हिंदी दिवस: पिछले कुछ दशकों में बढ़ा है हिंदी का वैश्विक दायरा, पर कई चुनौतियां अब भी शेष
भाषा की जीवंतता का आधार आज के समय में उसकी रोज़गारपरकता भी है। आज हिंदी तेज़ी से रोज़गार की भी भाषा बनाने लगी है। अनुवाद ,पर्यटन ,विज्ञापन,शिक्षण आदि अनेक क्षेत्र हैं जहां रोज़गार की अनंत संभावनाएं हैं । हर विषय में परंपरागत और व्यावसायिक दो तरह की शिक्षा दी जाती है। हिंदी को रोज़गारपरक, व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए हिंदी की प्रयोजनमूलकता और बढ़ानी होगी।
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विस्तार
14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग अंग्रेजी में ही हिंदी दिवस की बधाई दे रहे होंगे। सरकारी,गैर सरकारी संस्थानों में हिंदी सप्ताह, पखवाड़े मनाए जा रहे हैं । शायद इसी से अपने कर्तव्य की इति समझते हैं। प्रश्न यह है कि अपने ही देश में बहुसंख्यक हिंदी भाषा के बारे में भ्रामक धारणाएं क्यों बन गई हैं? जबकि हिंदी का विकास अद्वितीय है। हिंदी भाषा की पृष्ठभूमि समृद्ध है।
अल्प समय में हिंदी अपनी प्रयोजनमूलकता ,सहजता ,सरलता के कारण सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रही है, यह अब विश्व के कई देशों में बोली और समझी जाती है। अमेरिका ,चीन ,जर्मनी ,साउथ कोरिया जैसे कई देश हैं जहां हिंदी पढ़ाई जाती है। भारत की 75 प्रतिशत जनता हिंदी बोलती और समझती है। इसमें 40 प्रतिशत से ज़्यादा ऐसी जनसंख्या है जिनकी मातृभाषा हिंदी या उसकी बोली है।
दक्षिण भारतीय राज्यों में भी हिंदी जानने वालों की संख्या पिछले वर्षों में बढ़ी ही है। अब सवाल यह है कि जब हिंदी भाषा लगातार देश और विदेश में विस्तृत होती जा रही है फिर उसे लेकर इतना हंगामा या राजनीति क्यों है?
महात्मा गांधी ने कहा था-
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय -हृदय से बातचीत करता है और हिंदी हृदय की भाषा है।
हिंदी की व्यापकता इस कथन को प्रमाणित करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी राजनीति का शिकार हुई है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भाषाई राजनीति का लंबा इतिहास रहा हैं। हिंदी भाषा को अपने ही घर में विरोध झेलना पड़ा है, इसका कारण भाषाई राजनीति के अतिरिक्त और कुछ और नहीं हो सकता। इतिहास साक्षी रहा स्वतंत्रता पूर्व से ही गैर हिंदी भाषी नेताओं और राज्यों ने भी हिंदी को प्रचारित और संवर्धित करने का काम किया है।
राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई हिंदी?
हिंदी के राष्ट्रभाषा बनते-बनते रह जाने की कहानी बहुत पुरानी एवं रोचक है। भाषा संबंधी प्रावधान बनाने वाली समिति में डॉ. बी.आर आम्बेडकर की अध्यक्षता में अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमियों से आए कई विद्वान शामिल थे। संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर बंबई की सरकार में गृहमंत्री रहे श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के साथ तमिलभाषी जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे एवं इन्डियन सिविल सर्विस के पूर्व अफ़सर श्री नरसिम्हा गोपालस्वामी आयंगर ने प्रमुख भूमिका निभाई।
हिन्दी के पक्ष और विपक्ष में ढ़ाई साल से अधिक समय पर तक वाद-विवाद चलता रहा। दक्षिण भारत के एन. गोपालस्वामी अय्यंगर ने कहा कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी आधिकारिक भाषा होनी चाहिए, लेकिन अंग्रेजी को कम से कम 15 साल तक प्रयोग किया जाना चाहिए। जबलपुर के सेठ गोंविद दास ने बहुत मुखरता से राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी का समर्थन किया। संविधान सभा की बहस में गोंविद दास ने तो यह भी तर्क दिया था कि- लोकतंत्र तभी चल सकता है, जब बहुसंख्यक लोगों के मत का सम्मान किया जाए।
अंग्रेजी के पक्ष में तो एंग्लो-इंडियन समुदाय के बड़े नेता फ्रैंक एंथनी तक भी नहीं थे, उन्हेंने कहा कि कई कारणों की वजह से अंग्रेजी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती है, हालांकि, उन्होंने कहा कि हिंदी को थोपना बराबरी के अधिकार का उल्लंघन होगा। आख़िरकार, एक समझौते ( मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला) के बाद 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 लाया गया, हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा का दर्जा दिया गया। उस समय, केवल 15 साल के लिए ये प्रावधान लाया गया था।
