फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   history of world cinema Madhu Ambat Indian cinematographer movies

मधु अंबाट: कला और कमर्शियल दोनों सिनेमाटोग्राफी में माहिर

Fri, 31 May 2024 04:09 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Fri, 31 May 2024 04:09 PM IST
सार

मधु अंबाट मुख्यरूप से मलयालम एवं तमिल फिल्मों की फोटोग्राफी करते हैं। मगर उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों की फोटोग्राफी भी की है। सई परांजपे की हिन्दी फिल्म ‘दिशा’ (इस नाम से कई बार अलग-अलग निर्देशकों ने फिल्म बनाई है) का कैमरा मधु ने पकड़ा हुआ था।

विज्ञापन
history of world cinema Madhu Ambat Indian cinematographer movies
भारतीय सिनेमा - फोटो : istock

विस्तार

आपमें से कुछ लोगों ने उस समय तक की एकमात्र संस्कृत फिल्म ‘शंकराचार्य’ (1983) देखी होगी। ‘स्वाति तिरुनाल’, ‘अमरम’ का नाम शायद नहीं सुना होगा, कोई बात नहीं। अक्सर हम बाहर की फिल्में देखते-सराहते हैं, देश की अन्य भाषा की फिल्में कदाचित देखते हैं लेकिन आपने संजय दत्त, उर्मिला मतोंडकर अभिनीत सिने-निर्देशक संजय छेल की ‘खूबसूरत’ देखी होगी।

विज्ञापन


चार पुरस्कार प्राप्त मणिरत्नम की ‘अंजलि’ अवश्य देखी होगी। मुख्य रूप से तमिल में बनी यह फिल्म हिन्दी में भी डब हुई और खूब चली। इलई राजा के संगीत से सजी इस फिल्म ने एक समय सबका मन मोह लिया था। बाल कलाकार अंजलि (शामली) की अभिनय प्रतिभा के दर्शक-समीक्षक सब कायल हो गए थे। उसे इसके लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
विज्ञापन


बाल कलाकार से अभिनय करवा पाना और उसे कैमरे से पकड़ पाना सबके बस का नहीं है। सत्यजित राय इसमें पारंगत थे। इसके लिए विशेष कुशलता चाहिए होती है। शामली के अंजलि अभिनय करवाया है मणि रत्नम ने और इसको कैमरे में कैद किया है मधु अंबाट ने। उन्होंने अंजलि के रूप में बच्ची शामली की प्रत्येक भंगिमा को संभाल कर परदे पर प्रस्तुत किया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

हिन्दी फिल्म ‘दिशा’

मधु अंबाट मुख्य रूप से मलयालम एवं तमिल फिल्मों की फोटोग्राफी करते हैं। मगर उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों की फोटोग्राफी भी की है। सई परांजपे की हिन्दी फिल्म ‘दिशा’ (इस नाम से कई बार अलग-अलग निर्देशकों ने फिल्म बनाई है) का कैमरा मधु ने पकड़ा हुआ था। दिशा फिल्म में शबाना आजमी, नाना पाटेकर, ओमपुरी तथा रघुवीर यादव आदि ने मुख्य भूमिकाएं की हैं।


बारह साल से भुखरी में परसाराम (ओम पुरी) है कुंआ खोदते हुए ‘पगला परसा’ का  खिताब पा गया है। उसकी पत्नी हंसा (शबाना आज़मी) बीड़ी फैक्टरी में काम करती, भाई सोमा सरपत (रघुवीर यादव) को कभीकदा खेतों में काम मिल जाता है। उनका पड़ोसी वसंत (नाना पाटेकर) का हाल में विवाह हुआ है। फिल्म मजदूरों के जीवन की कई परतें खोलती है। मधु ने गांव और शहर दोनों को समग्रता में परदे पर उतारा है।

सोना उर्वशी की हिन्दी फिल्म ‘चुपके से’ (2003) तथा हिन्दी ‘लज्जा’ (नि. राजकुमार संतोषी) फिल्म की फोटोग्राफी मधु अंबाट की है, जिसमें चार स्त्रियां पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष करती हैं। माधुरी दीक्षित को इस फिल्म के लिए उस वर्ष का सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री का जी-सिने अवार्ड मिला था। 

हिन्दी के अलावा मधु ने कन्नडा और इंग्लिश (‘प्रेइंग विद एंगर’, ‘प्रवोक्ड: ए ट्रू स्टोरी’, ‘शूट ऑन साइट’ तथा स्वामी विवेकानंद) फिल्म की सिनेमाटोग्राफी भी की है। ‘प्रवोक्ड’ एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म थी और वास्तविक स्त्री तब तक जीवित थी।

एक बांग्ला फिल्म भी मधु के खाते में है। उनके नाम पर 12 पुरस्कार तथा 93 फिल्में मिलती हैं। उन्हें सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफी का नेशनल फिल्म अवार्ड तीन बार मिला। जिसमें 1984 की संस्कृत फिल्म ‘आदि शंकराचार्य’, 2006 की तमिल फिल्म ‘शृंगारम्’ तथा 2010 की मलयालम फिल्म ‘एडमिन्टे मकन अबु’ शामिल हैं।

सिनेमाटोग्राफर मधु अंबाट ने ‘एन ओड टू लॉस्ट लव’ का लेखन किया तथा ‘सरिता’ की कहानी और स्क्रीनप्ले भी लिखा है। मधु अंबाट का जन्म 6 मार्च 1950 को केरल में हुआ, वे विश्व प्रसिद्ध मैजिशियन प्रोफेसर भाग्यनाथ के बेटे हैं। मधु की छोटी बहन विधु बाला एक समय मलयालम की अभिनेत्री हुआ करती थी।

