गाड़िया लोहार: प्रतिज्ञा तोड़कर आगे बढ़ने का समय
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दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में लगभग चालीस हजार गाड़िया लोहार रहते हैं। महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा से बंधे ये लोग अब चाहते हैं कि इनके बच्चे भी व्यवस्था में शामिल हों और अपना भविष्य संवारें। बच्चों के भविष्य की खातिर अगर पुरानी परंपराएं तोड़नी पड़ें, तो पुरखे नाराज नहीं होते, बल्कि आशीष बनकर बरसते हैं।
प्रतिज्ञा के मूल में एक लंबी कथा सांस लेती है। इसमें गहन दुख, आक्रोश, हिम्मत और भविष्य की सुखद आस एक साथ महसूस होती है। यह अपने वर्तमान का प्रतिरोध भी हो सकती है और एक सुंदर सपने की परिकल्पना भी। ऐसी ही एक प्रतिज्ञा गाड़िया लोहारों ने भी ली थी। जो समय के साथ और इस्पाती होती गई। पर अब लगता है कि महाराणा के वंशजों के लिए प्रतिज्ञा तोड़ने का सही समय आ गया है। वे पढ़ रहे हैं, बढ़ रहे हैं और अपने डेरे के स्थायी होने का सपना भी देख रहे हैं।
गाड़िया लोहार’ एक ऐसा समुदाय जिसकी गाड़ी ही उसका घर है। इनकी सजी-धजी गाडि़यां इनकी पहचान हैं। इन्हीं गाड़ी के चक्कों में इनके घर-परिवार के लगातार चलते रहने की कील लगी है। इसी कील में कहीं बरसों पुरानी प्रतिज्ञा आज भी बंधी है। आखिर क्या़ थी वह प्रतिज्ञा।
बात तब की है जब सोलहवीं शताब्दी में महाराणा प्रताप का मुगलों से संघर्ष चल रहा था। गाडि़या लोहारों के पूर्वज महाराणा की ही सेना में थे। मुगलों से संघर्ष में महाराणा की हार हुई और इनका राज्य मेवाड़ मुगलों के हाथ चला गया।
हारे हुए महाराणा की सेना के इन्हीं इस्पाती जवानों ने कसम खाई कि जब तक मेवाड़ और चित्तौड़ पर फिर से महाराणा प्रताप सिंह सिसौदिया का राज नहीं हो जाता तब तक वे अपने घर मेवाड़ नहीं लौटेंगे। बस तभी से ये चल रहे हैं।
दशकों बीते, शताब्दियां बीतीं पर इन्होंने प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। यही प्रतिज्ञा इनके समुदाय की पहचान बन गई है। वे गाड़ी में अपनी गृहस्थी जमाते हैं और निकल पड़ते हैं अनजान राह की ओर। राजस्थान के मेवाड़ से निकले गाड़िया लोहार अब देश के कई राज्यों तक पहुंच गए हैं। इस सफर में लोहे को अपने मनोनुकूल आकार में ढालने का इनका हुनर इनके साथ है।
पहले जहां ये महाराणा प्रताप की सेना के लिए हथियार बनाया करते हैं, वहीं अब ये बदलते समय के साथ घर और खेतों में काम आने वाला लोहे का सामान बनाकर बेचते हैं। तवा, कड़ाही, चिमटा से लेकर फावड़ा, छैनी, हथौड़ा भी। समय की धूल,धूप, आंधी, बारिश में भी इनका हुनर ही इनके सिर की छत और पांव तले की जमीन रहा।
अपनी गाड़ी में अपनी गृहस्थी लेकर चलते गाड़िया लोहार अब देश भर में फैल गए हैं। मूलत: राजस्थात के मेवाड़ के रहने वाले इस समुदाय के लोग राजस्थान के अब हर जिले में मौजूद हैं। इनके ज्यादातर डेरे गांवों के बाहर लगते हैं। इसकी वजह है कि यह अन्य किसी समुदाय के साथ मेलजोल ज्यादा पसंद नहीं करते हैं। इनका खानपान और रिश्तेदारियां भी अपने ही समुदाय में होती हैं। अब भी इनकी भाषा मेवाड़ की ही महक लिए हुए है।
पहनावा और पारीवारिक ढांचा अब भी वही है। जीवनशैली के हिसाब से इन्हें घुमंतू समुदाय की श्रेणी में रखा गया है। अनुसूचित जनजाति में शामिल न होने के कारण अभी भी इनके कल्याण के लिए उस तरह के प्रयास नहीं किए जा सके हैं, जैसे आदिम और जनजातीय समुदायों के लिए होते रहे हैं।
प्रो.एसपी रुहेला ने वर्ष 1960 में राजस्थान की घुमंतू जातियों पर गहन शोध किया था। अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर प्रोफेसर रुहेला ने इन घुमंतू जातियों के बच्चों के बारे में अच्छी खासी जानकारियां इकट्ठी की थीं। जिस पर बाद में उन्होंने 1997 में एक छोटी सी किताब भी प्रकाशित की।
