कौन सुध लेगा माथे पर किस्मत बांधे चल रहे मजदूरों की, कहीं घोषणाओं में तो नहीं उलझ गई सियासत?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
55 दिनों से अधिक हो गए, इस देश की जीडीपी को रफ्तार देने वाले मजदूर लगातार पैदल चल रहे हैं। कुछ अपने घर तक पहुंच रहे हैं, तो कुछ बीच रास्ते में ही दम तोड़ दे रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान हर दिन की यही कहानी है। हर दिन ढलने के साथ ही मजदूरों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हर सुबह निकलने वाला उम्मीदों का सूरज भी अब उनसे आंखें मिलाने से कतराने लगा है। वो भी इस सोच में है कि क्या इतनी निर्मम और असहाय होती है गरीबी।
चौड़ी, खाली सड़कों पर रगड़ रहे मजदूरों के पांव इस देश के हवाई विकास की गर्दन की नस को दबा रहे हैं। उनके पैरों में पड़ते छाले देश की संसद को कटघरे में खड़े कर रहे हैं, जिसके भीतर उनके हक के लिए ना जाने कितनी बार मेजें पीटी गईं, लेकिन उनके हिस्से शोर के अलावा कुछ भी नहीं आया।
मजदूरों के छिलते पांव को देखकर इस देश की सड़कों की रूह कांप उठी है, लेकिन सत्ता अरबों-करोड़ों के एलान में व्यस्त है। हर रोज दम तोड़ रहे मजदूरों के लिए इस देश की सरकारें सिर्फ ट्वीट करने भर के लिए बची हैं! चुनावों में मजदूरों को अमृत का गागर देने का वादा करने वाली सरकार, संकट के समय में उन्हें दो बूंद पानी तक नहीं दे पा रही है।
क्या हमारे देश की व्यवस्था इस कदर जर्जर हो चुकी है कि इस देश की एक बड़ी आबादी को मरने के लिए सड़कों पर छोड़ दिया गया है। हर दिन तस्वीरें आ रही हैं, कोई मां अपने बेटे को सूटकेस के ऊपर बैठाकर घसीटे जा रही है, किसी मासूम के पैर चलते चलते लहूलुहान हो गए हैं और किसी बच्चे का तो जन्म ही सड़क पर हुआ है।
भूख और प्यास से तड़पती जिंदगियां इस देश की सत्ता के गाल पर जोरदार तमाचा रसीद कर रही हैं। आजादी के 72 साल बाद भी जिस देश के नागरिकों को भूख और प्यास से जान गंवानी पड़े, ऐसे देश के शासन को तुरंत खुद-ब- खुद दफन क्यों नहीं हो जाना चाहिए?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि सरकार देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त में तीन टाइम का भोजन करा रही है, लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि कहां करा रही है? वित्त मंत्री के इस एलान के दो दिन बाद ही गृह मंत्रालय ने कहा कि सड़क पर पैदल चल रहे मजदूरों के भोजन-पानी की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। महज दो दिन के भीतर जिस सरकार का रवैया अपने किए गए एलान को लेकर साफ नहीं रहा, सोचिए वो इस देश के गरीबों तक किस तरह से और कैसे पहुंच पाई होगी।
सरकार के आंकड़ों की पोल परत-दर परत खुल जाएगी
चुनावों में हवाई चप्पल वालों को हवाई जहाज में उड़ाने का सपना दिखाने वाले इस देश के प्रधान सेवक उनकी इस बदहाली पर मुंह फेरे हुए हैं। सरकार हर दिन आंकड़े जारी कर रही है कि इतने मजदूरों को उनके घर पंहुचा दिया गया, लेकिन वो ये नहीं बता रही है कि कितने लोगों ने घर जाने के लिए पंजीकरण कराया है। हर रोज ट्रकों पर लद रहे, घर लौटने के लिए शहरों में जमा हो रहे और माथे पर अपनी जमा पूंजी को लादे पैदल चल रहे प्रवासी मजदूर सरकार के ऐसे दावों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।
यूपीए सरकार की जिस योजना को प्रधानमंत्री ने संसद में विफलताओं का स्मारक बताया था, इस संकट के दौर में सबसे अधिक उसी पर भरोसा जताया है। मनरेगा में सरकार ने पैसा बढ़ाया है। इस साल के बजट में मोदी सरकार ने मनरेगा को लेकर 61 हजार करोड़ रुपये दिए थे, अब 40 हजार करोड़ रुपये और बढ़ा दिए हैं। गांव लौट रहे प्रवासी मजदूरों को जरूर इससे थोड़ी-बहुत राहत मिलेगी, लेकिन फिलहाल भूखे-प्यासे सड़कों पर जो मजदूर चल रहे हैं उन्हें फिलहाल सरकार के किसी आंकड़े से कोई मतलब नहीं है।
उन्हें उम्मीद है कि इस देश की सत्ता छालों से भरे उनके पांव पर मरहम लगाएगी, उन्हें उम्मीद है कि इस देश की सरकार उनके सूखते हलक तक दों बूंद पानी पहुंचाएगी। अगर सरकार मजदूरों की इन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी, तो ये लोग किसी ना किसी दिन पलटकर सवाल जरूर पूछेंगे और तब सरकार के आंकड़ों की पोल परत-दर परत खुल जाएगी।
सत्ता जिस तरीके से इनकी अनदेखी कर रही, उसे ये सनद रहे कि जिस महल में और जिस कुर्सी पर वो आंखे बंद किए हुए बैठी है, उसे इन्हीं लोगों के हाथों ने बनाया है। जिस दिन इनके पैरों में पड़े छाले फूटेंगे, उस दिन इसके छींटे सत्ताधीशों के चेहरे पर गहरे घाव दे जाएंगे।
अदम गोंडवी से माफी सहित
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।