मधु अंबाट ने वयोवृद्ध निर्देशक जी. वी. अय्यर के साथ काम किया है तो युवा मनोज ‘नाइट’ श्यामलान के साथ भी वे सहज हैं।

शोभा वारियर को एक साक्षात्कार में बताया, मनोज ने उनके काम की विभिन्नता देखी थी और उन्होंने ‘प्रेइंग विद एंगर’ के लिए सिनेमाटोग्राफी का प्रस्ताव उन्हें दिया। मनोज उस समय मात्र 21 वर्ष के युवा थे और उनकी यह पहली फ़िल्म थी। मधु को उनकी स्क्रिप्ट पसंद आई, क्रिप्ट में सेंटीमेंट्स और इमोशन का सही अनुपात था, लंबी वार्ता के बाद काम शुरू हुआ।

अगर स्क्रिप्ट तैयार है तो मधु काम प्रारंभ करने के पूर्व स्क्रिप्ट देखना पसंद करते हैं, अन्यथा कथानक सुनते हैं। जब वे कहानी सुन रहे होते हैं तभी मानसिक रूप से विजुअल्स उनके दिमाग में बनने लगते हैं, साथ ही हर फिल्म के साथ वे अपनी शैली बदलते हैं। उनकी प्रत्येक फिल्म की भिन्न तरह से शूट होती है। वे निर्देशक के विजुअल पैटर्न की साम्यता से काम करते हैं।

जब निर्देशक की अनुभूति उन्हें जंचती है वे उसके साथ काम करते हैं। उन्हें नए निर्देशकों के साथ काम करना अच्छा लगता है क्योंकि उनमें उत्साह होता है पहली फिल्म होने के कारण वे उसमें काफी श्रम करते हैं। अत: उन्होंने मनोज ‘नाइट श्यामलान के साथ काम किया। दोनों की खूब अच्छी ट्यूनिंग थी।

history of world cinema Madhu Ambat Indian cinematographer movies
सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik

‘खूबसूरत’ फिल्म संजय छेल की पहली फिल्म थी। मधु को चुनौतीपूर्ण कार्य करने में मजा आता है। अगर निर्देशक का काम पहले से उपलब्ध है, तो वे उसे देख कर उसके साथ काम करना या न करना तय करते हैं। मणिरत्नम का काम उन्होंने पहले देखा था, इसीलिए उनके साथ ‘अंजलि’ की सिनेमाटोग्राफी स्वीकारी।

वे साक्षात्कार में हॉलीवुड और भारतीय कार्यशैली का अंतर बताते हैं। जैसे हैदराबाद, मद्रास से भिन्न है, मद्रास केरल से अलग है वैसे ही भारतीय और हॉलीवुड कार्यशैली में भिन्नता है। वहां हर विभाग के तकनीशियन अलग होते हैं, अतिरिक्त मशीनें होती हैं, ताकि जरूरत पर उनका उपयोग हो और समय, पैसा एवं श्रम का तनिक भी नुकसान न हो। वहां स्टोरीबोर्ड होना अत्यावश्यक है।

निश्चित समय सीमा के भीतर काम समाप्त करना होता है। हॉलीवुड में लोग अधिक प्रोफेशनल हैं। मधु अंबाट को आर्ट फिल्म और कमर्शियल दोनों फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी का अनुभव है, उन्हें दोनों तरह की फिल्मों के लिए काम करना रास आता है। वे 100 मिलियन की फिल्म कर सकते हैं, साथ ही छोटे बजट की भी।

मलयालम फिल्म ‘लव लेटर’

मधु अंबाट का कार्य समीक्षकों को प्रभावशाली लगता है। बहुत कम समीक्षक कैमरामैन के काम को रेखांकित करते हैं। 26 पुरस्कार प्राप्त तेलगु फिल्म ‘इतलु अम्मा’ की समीक्षा करते हुए एक समीक्षक प्रदीप कामदान ने मधु के काम को प्रभावशाली कहा है। उनके काम की गुणवत्ता का कुछ श्रेय उनके प्रशिक्षण संस्थान, पुणे के फिल्म एंड टेलिविजन इंस्ट्यूट ऑफ इंडिया को भी जाता है। शुरू में उन्होंने कुछ डॉक्यूमेंट्री बनाई और प्रशिक्षण के बाद पहले पहल बालकृष्णन निर्देशित मलयालम फिल्म ‘लव लेटर’ (1974) की सिनेमाटोग्राफी की थी।

मधु अंबाट के जीवन में के एस सेतुमाधवन का बहुत प्रभाव रहा है। एम टी वासुदेवन की कहानी पर बनी ‘ओपोल’ (चार पुरस्कारों से नवाजी) नामक मलयालम फिल्म का निर्देशन सेतुमाधवन का है और कैमरा मधु ने संभाला है। इसके बाद से सेतुमाधवन को मधु अपना मेंटोर तथा शुभचिंतक मानते हैं। प्रसिद्ध मलयाली निर्देशक भरतन के साथ भी मधु अंबाट ने ‘अमरम्’, ‘वैशाली’ तथा ‘पाथेयम्’ जैसी क्लासिकल फिल्में की हैं। आज भी ये फिल्में मलयाली दर्शक की प्रशंसा पाती हैं। 

मधु अंबाट को भारत का ही नहीं एशिया का सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफर माना जाता है।

-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed