फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   history of world cinema, Santosh Sivan an Indian cinematographer and film director

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: संतोष सिवन- बहुमुखी प्रतिभाशाली सिनेमाटोग्राफर

Tue, 28 Feb 2023 07:13 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 28 Feb 2023 07:13 PM IST
सार

संतोष सिवन बेहतरीन सिनेमाटोग्राफर हैं। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक सिनेमाटोग्राफर होने के साथ ही एक कुशल सिने-निर्देशक भी हैं। इन्होंने टीवी सिरीज के साथ ‘सिन’, ‘बायोचेक’, ‘ईनाम’, ‘उरमी: द वारियर हू वांटेड टू किल वास्को ड गामा’, ‘केशु’ ‘तहान’, ‘बिफोर द रेन्स’, ‘आनंदभद्रम’, ‘नवरस’, ‘अशोक द ग्रेट’ जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया है।

विज्ञापन
history of world cinema, Santosh Sivan an Indian cinematographer and film director
संतोष सिवन और उनके कैमरे से फिल्में - फोटो : Twitter

विस्तार

आपने ‘अशोक द ग्रेट’, ‘दिल से’, ‘रंग रसिया’, ‘मिस्ट्रेस ऑफ स्पाइसेस’, ‘प्राइड एंड प्रिजड्यूज’, ‘फिजा’, ‘पुकार’, ‘दिल से हिन्दुस्तानी, ‘दर्मियान- इन बिटवीन’, ‘बरसात’, ‘गर्दिश’, ‘रुदाली’, ‘रोजा’ में से कुछ फिल्में अवश्य देखी होंगी। यदि इनके निर्देशक का नाम पूछा जाए तो आपमें से कुछ लोग अवश्य बता पाएंगे। अगर इन फिल्मों के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों का नाम बताने को कहा जाए तो आपमें से अधिकांश लोग बता सकेंगे लेकिन यदि इन फिल्मों के सिनेमाटोग्राफर का नाम लेने को कहा जाए तो आपमें से विरला ही बता सकेगा।

विज्ञापन


फिल्मों की चमक-दमक भरी दुनिया ऐसी ही है। हम परदे पर हीरो-हिरोहिन को देखते हैं और उनके दीवाने हो जाते हैं। चूंकि फिल्म निर्देशक की होती है, प्रचार-प्रसार में भी उसका नाम आता है, तो उससे भी परिचित हो जाते हैं लेकिन जो फिल्म को परदे पर साकार करता है, उसे प्रकाश और छाया के माध्यम से उभारता है, जो परदे के पीछे रह कर परदे पर कमाल करता है, वह अनजाना रह जाता है।

विज्ञापन


संतोष सिवन-बेहतरीन सिनेमाटोग्राफर

आज मैं एक ऐसे ही कमाल के व्यक्ति संतोष सिवन से आपका परिचय कराने जा रही हूं। जैसा कि आपने इनके द्वारा संभाले कैमरे की कमाल की कुछ फिल्मों के नाम ऊपर देखे, यह तो सिद्ध हो जाता है कि संतोष सिवन बेहतरीन सिनेमाटोग्राफर हैं। लेकिन यह  बात बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक सिनेमाटोग्राफर होने के साथ ही एक कुशल सिने-निर्देशक भी हैं। इन्होंने टीवी सिरीज के साथ ‘सिन’, ‘बायोचेक’, ‘ईनाम’, ‘उरमी: द वारियर हू वांटेड टू किल वास्को ड गामा’, ‘केशु’ ‘तहान’, ‘बिफोर द रेन्स’, ‘आनंदभद्रम’, ‘नवरस’, ‘अशोक द ग्रेट’ जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया है। और अभिनेता भी वे हैं, एक प्रसिद्ध हिन्दी निर्देशक के अंतर्गत उन्होंने अभिनाय किया है।

विज्ञापन
विज्ञापन


संतोष सिवन का जन्म 8 फरवरी 1964 को तिरुअनंतपुरं में हुआ है। इन्हें अब तक छोटे-बड़े मिला कर 23 पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिसमें ‘अले किनो- इंटरनेशनल यंग ऑडियन्स फिल्म फेस्टिवल’ (फिल्म ‘द टेररिस्ट’), ‘द इंटरनेशनल इंडियन फिल्म अकादमी’ (फिल्म ‘अशोका द ’), ‘कैरो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ (‘माली’ फिल्म के लिए दो पुरस्कार) भी शामिल हैं। साथ ही पांच नेशनल अवार्ड इनकी झोली में हैं। इन्हें भारतीय सिनेमा में योगदान केलिए पद्मश्री की उपाधि (2014) प्राप्त हुई है।

एफ.टी.आई.आई से प्रशिक्षित संतोष सिवन ने फिल्मों में अभिनय भी किया है। ‘इंडियन सोसायटी ऑफ सिनेमाटोग्राफर्स’ के संस्थापक सदस्य संतोष सिवन ने डॉक्यूमेंट्री, लघु फिल्म तथा फीचर फिल्म मिला कर करीब 55-60 फिल्मों को परदे पर साकार किया है। ये ‘अमेरिकन सोसायटी ऑफ सिनेमाटोग्राफर्स’ के एशिया-पैसेफिक क्षेत्र के पहले फोटोग्राफर सदस्य हैं। इनके पिता भी शौकिया फोटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले रहे हैं।

history of world cinema, Santosh Sivan an Indian cinematographer and film director
संतोष सिवान - फोटो : Twitter

