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स्मृतिशेष: मजदूर हितों की बुलंद आवाज थे गुरुदास दासगुप्ता

Fri, 01 Nov 2019 06:40 PM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Fri, 01 Nov 2019 06:40 PM IST
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Gurudas Dasgupta who fought for the rights of working people throughout his life passed away
ठेंगड़ी जी को श्रद्धांजलि देते हुए गुरुदास दासगुप्ता ने वंदेमातरम् और भारत माता की जय के नारे भी लगाए थे। - फोटो : सोशल मीडिया

चाहे संसद में रहे हों या संसद के बाहर, श्रमिक और देशहित से जुड़े मामलों को लेकर गुरुदास दासगुप्ता की आवाज हमेशा बुलंद रही। राजनीति विचारधारा से जब जुड़ी होती है तो राजनेता के समक्ष अपनी वैचारिक धारा की मर्यादा में अपने आचरण को समेटे रहना होता है। कैडर और खास विचारधारा वाली पार्टियों के राजनेताओं को तो अपनी पार्टी लाइन की मर्यादा कहीं ज्यादा गहरे तक देखना होती है।

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आज के दौर में यह पार्टी लाइन इतनी कड़ी हो गई है, वैचारिकता की मर्यादा इतनी मजबूत हो गई है कि विपरीत विचारधाराओं के राजनेता संसद के केंद्रीय कक्ष में भले ही साथ बैठ लें, लेकिन संसद के बाहर उनका आपस में मिलना, बैठना या बात करना तक गुनाह समझा जाता है। इसे अनुशासनहीनता तक के दायरे में माना जाने लगा है।
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दरअसल, यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक दलों ही नहीं, उनसे जुड़े युवा और दूसरे तरह के संगठनों की भी हो गई है। आज के दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता या पदाधिकारी अगर आइसा के कार्यकर्ता या पदाधिकारी से बात कर लें या इसके ठीक उलट हो तो दोनों ही वैचारिक संगठनों में अपने-अपने पदाधिकारी और कार्यकर्ता के खिलाफ आंखें तरेरी जाने लगती हैं, उसकी वैचारिक और राजनीतिक निष्ठा पर सवाल उठने लगते हैं।
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संघ से जुड़े मजदूर नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी से गुरुदास दासगुप्ता का रहा गहरा रिश्ता
इसके चलते आज राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच मानवीय रिश्ते भी तार-तार होने लगे हैं। लेकिन गुरुदास दासगुप्त इन बंधनों के बावजूद अपने रिश्ते निभाने में आगे थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक मर्यादा, देशहित और देशहित के लिए साथ काम कर रहे लोगों के साथ रिश्तों का तार संतुलन के साथ जोड़े रखा। 
वाजपेयी सरकार के दौरान तो उनका यह संतुलन बार-बार दिखा। गुरुदास दासगुप्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े मजदूर संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस यानी एटक के महासचिव के नाते श्रमिकों के हितों के मुद्दों पर हर साथ संस्था के साथ काम किया, जो मजदूरों के हितों के लिए लड़ रहे थे। इस सिलसिले में उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ और उसके संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी से भी गहरा रिश्ता रहा।

गुरुदास दासगुप्ता ने लगाए थे वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारे
नरसिंह राव सरकार जब भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे वैश्वीकरण के लिए खोल रही थी, तब मजदूरों के हितों की अनदेखी भी होने लगी थी। श्रम कानूनों को लगातार लचीला बनाया जाने लगा था। तब एक-दूसरे के विपरीत वैचारिक उत्स से निकले होने के बावजूद भारतीय मजदूर संघ और एटक ने मिलकर काम किया।

स्वदेशी आंदोलन को बढ़ाने का बीड़ा जब भारतीय मजदूर संघ ने उठाया तो उसमें एटक का भी साथ मिला। इसके चलते गुरुदास दासगुप्ता और दत्तोपंत ठेंगड़ी में ऐसा रिश्ता बना कि जब 14 अक्टूबर 2004 को ठेंगड़ी जी का निधन हुआ तो दिल्ली में भारतीय मजदूर संघ के दफ्तर पर उन्हें श्रद्धांजलि देने गुरुदास दासगुप्ता भी पहुंचे थे। उस समय उन्होंने ठेंगड़ी जी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, हमारा नेता चला गया। इतना ही नहीं, उन्होंने तब वंदेमातरम् और भारत माता की जय के नारे भी लगाए थे।

जिन्हें भारतीय वामपंथी विचारधारा और रुझान की समझ है, वे शायद ही स्वीकार कर पाएं कि कोई जाना-माना कम्युनिस्ट इस तरह के नारे लगा सकता है? लेकिन गुरुदास दासगुप्ता अलग थे। उन्हें अपनी वैचारिक राजनीति प्यारी थी, वे अपनी वैचारिकता के प्रति राजनीतिक तौर पर भी निष्ठावान थे, लेकिन उन्हें अपने रिश्तों की भी समझ थी और देशहित की भी, इसीलिए वामपंथी होते हुए भी ठेंगड़ी जी के अतीत होने के बाद अपनी वैचारिकता से इतर के भी नारे को पुरजोर तरीके से लगाने में उन्हें हिचक नहीं हुई।

Gurudas Dasgupta who fought for the rights of working people throughout his life passed away
गुरुदास दासगुप्ता और उनका संगठन वाजपेयी सरकार के श्रम सुधारों के खिलाफ भी सक्रिय रहा। - फोटो : सोशल मीडिया

गुरुदास दासगुप्ता और उनका संगठन वाजपेयी सरकार के श्रम सुधारों के खिलाफ भी सक्रिय रहा। इसमें भारतीय मजदूर संघ की भी भागीदारी रही।

साल 2003 की बात है। जब दिल्ली के विज्ञान भवन में श्रम सुधारों पर कोई राष्ट्रीय स्तर की परिचर्चा आयोजित थी। इस परिचर्चा के उद्घाटन के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मंच पर आसीन हो चुके थे। दर्शक दीर्घा की पहली पंक्ति में भारतीय मजदूर संघ के एम के पंधे और गुरुदास दासगुप्ता बैठे हुए। उद्घाटन के पहले की औपचारिकताएं जारी थीं। राष्ट्रीय मीडिया के कैमरे इन दृश्यों को कैद करने में मसरूफ थे। इसी बीच उद्घोषिका ने प्रधानमंत्री को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया। इसी बीच पहली पंक्ति से एक दमदार आवाज उठी, प्रधानमंत्री जी, हम आपको क्यों सुनें?

प्रधानमंत्री की सुरक्षा का तामझाम ऐसा हो गया है कि उनके कार्यक्रम में कोई भी आवाज उठती है, चाहे वह लोकतंत्र में भगवान कही जाने वाली जनता के बीच से ही उठी हो, उसे दबा दिया जाता है या सुरक्षाकर्मी आवाज उठाने वाली शख्सियत को उठा ले जाते हैं।

जाहिर है कि तब भी ऐसा ही हुआ। लेकिन वाजपेयी भी और ही मिट्टी के बने हुए थे। हरकत में आए सुरक्षाकर्मियों को उन्होंने आंखों के इशारे से ही रोक दिया और सिर झुकाकर अपनी कुर्सी पर बैठे रहे। नीचे गुरुदास दासगुप्ता का भाषण जारी रहा। उन्होंने धाराप्रवाह अंग्रेजी में तत्कालीन सरकार द्वारा किए जा रहे श्रम सुधारों पर जमकर प्रहाह किया।

गुरुदास दासगुप्ता बोलते रहे, तब एम के पंधे उनके समर्थन में सिर हिलाते रहे। जब तक गुरुदास गुप्ता बोलते रहे, वाजपेयी चुपचाप सुनते रहे। जब उनका बोलना बंद हुआ, तब वाजपेयी जी ने खास तरीके से सिर उठाया और गुरुदास दासगुप्ता से पूछा, अब आज्ञा हो तो मैं बोलूं? 

‘हां, बोलिए...’ कुछ उलाहना, कुछ झिड़कन के साथ गुरुदास दासगुप्ता ने तब जवाब दिया था। तब मर्यादा दोनों तरफ से दिखी थी..गुरुदास दासगुप्ता ने भी अपनी बात तो रखी, लेकिन मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया और वाजपेयी जी ने भी प्रधानमंत्री पद की ठसक नहीं दिखाई और पूरी शिद्दत से उन्हें सुनते रहे।

गुरुदास दासगुप्ता से जुड़ी एक और घटना याद आ रही है। 2000 के संसद के बजट सत्र में पहले हिस्से के दौरान उनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा था।

संसद की परिपाटी के मुताबिक रिटायर होने वाले सदस्यों को सत्र के आखिरी दिन भावपूर्ण विदाई दी जाती है। इसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष और आसंदी-सभी अपनी राजनीतिक विचारधारा को भूलकर रिटायर होने वाले सदस्यों के सिर्फ योगदान और मानवीय मूल्य को ही याद करते हैं। लेकिन गुरुदास दासगुप्त अलग थे। उनके विदाई भाषण में उसी दिन उन्होंने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए  बैंकों के बढ़ते एनपीए पर जोरदार सवाल उठाया था। तब के आंकड़ों के मुताबिक बैंकों का एनपीए बढ़ते-बढ़ते 57 हजार करोड़ रुपए हो गया था। इसे लेकर दासगुप्ता ने सरकार की नीतियों और उद्योगपतियों की मंशा पर जोरदार सवाल उठाए थे। उन दिनों यशवंत सिन्हा देश के वित्त मंत्री थे।जाहिर है कि इस ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की चर्चा का उन्होंने ही जवाब दिया था।

बहरहाल, जब गुरुदास दासगुप्ता को विदाई दी जाने लगी तो सिन्हा ही नहीं, सभी वक्ताओं ने उनके आखिरी दिन के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के लिए उनकी जमकर प्रशंसा की। कम्युनिस्ट राजनीति की परिपाटी के मुताबिक गुरुदास दासगुप्ता पार्टी से मिलने वाले सीमित मानदेय से ही जिंदगी गुजारते रहे। उस मानदेय में से ज्यादा हिस्सा उनके सिगरेट पर खर्च हो जाता था।

सीमित संसाधन में सादगीभरी जिंदगी जीने वाले गुरुदास दासगुप्ता की राजनीति के सरोकार बड़े थे। जिस विचारधारा के प्रति वे निष्ठावान थे, उस पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन श्रमिक हितों के लिए उनकी जो सोच रही, वह बेदाग रही..भारतीय मजदूरों की हितों की जब-जब चर्चा होगी, उनका यह बेदाग सरोकार याद आता रहेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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