चिल्ड्रन ऑफ इंडियन नोमेड्स शीर्षक की इस 70 पृष्ठ की किताब में चार घुमंतू जातियों के बच्चों पर उल्लेखनीय जानकारी दी गई है। इन्हीं में से एक हैं गाड़िया लोहार समुदाय के बच्चे। गाड़िया लोहार समुदाय के बच्चे अपने पूर्वजों की प्रतिज्ञा के कारण एक अभावग्रस्त बचपन को जीने को मजबूर हैं। कभी भी सजती गाड़ी, कभी भी उठते डेरे के कारण इन्हें वह स्थायी जीवन नहीं मिल पा रहा है जो बच्चों के पोषण और विकास के लिए जरूरी है।
शताब्दियों पुराना इनका व्यवसाय इनके लिए दो वक्त की रोटी भी बहुत मुश्किल से जुटा पाता है। इनके माता-पिता इसके लिए दिन भर कड़ी मशक्कत करते हैं। अपनी उम्र तक पहुंचते बच्चे भी लोहा पीटने का हुनर सीख लेते हैं। तपते लोहे के बीच इनका बचपन कहीं कुम्हला जाता है। ये पोषण और शिक्षा दोनों से ही वंचित रह जाते हैं।
राजस्थांन के अलावा उसके साथ लगते राज्यों में भी इनके डेरे सड़क किनारे लगे देखे जा सकते हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के साथ ही दिल्लीं में भी इनकी अच्छी तादाद है। समय बदलने के साथ ही ऐसे बहुत से लोग हैं जो इनके कल्याण के लिए आगे आए हैं। 2014 से गठित महामना मालवीय मिशन के वालंटियर इन समुदायों के बीच काम कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रकाश गौतम इसी संस्था के साथ जुड़े हैं और पिछले कई वर्ष से गाड़िया लोहार समुदाय के विकास के लिए काम कर रहे हैं। प्रकाश गौतम बताते हैं कि दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर इनके 55 डेरे हैं। जहां ये अपने समुदाय के साथ रहते हैं। इन सबको मिलाकर बात की जाए तो दिल्ली में इनकी आबादी तकरीबन चालीस हजार के आसपास होगी।
वे कहते हैं- वर्ष 2014 में मालवीय मिशन के साथ जुड़कर हमने इस समुदाय के बीच जाकर काम करना शुरू किया था। हम महामना मालवीय मिशन की इंद्रप्रस्थ़ शाखा संभालते हैं। हमारा ज्यादा ध्यान बच्चों की शिक्षा की ओर है। अगर ये बच्चे पढ़ जाते हैं तो बहुत हद तक इनका जीवन स्तर सुधारा जा सकता है। इनकी भाषा, इनकी संस्कृति, इनके समुदाय के बीच मौजूद एकता इनकी ताकत है।
अब इस समुदाय के बच्चे पढ़ने में भी दिलचस्पी ले रहे हैं। पर पिछड़ेपन और आर्थिक अभाव के चलते वे अपनी इस ख्वाहिश को पूरा नहीं कर पा रहे थे। हमने उनके इसी अभाव को दूर कर इनकी मदद करने की कोशिश की है।
हम इनके परिवारों को जागरुक कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए राजी करते हैं। साथ ही जो बच्चे स्कूल जा रहे हैं, वे पढ़ाई में पीछे न रहें इसके लिए सप्लीमेंटरी क्लासेज अर्थात् ट्यूशन देने की हमने व्यवस्था की है। पूरी दिल्ली़ में हमारे वालंटियर काम कर रहे हैं। जो हर रोज इन बच्चों को पढ़ाई में मदद देने के लिए सप्लीमेंटरी क्लासेज देते हैं।
दिल्ली एनसीआर में हमारे 23 सेंटर हैं। जिनमें पढ़ने आने वाले बच्चों की संख्या 450 तक पहुंच गई है। यह एक उत्साहवर्धक संख्या है। इससे हमें उम्मीद बंध गई है कि इनकी अगली पीढ़ी अपने पूर्वजों की प्रतिज्ञा के कारण अपने आने वाले भविष्य को बर्बाद नहीं करेगी। जितने बच्चे शिक्षित होंगे उनमें और उनके परिवारों में अपने भविष्य के प्रत जागरुकता उतनी ही बढ़ेगी।
सुंदर भविष्य के लिए स्थायीत्व बहुत जरूरी है। जब ये एक जगह टिककर रहेंगे तो इनके भविष्य के लिए काम करना, कल्यायणकारी योजनाओं में इन्हें शामिल करना ज्यादा आसान हो पाएगा। इनकी घुमंतू प्रवृति ही इनके विकास की सबसे बड़ी अवरोधक है। अब लगता है कि इस परंपरा को तोड़ने का सही समय आ गया है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।