पुरानी पेंशन योजना: हिमाचल प्रदेश ने जगा दी देश के सरकारी सेवकों की आस
केन्द्र और राज्यों में सन 2004-05 से पुरानी पेंशन योजना बंद हो चुकी है। भारत सरकार ने इसे बन्द करने के लिए 1 जनवरी 2004 से नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू की है जिसे पश्चिम बंगाल को छोड़ कर धीरे-धीरे सभी राज्यों ने अपना लिया।
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नवम्बर 2022 में हुए हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों ने पुरानी पेंशन योजना की मांग कर रहे देश के करोड़ों सरकारी सेवकों की उम्मीदें जगा दी थी। यह चुनाव जीतने वाली कांग्रेस ने कर्मचारियों से उनकी पुरानी पेंशन बहाली का वायदा किया था और चुनाव जीतने पर वह वायदा पूरा भी कर लिया। पुरानी पेंशन योजना को लेकर केन्द्र सहित 18 राज्यों में सत्ताधरी दल हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश में झटका खा चुका है और इसी साल 8 राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें से पूर्वोत्तर के नागालैंड, त्रिपुरा और मेघालय में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो भी चुकी है।
अगर हिमाचल प्रदेश की तरह इन राज्यों में भी पुरानी पेंशन योजना चुनावी मुद्दा बन गई तो करोड़ों कर्मचारियों की मुराद पूरी होगी या नहीं मगर देश की राजनीति में भारी उथल पुथल जरूर हो जाएगी। इस साल होने वाले चुनाव नतीजों का असर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।
चुनावी मुद्दा बन गई पुरानी पेंशन योजना
देश के जिन पांच राज्यों ने अपने कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल की है उनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। ये सभी राज्य विपक्षी दलों द्वारा शासित हैं। इनमें भी पंजाब को छोड़ कर बाकी कांग्रेस शासित या कांग्रेस की भागेदारी वाले राज्य हैं। इन में से भी राजस्थान और छत्तीसगढ़ वे राज्य हैं, जिनमें इस साल चुनाव होने हैं।
हिमाचल में कांग्रेस को जीत का फर्मूला मिल गया। जाहिर है कि कांग्रेस बाकी राज्यों में भी इसी फार्मूले को आजमाएगी। भाजपा इस समय देश के 18 राज्यों में सीधे या सहयोगियों के साथ सत्ता में है और सभी जगह पुरानी पेंशन योजना की मांग की अनदेखी की जा रही है।
इस तरह भाजपा के पुरानी पेंशन योजना के खिलाफ होने का संदेश जा रहा है। सत्ताधारी दल के पेंशन विरोधी होने की आम धारणा त्रिपुरा के कारण भी बनी। क्योंकि वहां भाजपा के सत्ता में आते ही कर्मचारियों की पुरानी पेंशन योजना बंद हो गई।
2004 के बाद के कर्मचारियों को नहीं मिलती पेंशन
केन्द्र और राज्यों में सन 2004-05 से पुरानी पेंशन योजना बंद हो चुकी है। भारत सरकार ने इसे बन्द करने के लिए 1 जनवरी 2004 से नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू की है जिसे पश्चिम बंगाल को छोड़ कर धीरे-धीरे सभी राज्यों ने अपना लिया। उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य, जहां लगभग 12 लाख कर्मचारी हैं ने 1 अप्रैल 2005 और उत्तराखण्ड ने 1 अक्तूबर 2005 से नई पेंशन योजना लागू कर एक तरह से पेंशन देने की झंझट से पल्ला छुड़ाकर इस जिम्मेदारी को नेशनल सिक्योरिटी डिपाॅजिटरी लिमिटेड (एमएसडीएल) के हवाले कर दिया।
अब शेयर मार्केट से मुनाफे का मिलता है लाभ
