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हिमाचल की हार ने बढ़ा दिया धामी का रुतबा, ऐसे बढ़ा प्रभाव

Mon, 12 Dec 2022 12:53 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 12 Dec 2022 12:53 PM IST
सार

सांगठनिक तौर पर भी अब भाजपा में युवा पुष्कर सिंह धामी का कद बढ़ना स्वाभाविक ही है। किसी भी राजनीतिक दल को जिताऊ नेता चाहिए और फिलहाल पुष्कर धामी जिताऊ नेताओं की श्रेणी में आ गए हैं।

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Himachal Pradesh Election Result 2022 Impact On Uttarakhand CM Pushkar Singh Dhami Status in BJP Politics
हिमाचल में भाजपा की हार से उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को दोहरी सौगात मिली है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के चुनाव भले ही भाजपा और खास कर मुख्यमंत्री के तौर पर जयराम ठाकुर को झटका दे गए हों मगर ये चुनाव पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को दोहरी सौगात दे गए हैं। इन चुनाव नतीजों ने धामी शासन को दीर्घायु बनाने के साथ ही धामी की भाजपा संगठन में हैसियत बढ़ा दी और मोदी- अमित शाह की नजरों में उनकी छवि जिताऊ नेता के रूप में बन गई है। जबकि स्वयं भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की अपने ही संगठन में किरकिरी हो गई है।

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दूसरी ओर उत्तराखंड में भी हर पांच साल में सरकार बदलने के रिवाज और एंटी इनकम्बेंसी सहित कोरोना की मार के बावजूद राज्य में भाजपा पुनः सत्ता कब्जाने में सफल हो गई। देखा जाए तो भाजपा को उत्तराखंड की इस सफलता की अहमियत अब हिमाचल प्रदेश की हार के बाद महसूस हो रही होगी।

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कांग्रेस का उत्तराखंड में भी सत्ता पलट का भरोसा था

पिछले साल अक्टूबर में जब कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में भाजपा से मण्डी संसदीय सीट छीनने के साथ ही तीन विधानसभा सीटें भी जीत लीं थीं तो हिमाचल से अधिक उत्साहित उत्तराखण्ड के कांग्रेसी नजर आ रहे थे, क्योंकि हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड दो जुड़वा पहाड़ी प्रदेश हैं जहां भौगोलिक ही नहीं अपितु सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां भी समान हैं। उन चुनावों के तत्काल बाद उत्तराखण्ड में चुनाव होने थे।

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उत्तराखण्ड की तरह ट्रेंड बदलने का मुगालता

इसी वर्ष हुए चुनावों में भाजपा उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और मणिपुर की जीत से अपने विजय रथ के निरन्तर-निष्कंटक आगे बढ़ने के प्रति आश्वस्त हो चुकी थी। लेकिन 8 दिसम्बर को आए हिमाचल के चुनाव नतीजों ने गुजरात में मिली असाधारण जीत का मजा किरकिरा कर दिया। उत्तराखण्ड की ही तरह हिमाचल प्रदेश में भी प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार बदलने का रिवाज तोड़ने के लिए पूरी ताकत लगाई थी।


उन्होंने हिमाचल को अपना दूसरा घर बताने के साथ ही सौगातों की झड़ी लगा दी थी। हिमाचल में भी धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे उठाए गए फिर भी पार्टी हार गई। भाजपा अपने अध्यक्ष नड्डा के गृह जनपद में भी हार गई। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गढ़ाए हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रासरण मंत्री अनुराग ठाकुर के क्षेत्र में भी पार्टी हार गई।

उत्तराखंड में 2022 के चुनाव में बारी-बारी सरकार बदलने के रिवाज के टूटने के अनेक कारण रहे हैं, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे को नकारा नहीं जा सकता। भाजपा के चुनाव प्रबंधन और मजबूत सांगठनिक शक्ति के साथ ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की भूमिका की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार हरीश रावत के खिलाफ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का काल्पनिक हव्वा भी कांग्रेस की संभावनाओं पर असर कर गया। इन तमाम बातों के अलावा भाजपा की जीत के लिए पुष्कर धामी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

धामी ने बदला भाजपा के पक्ष में माहौल

दरअसल 4 जुलाई 2021 को जब पुष्कर धामी ने उत्तराखण्ड की सत्ता संभाली थी तो उस समय बार-बार मुख्यमंत्री बदलने, पूर्व मुख्यमंत्रियों की जबरदस्त एण्टी इन्कम्बेंसी, कोरोना के कारण जनता की तकलीफों में कई गुना अधिक वुद्धि, महंगाई, बेरोजगारी आदि कारणों से भाजपा की स्थिति काफी डांबाडोल थी। लेकिन युवा पुष्कर धामी ने सत्ता संभालते ही अनुभव न होने के बावजूद अपनी कार्यशैली से ऐसा माहौल बनाया कि लोगों में भाजपा के प्रति पुनः विश्वास जगने लगा। धामी ने चुनाव से पहले 5 सौ से अधिक घोषणाऐं कर डालीं जो कि सीधे आम लोगों से जुड़ी थीं।

