फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   history of world cinema Gregg Toland American cinematographer and his movies

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ग्रेग टोलैंड- सिटीजन केन को अमर करने वाला

Tue, 14 May 2024 07:24 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 14 May 2024 07:24 PM IST
सार

ग्रेग टोलैंड ने यहां पर अत्यंत कम रोशनी में काम किया है। कारण है कई दृश्य रात के समय के हैं, जिसके लिए कम प्रकाश में काम होना था साथ ही ढ़ेर सारे शॉट्स उजाड़ में फिल्माए गए हैं। इसका इतिहास में दर्ज वह दृश्य स्मरण कीजिए, जहां टॉम और प्रचारक आमने-सामने हैं, टॉम का मात्र सिल्हुट नजर आता है।

विज्ञापन
history of world cinema Gregg Toland American cinematographer and his movies
सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik

विस्तार

अमेरिकन सिनेमाटोग्राफर ग्रेग टोलैंड ने अपने समय के दिग्गज सिने-निर्देशकों के साथ काम किया और सिने-इतिहास में अपने लिए स्थान सुरक्षित किया। उनके खाते में 68 फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी दर्ज है जिनमें कई फिल्म आज भी देखी-सराही जाती हैं।

विज्ञापन


कालजयी फिल्म ‘सिटीजन केन’ के अध्ययन के बिना सिनेमा का प्रशिक्षण नहीं हो सकता है। ऑर्सन वेल्स के पास कहानी थी, विचार था, अभिनेता और अभिनय था... इन सबको परदे पर मूर्तिमान किया ग्रेग टोलैंड ने। अपनी सिनेमाटोग्राफी से इस फिल्म को अमर कर दिया। ऑर्सन वेल्स के यहां जो डीप फोकस, प्रकाश-छाया, शैडो का जादू, क्लोजअप्स हम देखते हैं वह इसी फोटोग्राफी का कमाल है। डीप फोकस ग्रैग टोलैंड की विशेषता थी।
विज्ञापन


29 मई 1904 को अमेरिका में जन्मे ग्रेग टोलैंड का जन्म का नाम ग्रेग वेस्ली टोलैंड था। वे जेनी तथा फ्रैंक की इकलौती संतान थे। पति से तलाक के बाद जेनी बेटे को लेकर कैलीफोर्निया चली गई। मां-बेटे ने कई फिल्म वालों के यहां काम किया। मां लोगों के यहां गृह सेविका थी। फिल्मों के सवाक होने पर कैमरे में शोर कम करने केलिए साउंडप्रूफ बूथ चाहिए थे। ग्रेग ने शोर कम करने का उपकरण विकसित किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


डीप फोकस और फिल्म बनाने में जनत्रंत लाने वाले, ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति टोलैंड की 26 सितम्बर 1948 को कैलीफोर्निया में शराब की कु-लत से असमय मृत्यु हुई। असल में वे कैमरा पकड़ कर सर्वाधिक प्रसन्न होते थे और जब कैमरा न पकड़े होते तो उदास-निराश हो जाते और शराब का सहारा लेते थे।

डीप फोकस कैमरे की वह कला है जो किसी दृश्य में सारी चीजों को स्पष्ट दिखाता है। डीप फोकस में दृश्य का बैकग्राउंड, मिडिलग्राउंड, फॉरग्राउंड यानी सब कुछ साफ-साफ नजर आता है। ऑर्सन वेल्स खुले दिल से टोलैंड से फोटोग्राफी कला सीखने की बात स्वीकारते हैं। वेल्स के अनुसार उन्होंने जिनके साथ काम किया वे ग्रेग टोलैंड न केवल महान कैमरामैन थे वरन सबसे तेज भी थे।

1931 में पहली बार उन्हें ‘पामी डेज’ फिल्म के लिए क्रेडिट मिला और आठ साल बाद 1939 में उन्हें पहला ऑस्कर मिल गया। ऐसा कमाल का उनका कैमरावर्क था। विलियम वायलार ने एमिली ब्रॉन्टी की क्लासिक रचना ‘बदरिंग हाइट्स’ पर इसी नाम से पौने दो घंटे की फ़िल्म बनाई थी। इस अमर प्रेम कहानी फिल्म की नायिका कैथी (मर्ले ओबेरॉन) की खूबसूरती को दर्शकों तक पहुंचाने में ग्रेग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इस फ़िल्म को वे खुद एक सॉफ्ट, डिफ़्यूज्ड पिक्चर, एक फंतासी कहते हैं। मोमबत्ती रोशनी का प्रभाव, रोमांटिक प्रकृति, क्लोजअप्स, बर्फ़, कोहरा सब मिल कर दर्शकों को किसी अन्य लोक में ले जाता है। लेकिन इस फिल्म में विकट, निष्ठुर दृश्य भी हैं, जिनके लिए फोटोग्राफर ने लो एंगल्स, डॉर्क शेडोज और कभीकदा डीप फोकस का प्रयोग किया है। इन्हीं सब कारणों से क्रेडिट के रूप में परदे पर अलग से नाम लिखे जाने वाले कदाचित वे पहले कैमरामैन हैं। कोई आश्चर्य नहीं वे अपने समय के सर्वाधिक मेहनताना पाने वाले कैमरामैन थे।

1940 की फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’