ऊपरी तौर पद देखने से लगता है कि 2004 के बाद सरकारी कर्मचारियों की पेंशन समाप्त हो गई। जबकि सरकार ने पुरानी पेंशन व्यवस्था की जगह कर्मचारियों को नया विकल्प दिया है। इसका मतलब कतई नहीं कि रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी को कुछ नहीं मिलेगा। दरअसल नए विकल्प में एक फण्ड बनाया गया है और फण्ड में कर्मचारी के वेतन से 10 प्रतिशत जमा होता है, सरकार उसमें कर्मचारी के वेतन का 14 प्रतिशत अंशदान जमा करती है।
इस फण्ड में जमा राशि को स्टेंट बैंक आफ इंडिया, यूटीआइ और एलआइसी शेयर मार्केट में लगाते हैं और उसका मुनाफा कर्मचारी को पेंशन के रूप में मिल जाता है। सरकार का मानना है कि इस योजना से रिटायर कर्मचारी की अधिकतम आय की कोई सीमा नहीं है।
लेकिन पुरानी पेंशन योजना लागू करने के लिए आन्दोलित कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि पुरानी योजना में सेवाकाल के अंतिम प्राप्त वेतन के आधे के बराबर राशि पेंशन के रूप में मिलने की गांरटी थी। हर साल डीए बढ़ने के साथ ही पेंशन राशि भी बढ़ती थी। यही नहीं पहले चिकित्सा प्रतिपूर्ति मिलती थी जो अब नहीं मिलती। कर्मचारी आरोप लगाते हैं कि जीवनभर सरकार की सेवा करने के बाद अंत में सरकार ने उनको शेयर बाजार के हवाले कर दिया। जबकि जो विधायक या सांसद पांच साल भी पूरा नहीं करते उन्हें सभी सरकारें पेंशन देती हैं। यही नहीं एक सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है उसे उतनी बार पेंशन मिलती है।
विधायक-सांसद जितनी बार जीतें उतनी बार की पेंशन
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधायकों की पेंशन पर ही सरकार को प्रतिवर्ष लगभग 65 करोड़ खर्च करने होते हैं वहां लगभग 2200 पूर्व विधायक हैं। यह व्यवस्था उत्तराखण्ड सहित अन्य राज्यों में भी है। उत्तराखण्ड में पूर्व विधायक को पहले साल के लिए 40 हजार रुपये पेंशन मिलती है। इसके बाद प्रति साल में दो हजार रुपये की पेंशन बढ़ोतरी होती है। पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला विधायक 48 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन लेता है, लेकिन अब पूर्व विधायकों को 40 हजार पेंशन भी कम पड़ रही है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में कुछ पूर्व विधायक 8-8 बार की पेंशन ले रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले 9 बार से विधानसभा का चुनाव जीतने वालों में भाजपा के सुरेश खन्ना, सपा के दुर्गा यादव हैं, जबकि आजम खान 10वीं बार जीते हैं। अकाली दल के प्रमुख प्रकाश सिंह बादल 11 बार विधायक रह चुके थे। पूर्व विधायक की मृत्यु की तारीख से उसके पति या पत्नी, या मृतक आश्रित को हर महीने उतनी ही फैमिली पेंशन मिलती है।
एक अनुुमान के अनुसार देश में केन्द्र और राज्य कर्मचारियों की संख्या 4.7 करोड़ के आसपास है। इनमें से अगर आधी संख्या को भी नई योजना से पेंशन मिल रही है और वे सन्तुष्ट नहीं हैं तो वे हिमाचल प्रदेश की तरह राजनीतिक प्रतिकार कर सकते हैं। इसी खतरे को भांपते हुए भारत सरकार कम से कम तीन विकल्पों पर विचार कर रही है ताकि पुरानी पेंशन के लिए देशभर में छिड़ा कर्मचारी आन्दोलन शांत किया जा सके।
अगर 2 करोड़ कर्मचारी भी नराज हैं तो उतने ही परिवारों की नाराजगी गले पड़ सकती है। यही नहीं कर्मचारी जनमत बनाने का काम भी करते हैं और सरकार को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी रखते हैं।
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