रवि वर्मा के किरदार में संतोष सिवन

संगीत सिवन एवं संजीव सिवन इनके दोनों भाई भी सिनेमा से जुड़े हुए हैं। एक मजेदार बात है, राजा रवि वर्मा पर कुछ साल पहले भारत में दो फिल्में बनीं। एक मलयालम में और एक हिन्दी में। 2011 में राजा रवि वर्मा के जीवन पर आधारित लेनिन राजेंद्रन निर्देशित मलयालम फिल्म ‘मकर मञ्ञ्’ में संतोष सिवन स्वयं राजा रवि वर्मा के किरदार के रूप में उपस्थित हैं और 2008 में प्रसिद्ध सिने-निर्देशक केतन मेहता ने हिन्दी में बनाई ‘रंग रसिया’ जो कई बरसों के इंतजार के बाद कहीं जाकर 2014 में रिलीज हुई। इसके सिनेमाटोग्राफर संतोष सिवन ही हैं।

दोनों फिल्मों का कथानक एक होते हुए भी दोनों के ट्रीटमेंट में जमीन-आसमान का अंतर है। एक ओस की नाजुक बूंद है, तो दूसरी ओलावृष्टि। ‘मकर मञ्ञ्’ ओस की बूंद की तरह वायवी और कोमल है, ‘रंग रसिया’ मुझे बहुत लाउड, भयंकर ओलावृष्टि की भांति लगी। ओलावृष्टि का अपना सौंदर्य होता है। पर वह काफी कुछ नष्ट कर डालती है। यह भी सच है कि दोनों फिल्मों में राजा रवि वर्मा के जीवन को यथार्थ और कल्पना के रंगों के समिश्रण से चित्रित किया गया है।

दोनों प्रसिद्ध निर्देशक का काम मौलिक है। इसके एक साल बाद 2012 में इन्होंने तमिल फिल्म ‘तुप्पाक्की’ (‘गन’) के एक गीत में थोड़ी देर केलिए अभिनय किया।

कैमरे, डार्करूम, फिल्म प्रोसेसिंग के साथ बड़े होने वाले इस फोटोग्राफर ने कई साक्षात्कार दिए हैं। एक साक्षात्कार में ये कहते हैं कि उनकी दादीमां खुद एक कलाकार थीं और इन्हें इस दिशा में बढ़ावा देती थीं। बदलते मौसम के साथ आकाश निहारते हुए इन्हें रंगों से लगाव हुआ। आज डिजिटल कैमरा आने से कई चिंताएं दूर हो गई हैं, साथ ही पहले मिलने वाला सरप्राइज भी समाप्त हो गया है।

पहले और अब की चुनौतियां

पहले सब मिल कर फिल्म शूट करने के बाद रशेस देखते थे और आवश्यकता पड़ने पर रि-शूट करते थे। आज फोटोग्राफर की स्वतंत्रता सीमित हो गई है। लेकिन इनका यह भी मानना है कि परिवर्तन महत्वपूर्ण है, यह विकास है। आप सीखने के साथ आगे बढ़ते जाते हैं। 

उदाहरण के लिए संतोष सिवन ‘रोजा’ फिल्म के गीत ‘रुकुमनी’ की बात करते हैं। वे कहते हैं कि यह एक बहुत कठिन सिक्वेंस था, जहां नाइट इफेक्ट के साथ एक 70 साल की स्त्री गा रही थी अत: असामान्य ध्वनि संकेत थे। आज इस गाने के बारे में सोचते हुए वे तथा इसके सिने-निर्देशक मणि रत्नम आश्चर्य करते हैं कि इन लोगों ने इसे कैसे किया?

आज तमाम तकनीकि विकास तथा वीएफएक्स के साथ करना यह बहुत आसान होगा। लेकिन उन दिनों यह बहुत बड़ी चुनौती थी, साथ ही इसे करने में इन लोगों को मजा भी बहुत आया था। वैसे चुनौतियां आज भी कम नहीं हुई हैं।

‘दलपति’ में रजनीकांत को फिल्माने वाले और रजनीकांत की ऊर्जा और उनकी सादगी के प्रशंसक इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति का कहना है कि वे सिनेमाटोग्राफी के अलावा ढेरों और काम करते हैं। वे डॉक्यूमेंट्री फिल्म, कमर्शियल विज्ञापन बनाते हैं। उन्होंने एक फिल्म को विभिन्न अभिनेताओं को लेकर दो भिन्न संस्करण में बनाया है, योगी बाबू तथा मंजू वारियर को लेकर बनी फिल्म ‘सेंटीमीटर्स’ फिल्म को प्रड्यूस किया है। उन्हें घुमक्कड़ी के साथ फोटो खींचना रास आता है।

विभिन्न काम करने और जीवन के विभिन्न पलों की प्रशंसा करने के कारण बस काम पूर्ण हो गया। बस अब और नहीं करना है, ऐसा नहीं सोचते अथवा अनुभव करते हैं। नाम भले ही संतोष है मगर कभी अपने काम को पूर्ण नहीं मानते हैं। उससे संतुष्ट नहीं होते हैं। असंतुष्टि उन्हें और काम करने, और अच्छा काम करने की ओर प्रेरित करती रहती है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed