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हिंदी दिवस 2019ः हिंदी के विकास का सफरनामा, हिंदी कैसे बनी भारत के हृदय की भाषा

mukesh jhaमुकेश कुमार झा Updated Sat, 14 Sep 2019 03:05 PM IST
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी भाषा के विकास की जब भी बात आती है तो मुझे आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो पंक्तियां याद आती हैंः-
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                                                         'निज भाषा उन्नति रहे, सब उन्नति के मूल।                                      
                                                          बिनु निज भाषा ज्ञान के, रहत मूढ़-के-मूढ़।।'


उपरोक्त दोहे से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आधुनिक हिंदी के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपनी भाषा हिंदी से कितना लगाव था। यदि हम हिंदी भाषा के विकास की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले सौ सालों में हिंदी का बहुत विकास हुआ है और दिन-प्रतिदिन इसमें और तेजी आ रही है। हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है।

संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसे आर्य भाषा या देवभाषा भी कहा जाता है। हिंदी इसी आर्य भाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी मानी जाती है, साथ ही ऐसा भी कहा जाता है कि हिंदी का जन्म संस्कृत की ही कोख से हुआ है।

भारत में संस्कृत 1500 ई. पू, से 1000 ई. पूर्व तक रही, ये भाषा दो भागों में विभाजित हुई- वैदिक और लौकिक। मूल रूप से वेदों की रचना जिस भाषा में हुई उसे वैदिक संस्कृत कहा जाता है, जिसमें वेद और उपनिषद का जिक्र आता है, जबकि लौकिक संस्कृत में दर्शन ग्रंथों का जिक्र आता है। इस भाषा में रामायण, महाभारत, नाटक, व्याकरण आदि ग्रंथ लिखे गए हैं। संस्कृत के बाद जो भाषा आती है वह है पालि। पालि भाषा 500 ई. पू. से पहली शताब्दी तक रही और इस भाषा में बाैद्ध ग्रंथों की रचना हुई।

बौद्ध ग्रन्थों में बोलचाल की भाषा का शिष्ट और मानक रूप प्राप्त होता है। पालि के बाद प्राकृत भाषा का उद्भव हुआ। यह पहली ईस्वी से लेकर 500 ई. तक रही। इस भाषा में जैन साहित्य काफी मात्रा में लिखे गए थे। पहली ई. तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा इसको प्राकृत की संज्ञा दी गई। उस दौर में जो बोलचाल की आम भाषा थी वह सहज ही बोली व समझी जाती थी, वह प्राकृत भाषा कहलाई।

दरअसल, उस समय इस भाषा में क्षेत्रीय बोलियों की संख्या बहुत सारी थी, जिनमें शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, मराठी, मागधी और अर्धमागधी आदि प्रमुख हैं। प्राकृत भाषा के अंतिम चरण से अपभ्रंश का विकास हुआ ऐसा माना जाता है। यह भाषा 500 ई. से 1000 ई. तक रही। अपभ्रंश के ही जो सरल और देशी भाषा शब्द थे उसे अवहट्ट कहा गया और इसी अवहट्ट से ही हिंदी का उद्भव हुआ।
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