बेहतर अनुभव के लिए एप चुनें।
INSTALL APP

हिंदी दिवस विशेष: मातृ भाषा की मारक क्षमता को समझिए, हिंदी की ताकत पहचानिए

Dr. Rakesh Rana डॉ. राकेेेेश राणा
Updated Tue, 14 Sep 2021 08:39 AM IST

सार

  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'हरिजन-पत्रिका' के 9 जुलाई, 1938 के अंक में अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा-प्राप्त करने के अपने कटु अनुभवों के बारे में लिखा कि 'हमें और हमारे बच्चों को अपनी विरासत पर ही आगे बढ़ना होगा।
  • अगर हम दूसरों से लेंगे तो अपने-आप को शक्तिहीन बना देंगे। विदेशी खाद पर हम पनप नहीं सकते। मैं विदेशी भाषाओं के खजाने को अपनी भाषाओं के माध्यम से लेना चाहता हूं।'
विज्ञापन
भाषा हमारी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को गढ़ती है
भाषा हमारी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को गढ़ती है - फोटो : iStock
ख़बर सुनें

विस्तार

पहले भाषा ने जन्म लिया या पहले समाज का निर्माण हुआ। यह कुछ ऐसा ही सवाल है जैसा कि मुर्गी पहले आई या अंडा पहले आया। 'भाषा' समाज के लिए बहु-उपयोगी साधन है। इस दृष्टि से समाज का निर्माण पहले हुआ होगा। समाज ने संप्रेषण क्षमता के विकास की दिशा में संकेतों के माध्यम से भाषा का निर्माण किया होगा। भाषा और समाज दोनों के निर्माण में दोनों एक दूसरे के सहायक की भूमिका में संस्कृति का विकास करते दिखते हैं। जैसे समाज सिर्फ वही नहीं है जो दिख रहा है। ठीक वैसे ही भाषा भी सिर्फ वह नहीं है जो लिखी और बोली जा रही है। 
विज्ञापन


भाषा वह भी है जो हमारी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को गढ़ती है। लिखत-पढ़त वाली भाषा से ज्यादा उस मनोभाषा और देहभाषा को समझना जरूरी है जो भाषाई संरचना में निहित सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक-राजनीतिक तत्वों को तैयार करती है। इसलिए भाषाई संदर्भ की समझ सिर्फ शाब्दिक अर्थों तक सीमित नहीं है बल्कि उन सभी आयामों, संदर्भों और दृष्टिकोणों में विसरित है जो 'भाषा' का निर्माण करते है या सीधे कहें तो जो भाषिक मनोविज्ञान निर्मिति करते हैं और उस सामाजिक गढ़त के पीछे काम करते हैं जो भाषा को शक्तिशाली बनाते हैं। 

 
भाषा मात्र संप्रेषण का माध्यम नहीं होती है, यह तो उसका साधारण नैसर्गिक दायित्व है। भाषा के साथ सत्ता, शक्ति, वर्ग सब शामिल हैं। भाषा की राजनीति पुरानी परिणति है। भाषा शासन-प्रशासन की शक्ति सहयोगिनी के रूप में पुराने समय से काम करती आई है। वह सामाजिक करेंसी की तरह काम करती रही है। विशिष्ट वर्गों के निर्माण में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं स्थापित करती रही है, जो सत्ता संरचना के काम आते हैं।
 


मातृभाषा सीखने की प्रक्रिया और हम 

जब हम अपनी मातृभाषा सीख रहे होते हैं तो एक सोचने-समझने की पूरी विधि को अख्तियार कर रहे होते हैं। भाषा हमें हमारे परिवेश में प्रतिष्ठित करने वाली दृष्टि प्रदान कर रही होती है। यह बहुत नैसर्गिक प्रक्रिया की तरह हमारे जीवनानुभवों में संपन्न होती रहती है। इसकी ताकत, क्षमता और विस्तार की विशेषताएं, उस भ्रूण के अंकुरण की तरह प्राथमिक स्तर पर ही तय हो जाती है जो भावी संसार बनाने वाला है। भाषा का अपने समाज और संस्कृति से अनन्य संबंध है। 

बेशक मनुष्य के पास भाषा सीखने की अदभुत क्षमता है, पर वह भाषा को तभी सीख पाता है, जब उसे एक भाषायी समाज का परिवेश प्राप्त हो। एक ओर जहां समाज के माध्यम से ही भाषा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुंचती है तो दूसरी ओर भाषा के माध्यम से ही समाज संगठित और संचालित रहता है। भाषा के अभाव में सामाजिक संरचना धराशाही हो जाएगी। 

इसी तरह भाषा का अपनी संस्कृति से गहरा संबंध होता है। भाषाई मजबूती संस्कृति की मजबूती पर बहुत निर्भर करती है। दुनियायीं अनुभव बताते है कि वे ही समाज बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से सफल सिद्ध हुए हैं जिनमें भाषाई समृद्धि बनी रही। उन्हीं समाजों ने विज्ञान और तकनीकी में तरक्की की है जिनकी समृद्ध भाषाओं ने अपने-अपने विषयों में प्रगति की। किसी भी संस्कृति और विज्ञान का विकास भाषा के आधार घरातल पर ही निर्भर करता है।
विज्ञापन
आगे पढ़ें

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

  • Downloads

Follow Us