याद करें उनके द्वारा फिल्माई गई 1940 की फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’। दो घंटे से कुछ मिनट ऊपर की इस फ़िल्म का आधार नोबेल (1939) पुरस्कृत साहित्यकार जॉन स्टीनबेक का इसी नाम का उपन्यास है। मगर इस फिल्म में स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में वेक और नाम नननैली जॉनसन भी जुड़ा है। इस फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध सिने-निर्देशक जॉन फ़ोर्ड ने किया है। फ़िल्म ‘ग्रेप्स ऑफ़ रॉथ के अभिनेता हैं, हेनरी फ़ोंडा, जेन डैरवेल तथा जॉन कैरराडाइन। फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’ ने दो ऑस्कर जीते।

फिल्म की एक विशेषता है, इसमें प्रत्येक शॉट का सावधानीपूर्वक फिल्मांकन होना, कोई शॉट रुटीन ढ़ंग से नहीं लिया गया है। कहानी अमेरिका की महामंदी के दौर में बेघर हुए लोगों से संबंधित है, खासतौर पर ओक्लाहामा के एक परिवार की गरीबी, हताशा भरी जिंदगी से जुड़ी हुई है। ये लोग अपने खेतों-जमीन से उखड़ कर कैलीफ़ोर्निया की ओर प्रवास करने जा रहे हैं। 

history of world cinema Gregg Toland American cinematographer and his movies
सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock

ग्रेग टोलैंड ने यहां पर अत्यंत कम रोशनी में काम किया है। कारण है कई दृश्य रात के समय के हैं, जिसके लिए कम प्रकाश में काम होना था। साथ ही ढ़ेर सारे शॉट्स उजाड़ में फिल्माए गए हैं। इसका इतिहास में दर्ज वह दृश्य स्मरण कीजिए, जहां टॉम और प्रचारक आमने-सामने हैं, टॉम का मात्र सिल्हुट नजर आता है।

टॉम तथा प्रचारक (प्रीचर) को डीप फोकस के साथ प्रयोग करने वाले ग्रेग टोलैंड ने एकमात्र मोमबत्ती की रोशनी में इसे फिल्माया है। इस फिल्म में टोलैंड की फोटोग्राफी लेखन की शैली से पूरी तरह तालमेल बैठाते हुए न्याय करती है। रात के प्रभाव में भी कोई रोमांस अथवा रहस्य का प्रभाव नहीं है, मात्र यथार्थ नजर आत है।

ग्रेग टोलैंड ने सिनेमाटोग्राफी

ग्रेग टोलैंड ने सिनेमाटोग्राफी की कला और क्राफ्ट को एक ऊंचाई प्रदान की। कैमरावर्क में वे एक भरी-पूरी विरासत छोड़ गए हैं। दुबले-पतले ग्रेग जब कैमरे की बात करते तो उनका उदास चेहरा खूब खिल उठता। वे कठिन-से-कठिन परिस्थिति में घंटों कैमरा पकड़ कर काम कर सकते थे। उन्होंने बिना किसी सहायक के अपना कार्य प्रारंभ किया था। उनके भीतर कुशलता के साथ एक नैसर्गिक कलात्मक प्रतिभा थी।

उन दिनों अक्सर रंगीन फोटोग्राफी केवल म्युजिकल फिल्म के लिए होती थी और ग्रेग को रंगीन फोटोग्राफी नापसंद थी। उन्हें स्टार सिस्टम भी पसंद नहीं था। उनके अनुसार स्टार सिस्टम व्यक्ति के साथ पिक्चर बनाता है, कहानी के साथ नहीं, इस सिस्टम के लिए वह बाकी सब चीजों की बलि चढ़ा देता है। लेकिन ‘इंटरमेज़ो’ से फ़िल्मों अमेरिकी फ़िल्मों में प्रवेश करने वाली स्वीडिश अभिनेत्री इन्ग्रिड बर्गमैन की ताजगी और सौंदर्य को हल्के क्लोजअप्स में पकड़ कर परदे पर खुद उन्होंने ऐसा प्रसिद्ध किया कि जब वह गुजरी तब भी उसके प्रशंसकों की एक लम्बी लाइन थी। उस जमाने की प्रचलित मान्यता के अनुसार उसका शरीर काफ़ी बड़ा था।

वे फिल्म की प्रि-प्लानिंग टीम के साथ हफ़्तों पहले काम शुरू कर देते थे। विक्टर ह्यूगो के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘ले मिजराबल्स’ पर वैसे तो कई फिल्म बनी है, 1935 में बनी इस फिल्म की फोटोग्राफी ग्रे टोलैंड ने की है और उसका पेरिस के नाला का खदेड़ने वाला दृश्य लाजवाब है। इसी तरह ‘डेड एंड’ (1937) में ग्रेग ने न्यूयॉर्क की एक बस्ती में विशाल इनडोर सेट में स्टेज प्ले का कमाल का फ़िल्मांकन किया है।

ग्रेग टोलैंड ने ‘द लॉन्ग वोयाज होम’ (1940), ‘द लिटिल फोक्सेस’ (1841), ‘बॉल ऑफ़ फ़ायर’ (1841), ‘द किड फ़्रॉम ब्रूकलिन’ (1845) ‘द बेस्ट इयर्स ऑफ़ अवर लाइव्स’ (1946), ‘द बिशप’स वाइफ’ (1847) जैसी यादगार फिल्मों की सिनेमाटोग्राफ़ी ग्रेग टोलैंड ने की और सिने-इतिहास में एक महत्वपूर्ण, अनुकरणीय सदा केलिए दर्ज हो गए। इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले नए लोग ग्रेग टोलैंड से बहुत कुछ सीख सकते हैं।



--------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed