों के अलावा कई अन्य निर्देशकों के लिए काम किया और एक-से-बढ़कर-एक फिल्में दर्शकों को दीं। कमाल अमरोही के साथ वे यादगार फिल्म ‘पाकीजा’ तथा रजिया सुल्तान’ की शूटिंग कर रहे थे।

‘आर पार’ (1954), ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ (1955), ‘मिलाप’ (1955), ‘सीआईडी’ (1956), ‘जिद्दी’ (1964), ‘सूरज’ (1966), ‘‘जुगनू’ (1973), ‘आज़ाद’ (1978), जागीर’ (1984), ‘शत्रु’ (1986), ‘कलयुग और रामायण’ (1987), ‘दीदार’ (1992), आदि कुछ फिल्मों का कैमरा उन्होंने संभाला है, जिन्हें दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों ने सराहा। आईएमडीबी के अनुसार उन्होंने 28 फिल्मों की फोटोग्राफी की।

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सिनेमा - फोटो : istock

गुरु दत्त की असमय मृत्यु के बाद वी. के. मूर्ति ने खुद को बहुत अकेला पाया, इसके बाद उन्होंने मुख्य रूप से केवल प्रमोद चक्रवर्ती के लिए सिनेमाटोग्राफी की। मूर्ति श्वेत/श्याम फिल्मों में प्रकाश का जादू उत्पन्न करने में माहिर थे और अब फिल्में रंगीन होने लगी थीं, यह भी फिल्मांकन से उनके दूर होने का एक कारण बना। उन्होंने ‘प्यासा’ के कवि विजय (गुरु दत्त), ‘साहब बीबी और गुलाम’ की छोटी बहु (मीना कुमारी) तथा ‘कागज के फूल’ के सुरेश सिन्हा के अकेलेपन और वेदना को जिस कुशलता से फिल्माया है, वही उनकी कीर्ति को सदा के लिए बनाए रखने को काफी है।

याद कीजिए ‘प्यासा’ का वह दृश्य जब विजय अपनी मृत्यु सभा में प्रवेश करता है। उसे दरवाजे के फ़्रेम में दिखाया गया है, उसके पीछे रोशनी है, ऐसा लगता है, शहीद को क्रॉस पर लटकाया गया हो। इस दृश्य की चर्चा बराबर होती है। और ‘कागज के फ़ूल’ का वह सीन जिसमें असफल निर्देशक और एक समय की उसकी प्रेरणा और प्रेमिका एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। यह फिल्मांकन कितना त्रासद और खूबसूरत है! और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ की छोटी बहु यानी मीना कुमारी शराब की लत में डूब कर धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है और अंत में गायब हो जाती है।

सारा कुछ प्रकाश और छाया का खेल है, मगर कितना प्रभावशाली! कोई आश्चर्य नहीं कि ‘कागज के फ़ूल’ तथा ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए वी. के. मूर्ति को फिल्मफेयर का सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफ़र का पुरस्कार मिला।

फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’

‘चौदहवीं का चांद’ फिल्म के गीत ‘चौदहवीं का चांद हो...’ के उनके फिल्मांकन को कौन सिने-प्रेमी भूल सकता है? एक अन्य सिनेमाटोग्राफर के.यू. मोहनन के अनुसार, ‘जब उस काल (1950-60) में दूसरे सपाट काम कर रहे थे, लाइटिंग प्रयोग करने और मूड सृजित करने की उन (वी. के. मूर्ति) की कुशलता चकित करती है।’

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि वी. के. मूर्ति स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे इसीलिए जब श्याम बेनेगल ने 1992 में दूरदर्शन के लिए जवाहर लाल नेहरू की किताब पर आधारित 53 एपिसोड का लोकप्रिय सीरियल ‘भारत एक खोज’ बनाया तो उन्होंने कैमरा संभालने के लिए वी. के. मूर्ति को आमंत्रित किया। उन दिनों चूंकि बहुत प्लेटफार्म नहीं थे, अत: बच्चे-जवान-बूढ़े सबने यह कार्यक्रम मन लगा कर देखा और खूब सराहा।

वी. के. मूर्ति ने भीष्म साहनी की रचना ‘तमस’ पर गोवोंद निहलाणी सीरियल के छ: एपीसोड की सिनेमाटोग्राफी भी की। 1992 के बाद वे काम छोड़ कर बेंगलुरु रहने लगे थे। सिने-प्रेमी और सिने-अध्येता वी. के. मूर्ति को कभी नहीं भूल सकते हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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