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माओवाद पर चर्चा: लोकतंत्र की विसंगतियों की कोख से जन्मा है माओवाद, यह केवल गोलियों से मरने वाला नहीं

Tue, 27 Sep 2022 02:25 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 27 Sep 2022 02:25 PM IST
सार

माओवाद सामाजिक असंतोष की उपज है और यही असन्तोष उनकी खुराक, शक्ति और प्रेरणा भी है। सच्चाई यह है कि हम माओवादियों को तो मार सकते हैं मगर माओवाद को नहीं मार सकते। आदमी को गोली से मारा जा सकता है मगर विचार को बंदूक की गोली से नहीं मारा जा सकता।

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History and Origin of Naxalism in India Left Extremism and Maoism
सत्ता परिवर्तन का रास्ता बुलेट (गोली) नहीं बल्कि बैलेट (वोट) है। - फोटो : गृह मंत्रालय

विस्तार

गृहमंत्रालय का दावा है कि उसकी जीरो टाॅलरेंस की नीति और कुशल रणनीति के चलते देश में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई अंतिम चरण में पहुंच गई है। वर्ष 2010 में देश के 96 जिले नक्सल हिंसा से प्रभावित थे और अब उग्र वामपंथ 36 जिलों तक सिमट कर रह गया है। यह भी दावा है कि 2018 के मुकाबले 2022 में वामपंथी उग्रवाद संबंधी हिंसा की घटनाओं में 39 प्रतिशत और सुरक्षा बलों के बलिदानों की संख्या में 26 प्रतिशत की कमी आई है। इसी तरह नागरिक हताहतों की संख्या में 44 प्रतिशत की कमी आई है। नक्सल हिंसा की शिकायतों वाले जिलों की संख्या में 24 प्रतिशत की कमी आई है।

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सरकार का यह दावा निश्चित रूप से सुखद है, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का रास्ता बुलेट (गोली) नहीं बल्कि बैलेट (वोट) है। वैसे भी इस देश को अहिंसा के हथियार से ही आजादी मिली थी। भारत में मुख्यधारा का वामपंथ भी बुलेट के बजाय बैलेट में आस्था प्रकट कर लोकतांत्रिक धारा में स्वयं को समाहित कर चुका है। यह भारत का वामपंथ ही है जिसने केरल में सन् 1957 में दुनिया की पहली बैलेट से चुनी गयी कम्युनिस्ट सरकार बनाई थी।
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माओवाद के खिलाफ लड़ाई अंतिम दौर में बताना जल्दबाजी

सरकारी दावों पर न भी जाए तो भी देश में माओवादी हिंसा में कमी जरूर नजर आ रही है। माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र के सिमट जाने का दावा भी सही हो सकता है। लेकिन माओवादियों के खिलाफ लड़ाई को अंतिम दौर में बताना अभी जल्दबाजी ही होगी। जिन जिलों से माओवाद का सफाया किया जा रहा है वहां दोबारा माओवाद के नहीं लौटने की गारंटी कोई नहीं दे सकता।
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दरअसल भारत सरकार अपनी सफलता को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में किए गए विकास के बजाय हिंसक हमलों की संख्या के आधार पर माप रही है। जबकि यह देखा जाता है कि पुलिस द्वारा किसी क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद भी, प्रशासन उस क्षेत्र के लोगों को आवश्यक सेवाएं प्रदान करने में विफल रहता है और फिर उग्रवाद के दोबारा पांव पसारने की पूरी आशंका रहती है।

माओवाद को मारना कठिन

सच्चाई यह है कि हम माओवादियों को तो मार सकते हैं मगर माओवाद को नहीं मार सकते। आदमी को गोली से मारा जा सकता है मगर विचार को बंदूक की गोली से नहीं मारा जा सकता। आज तक ऐसी बन्दूक नहीं बनी जो कि सीधे आदमी के दिमाग में घुस कर किसी विचार को मार सके। इस समस्या की जड़ ही इसका समाधान भी है।

History and Origin of Naxalism in India Left Extremism and Maoism
माओवाद हमारे लोकतंत्र की विसंगतियों की कोख से ही जन्मा हुआ है और हमारा ध्यान विसंगतियों की ओर कम और बंदूक पर ज्यादा है। - फोटो : गृह मंत्रालय

माओवाद के पीछे के कारण

नक्सलवाद, कानून व्यवस्था के लिए समस्या अवश्य है। इसके पीछे क्षेत्रीय असंतुलन के कारण को भी नकारा नहीं जा सकता। इन दोनों चुनौतियों से तो कोशिश करके निपटा जा सकता है और सरकार इन दोनों मोर्चों पर काम कर भी रही है। माओवाद को कुचलने के लिए सुरक्षाबलों को अत्याधुनिक बनाया जा रहा है।

आर्थिक पिछड़पेन को दूर करने के लिए 2009 में एकीकृत कार्य योजना के तहत कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र झारखण्ड, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में अभियान चलाया गया था। इस अभियान में माओवादियों के खिलाफ केवल हथियारों का सहारा नहीं लिया गया बल्कि प्रभावित जिलों में ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने तथा पिछड़े और आदिवासी क्षत्रों में बुनियादी सुविधाओं के विकास पर भी जोर दिया गया था।

वह योजना भी पूरी तरह सफल तो नहीं रही मगर हम कह सकते हैं कि नक्सलियों की बंदूकें कुछ सीमा तक और कुछ समय तक खामोश अवश्य रहीं। लेकिन समस्या का समाधान अब तक नहीं हुआ।

लोकतंत्र की विसंगतियों की कोख से जन्मा है माओवाद

दरअसल माओवाद हमारे लोकतंत्र की विसंगतियों की कोख से ही जन्मा हुआ है और हमारा ध्यान विसंगतियों की ओर कम और बंदूक पर ज्यादा है। नक्सलवाद के लिए समाज में व्याप्त गैर-बराबरी, अन्याय, शोषण और गरीबी जैसे कारण असली जिम्मेदार हैं। संविधान समानता की गारंटी तो अवश्य ही देता है मगर वह समानता है कहां? सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में तरक्की के अवसर समान रूप से हर किसी को उपलब्ध नहीं हैं।

भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और अगड़े लोगों द्वारा तरक्की के सारे अवसर आम आदमी तक पहुंचने से पहले ही लपक लिए जाते हैं। लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। न्याय के महंगे होते जाने से वह आम आदमी से दूर होता जा रहा है। हर कोई न्याय के लिए हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक नहीं जा सकता और ना ही किसी महंगे वकील से न्याय पाने के लिए पैरवी करा सकता है।

मुकदमेबाजियों और इलाज के लिए गरीबों की जमीन बिक जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग बिना जमानत के जेलों में सड़ रहे हैं। जबकि ऊंची पहुंच वाले धनाड्य लोगों को कुछ ही घण्टों में जमानत मिल जाती है। साधन सम्पन्न लोग महंगा वकील रख कर अपने कुकर्मो की सजा से बच जाते हैं। आधा से ज्यादा गंभीर आपराधिक मामलों में अपराधी बच निकलते हैं। जबकि किसी भी शासन व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी कानून का राज कायम रखना और सबको न्याय सुलभ कराना होता है। यही हाल जीवन रक्षा के मौलिक अधिकार का भी है।

इन तमाम विकृतियों को धार्मिक उन्माद का लबादा डाल कर छिपाया नहीं जा सकता। यह उन्माद गरीबी, भेदभाव, बेरोजगारी, शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति नहीं दिला सकता। वंचित समाज की इन कुंठाओं का इलाज बंदूक की गोली से नहीं किया जा सकता है। धर्म, जाति और भाषा आदि संकीर्णताओं से वोट मिल सकते हैं तथा लच्छेदार भाषणों से सत्ता भी मिल सकती है मगर समाज का असंतोष दूर नहीं हो सकता। देखा जाए तो माओवाद सामाजिक असंतोष की उपज भी है और यही असन्तोष उनकी खुराक, शक्ति और प्रेरणा भी है।

History and Origin of Naxalism in India Left Extremism and Maoism
संविधान में आदिवासियों के हितों के संरक्षण की गारंटी दी गयी है, मगर फिर भी उनका शोषण रुक नहीं रहा। - फोटो : गृह मंत्रालय

जनजातियों के बीच माओवादियों की सक्रियता

आज अगर माओवादी आदिवासी क्षेत्रों में सर्वाधिक सक्रिय हैं तो जाहिर है कि इन क्षेत्रों और खासकर इन प्रकृति पुत्र-पुत्रियों की उपेक्षा हुई है। ये लोग प्रकृति की गोद में सदियों से स्वच्छन्द जीवन जीते रहे हैं। इनको जल, जंगल और जमीन पर नैसर्गिक अधिकार मिला है। लेकिन विकास के नाम पर उनके इसी नैसर्गिक को छीनने का निरन्तर प्रयास होता रहा है। कहीं जंगल के ठेकेदार तो खनन के पट्टेदार और कहीं-कहीं विकास के नाम पर स्वयं सरकार द्वारा भोले-भाले आदिवासी समाज के नैसर्गिक अधिकारों का निरंतर हनन होता रहा है।

संविधान में आदिवासियों के हितों के संरक्षण की गारंटी दी गई है, मगर फिर भी उनका शोषण रुक नहीं रहा है।
 

वन क्षेत्र में पीढ़ियों से निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के लिए 2006 में वनाधिकार अधिनियम बना मगर उसका पूरा लाभ अब तक आदिवासियों को नहीं मिल सका। प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गयी 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस अधिनियम के तहत कुल 42,50,602 आवेदन हुए थे जिनमें से केवल 19,05,602 को ही वन भूमि आबंटित हो सकी।


माओवादियों को जड़ें जमाने के लिये समाज का ऐसा ही उपेक्षित वर्ग चाहिए। इन उपेक्षितों के बीच आश्रय मिलने के साथ ही इनके आक्रोश की शक्ति भी मिलती है। इनकी कुंठाओं को गुस्से में बदल कर इन्हें सत्ता के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।

आदिवासियों का अस्तित्व के लिए लड़ने का लम्बा इतिहास

आदिवासियों का सदियों से हो रहा शोषण और प्रचण्ड आदिवासी विद्रोहों की पृष्ठभूमि नक्सलवाद के लिए उर्वरक बनी हुई है। स्वभाव से ये प्रकृति पुत्र निश्चित रूप से शांत स्वभाव के रहे हैं मगर इतिहास गवाह है कि जब भी उन पर शोषण और दमन की इन्तहा हुई है, उन्होंने हथियार उठाने में भी संकोच नहीं किया है। मुगल शासनकाल में औरंगजेब ने जब धर्म-परिवर्तन और ’जाजिया कर’ चलाया तो इन आदिवासियों ने इसका विरोध किया।

सन् 1817 में भीलों ने खान देश पर आक्रमण किया और वह आंदोलन 1824 में सतारा और 1831 में मालवा तक चला गया। सन् 1846 में जाकर अंग्रेज इस विद्रोह पर काबू पा सके। डूंगरपूर में ललोठिया तथा बांसवाड़ा, पचमहाल (गुजरात) में गोबिंद गिरी ने धार्मिक आंदोलन चलाए। सन् 1812 में गोबिंद गिरी को अंगे्रजों ने गिरफ्तार कर लिया। उड़ीसा में ‘मल का गिरी’ का कोया विद्रोह सन् 1871-80 में हुआ।

फूलबाने का खांडे विद्रोह (1850) में तथा साओरा का विद्रोह (1810-1940) में हुआ। ये विद्रोह आर्थिक शोषण के कारण हुए। सन् 1853 में संथाल-विद्रोह हुआ। सन् 1895 में मुंडा विद्रोह हुआ। सन् 1914 में उरांव का ताना-मगत विद्रोह हुआ। मिजो आंदोलन लंबे समय तक चला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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