समान नागरिक संहिता के मामले में भी धामी आगे

Himachal Pradesh Election Result 2022 Impact On Uttarakhand CM Pushkar Singh Dhami Status in BJP Politics
हो सकता है कि धामी उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलने के ट्रेंड को तुड़वा दें। - फोटो : अमर उजाला

घोषणाएं करने से पहले धामी ने संबंधित विभाग से आकलन करवाया और उसके बाद वित्त विभाग से परामर्श लिया ताकि उसके लाभ लोगों को जल्द मिल सकें। उनकी ज्यादातर घोषणाओं से संबंधित शासनादेश जारी भी हो गए थे, भले ही उनमें से काफी को धरती पर उतरना बाकी है। कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित पर्यटन, स्वास्थ्य, परिवहन और सांस्कृतिक क्षेत्रों के लिए उन्होंने आर्थिक पैकेज घोषित किए, राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत काम करने वाले स्वयं सहायता समूहों के लिए आर्थिक सहायता डीबीटी के माध्यम से सीधे उनके खातों में पहुंचाने की शुरुआत की।

धामी की सबसे बड़ी घोषणा समान नागरिक संहिता की थी। धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए इस घोषणा ने उत्प्रेरक का काम किया। हालांकि यह संवैधानिक मामला है और इसमें संविधान के अनुच्छे 254 ‘क’ की बाधा से उसी अनुच्छेद 254 ’ख’ से राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने से पार पाया जा सकता है। मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 25 से 28 के कारण असली बाधा बाद में आ सकती है। फिर भी पुष्कर धामी ने इस दिशा में जो पहल की है उसका अनुसरण बाकी भाजपाई मुख्यमंत्री करने लगे हैं।

अब तो राज्यसभा में समान नागरिक संहिता के लिए किरोड़ीलाल मीना भी प्राइवेट मेंबर बिल ले आए हैं। यह मामला इतना आसान नहीं जितना कि भाजपाई प्रचार कर रहे है। बहरहाल इस पहल के लिए भी भाजपा में धामी का कद बढ़ना स्वाभाविक ही है।


टूट सकता है मुख्यमंत्री बदलने का ट्रेंड भी


प्रदेश के 22 सालों के जीवनकाल में भाजपा कुल साढ़े 13 साल शासन कर चुकी है और इन साढ़े तेरह सालों में पार्टी 7 नेताओं को मुख्यमंत्री बना चुकी है और 9 बार सरकारें दे चुकी हैं। इनमें से कोई भी 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। तरीथ सिंह रावत को तो केवल 3 माह में ही चलता कर दिया गया। भाजपा के इस इतिहास को देखते हुए अब पुष्कर धामी के बारे में भी कयास लगने शुरू हो गए थे। लेकिन अब हिमाचल के चुनाव नतीजों के बाद धामी को बदलने का कोई वाजिब कारण नजर नहीं आता है। हो सकता है कि धामी मुख्यमंत्री बदलने के ट्रेंड को भी तुड़वा दें। भाजपा के अब तक जितने भी 7 नेता मुख्यमंत्री बने उनमें से धामी अकेले मुख्ष्मंत्री हैं जिनके नेतृत्व में भाजपा विधानसभा चुनाव जीती है।
 

भाजपा में अहमियत अब बढ़ेगी धामी की

सांगठनिक तौर पर भी अब भाजपा में युवा पुष्कर सिंह धामी का कद बढ़ना स्वाभाविक ही है। किसी भी राजनीतिक दल को जिताऊ नेता चाहिए और फिलहाल पुष्कर धामी जिताऊ नेताओं की श्रेणी में आ गए हैं। यद्यपि धामी इस साल हुए विधानसभा चुनाव में स्वयं हार गये थे। इसलिए उन पर सवाल उठ रहे थे कि जो नेता स्वयं चुनाव नहीं जीत सकता वह पार्टी को क्या जितायेगा। लेकिन चम्पावत उपचुनाव ने धामी पर लगा वह दाग धोने के साथ ही उनके नाम चुनाव में भारी मतों से जीतने का रिकार्ड भी थमा दिया। इस उपचुनाव में धामी अपनी कांग्रेस की प्रतिद्वंदी से 55,025 मतों से जीत कर कुल मतों का 94 प्रतिशत हिस्सा ले गए थे।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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