भाषा पर हुए बहस में अधिकांश सदस्य हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे,चूँकि कुछ सदस्यों का मत था कि इतने विशाल देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने में समय लगेगा इसलिए इसे शुरू में राजभाषा बनाया गया। हिंदी भाषा ने राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा विवाद से इतर अपना दायरा देश क्या विदेश तक फैलाना शुरू कर दिया। विश्व में 7,000 से अधिक भाषाएँ हैं जिन में से कम से कम भारत में 1650 से अधिक मातृभाषाएं प्रचलन में हैं। इन भाषाओं के मध्य हिंदी एवं हिंदी समूह भाषियों ने अलग पहचान बनाई है।
संख्या के आधार पर विश्व में हिंदी भाषा, अंग्रेजी, मैंड्रेन भाषा के बाद तीसरे स्थान पर है। 2022 में ही हिंदी में संयुक्त राष्ट्र संघ की सभी सूचना भी जारी होने लगे हैं। हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं आधिकारिक भाषा बनने की सबसे बड़ी दावेदार है।
बढ़ा है हिंदी का दायरा
'भाषा बहता नीर 'के सिद्धांत का पालन करते हुए हिंदी तमाम अवरोधों, बाधाओं को पार करते हुए आज अपनी पहुंच का दायरा बढ़ा रही है। इसमें इंटरनेट और सूचना क्रांति विशेषकर मोबाइल फ़ोन ने हिंदी को तकनीकी भाषा बनाने में सहायता की है। इक्कीसवीं सदी की हिंदी न सिर्फ साहित्य भाषा है, शिक्षा की भाषा है, मनोरंजन, विज्ञापन की भाषा है बल्कि विज्ञान,तकनीक एवं रोज़गार की अनंत संभावनाओं से भरी हुई भाषा भी है।
ब्लॉग ,ऑनलाइन पत्रिकाएं,फेसबुक ,ट्विटर आज रोज़मर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं हिंदी ने समय के बदलते स्वरूप को हमेशा अपनाया है और अपनी प्रासंगिकता कम नहीं होने दी है। अन्य भाषाओं से हिंदी ने स्पर्धा का भाव कभी नहीं रखा बल्कि अन्य भाषाओं के शब्दों को भी अपने में आत्मसात किया है। माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसे कंपनियों ने हिंदी को कंप्यूटर और फ़ोन के लिए भी उपयोगी बना कर उसकी उपयोगिता को सिद्ध किया है।
भाषा की जीवंतता का आधार आज के समय में उसकी रोज़गारपरकता भी है। आज हिंदी तेज़ी से रोज़गार की भी भाषा बनाने लगी हैं। अनुवाद ,पर्यटन ,विज्ञापन,शिक्षण आदि अनेक क्षेत्र हैं जहां रोज़गार की अनंत संभावनाएं हैं। हर विषय में परंपरागत और व्यावसायिक दो तरह की शिक्षा दी जाती है। हिंदी को रोज़गारपरक, व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए हिंदी की प्रयोजनमूलकता और बढ़ानी होगी।
प्रयोजनपरक हिंदी
बाजारवाद और उपभोक्तावाद के इस दौर में प्रयोजनपरक हिंदी का दायरा व्यापक होता जा रहा है। आज हिंदी एक ओर कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक, टेलीप्रिंटर, दूरदर्शन, रेडियो, अखबार, फिल्म और विज्ञापन आदि जनसंचार के माध्यमों पर प्रभावी है, तो वहीं दूसरी ओर शेयर बाजार, रेल, हवाई जहाज, बीमा उद्योग, बैंक आदि औद्योगिक उपक्रमों, रक्षा, सेना, इन्जीनियरिंग आदि प्रौद्योगिकी संस्थानों, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों, आयुर्विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, ए० एम० आई० के साथ विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी, अर्द्धसरकारी कार्यालयों, कार्यालयी हिंदी के विभिन्न रूपों में प्रयुक्त होकर अपने महत्व को स्वतः सिद्ध कर रही है। तात्पर्य यह कि पर्यटन, बाजार, तीर्थस्थल, कल-कारखाने , न्यायालय आदि अब प्रयोजनमूलक हिन्दी के दायरे में आ गए हैं।
निः संदेह ,दो तीन दशक में हिंदी के प्रति देश-विदेश में रुख बदला है। संसद में सड़क तक हिन्दी का उपयोग बढ़ा है। नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं के महत्व पर अधिक जोर दिया गया है जिस से हिंदी नई ऊंचाई हासिल कर सकती है। मातृभाषा के साथ आत्मीय संबंध होने के कारण ग्रहण करना छात्र के लिए सहज होता है ,उसकी तार्किक दृष्टि विकसित होती है। चाहे हम कितनी भी विदेशी भाषाओं की बात कर लें परंतु सच्चाई यह है कि व्यक्ति की रचनात्मकता अपना उत्कृष्टतम रूप अपनी भाषा में ही प्राप्त करती है।
जय हिंद !जय हिंदी !
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