भारत और वैदिक विज्ञान: तुलसीदास जी ने भी रखी थी आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना
उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। तुलसीदास जी के ये पंक्तियां स्पषटतः आत्मनिर्भर भारत की ओर संकेत करती हैं। भारतीय वैदिक परंपरा में दूसरों के पोषण को महत्व दिया गया है। यही वजह है कि हम सोने की चिड़िया कहे जाते थे।
भारतीय ज्ञान विज्ञान इतना समृध्द और परिष्कृत था कि यहां अभाव का अभाव था। कृषि को लेकर कई प्रयोग किए गए थे साथ ही समृध्द जल दर्शन ने जल प्रबंधन की दिशा में भी महत्वपूर्ण अविष्कार किए थे।
भारतीय परंपरा में किस तरह आत्मनिर्भरता की व्याख्या की गई है? कैसे भारतीय वैदिक वांग्मय में इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि उद्योग विकसित करने के लिए युवाओं को तैयार किया जाए, पर विस्तार से ये लेख लिखा गया है।
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विस्तार
भिखारी को तुरंत पैसा चाहिए, मजदूर को दिन के अंत में पैसा चाहिए, चाकर या नौकर को महीने के अंत में पैसा चाहिए, बनिया अपने साल भर का हिसाब बनाता है कितना लगाया कितना कमाया लेकिन सबसे उत्तम वो है जो रचनात्मक है, जो कुछ पैदा करता है या बनाता है। यानी वो व्यक्ति जो एक विचार को रखता है और ये विशुध्द और वास्तविक विचार न सिर्फ उसे धन संपदा से परिपूर्ण कर देता है बल्कि आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भी रोजगार की संभावनाएं पैदा करते देता है।
दरअसल, भारत में ये ज्ञान लोकोत्तियों मुहावरों और तुलसीदास जी जैसे महान विचारकों के साहित्य में है। आज पाश्चात्य विचारक इसी विषय पर अपनी पुस्तकें लिखते हैं। उदाहरण के लिए "जीरो टू वन" किताब में पीटर थील इसी विषय को समझाते हैं और कहते हैं कुछ नया या इनोवेटिव करना आपको बड़ा बनाता है। जो चल रहा है उसी में अपनी संभावनाएं तलाशना तो भेड़ चाल है।
तो क्या कहते हैं हमारे तुलसी बाबा?
उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। तुलसीदास जी ने खेती को उत्तम कहा। निश्चित तौर पर व्यवसायिक शब्दावली में खेती के मायने बहुत व्यापक है। वर्तमान समय में हम कृषि व्यवसाय या पशुपालन तक इसे सीमित नहीं कर सकते। हालांकि ये भी सच है कि कृषक ही व्यवसाय जगत का सबसे बड़ा उत्पादक है। विज्ञान उसके काम करने को बेहतर और आसान बनाने पर काम करता है। व्यवसाय जगत् उसके उत्पादों के नियोजन पर काम करता है। राजनीति शासन प्रबंधन के लिए बनी है। अंततः कोई भी पैदा क्या कर रहा है, वही इस सारे प्रबंधन का मूल है।
भारत में शुरू से होती रही हैं इनोशन की बातें
आज इनोवेशन की बात की जाती है। ये इनोवेशन जब तक उत्पादक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए नहीं होंगे तब तक किसी काम के नहीं। निश्चित तौर पर अलग-अलग क्षेत्रों चाहे वो व्यवसाय हो, शासन प्रबंधन हो या पूरी कार्यप्रणाली को चलाने वाले अन्य प्रकल्प हों में भी असीम संभावनाएं है, लेकिन सिर्फ इन्हीं पर ध्यान देते रहने से ‘डिसरप्टिव इनोवेशन’ की संकल्पना पूरी नहीं हो सकती। बहुत जरूरी है कि आज के युवा स्वयं उत्पादकता को बढ़ाने के विषय में सोचें।
भारत भूमि पर हमेशा से आत्मनिर्भरता की बात होती रही है। यही वजह है कि हम आज भी कृषि प्रधान देश हैं। इस देश में पशुधन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। गायों को हमारे यहां कामधेनु की तरह पूजा जाता है। कामधेनु से तात्पर्य ही है जो सब कुछ दे दे। निश्चित तौर पर बदलते दौर में दुनिया के तौर-तरीके बदले हैं और अब मार्केटिंग और पैकेजिंग की दुनिया आ गई है इसके बावजूद मूल सिध्दांत वही है कि कुछ पैदा करना जरूरी है।
प्रकृति ही वो स्त्रोत है जिससे मनुष्य कुछ पैदा कर सकता है। यही वजह है कि सनातन विज्ञान में प्रकृति का विशेष स्थान है। यहां के जल दर्शन पर तो अलग से पूरा लेख लिखा जा सकता है। वाराहमिहिर जैसे महान वैज्ञानिक-दार्शनिकों ने तो बृहत संहिता में जलदर्शन का विस्तृत वर्णन किया है। कोई भी उद्योग आशंकाओं पर नहीं चल सकता।
यही वजह है कि भारत में काल गणनाओं का इस्तेमाल वर्षा के लिए विशेष तौर पर होता था। वाराहमिहिर ने पूर्व अर्जित और रचित ज्ञान के संकलन में इन्हीं बातों को रखा, कि मौसम और पशु पक्षियों में वर्षा काल के दौरान किस तरह के परिवर्तन आते हैं। आज भी गांव के पुराने किसान आपको आधुनिक विज्ञान से ज्यादा बेहतर भविष्यवाणियां करते मिल जाएंगे।
बुंदेलखंड में पानी की क्या हालत ये सभी जानते हैं। यही वजह है कि वो देश के सबसे पिछड़े और गरीब इलाकों में रहा है। यहां के किसान ने बहुत संघर्ष किया है और इस संघर्ष की बानगी तुलसीदास जी की कवितावली में मिलती है। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित कवितावली के पृष्ठ 116 पर लिखा है-
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
बाल, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’
न किसान को कृषि के लिए जमीन मिलती है न भिखारी को भीख, बनिए को न व्यवसाय की संभावना मिलती है और न ही नौकर को नौकरी। सभी जीविका विहीन लोग यहां रहते हैं और कहते हैं कहां जाए क्या करें? तुलसीदास जी का ये वर्णन बुंदेलखंड के बारे में बताया जाता है। ये मुगलों की गुलामी का भारत था। निश्चित तौर पर प्राचीन भारत में कृषि पध्दति और जल दर्शन के समय बुंदेलखंड की भी ये हालत नहीं रही होगी।
यही वजह है कि इन स्थितियों के बावजूद तुलसीदास जी ने कृषि को ही जीविका का उत्तम साधन बताया था। हड़प्पा कालीन अवशेष हों या उत्तर प्रदेश के कौशांबी में मौजूद नगरीय अवशेष। ये बात तो स्पष्ट है कि भारत में नगरीय व्यवस्था बहुत ही सुदृढ़ थी। यही वजह है कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से अलग अलग व्यवस्थाएं बनाई गई थी। जल संरक्षण के भी सबूत मौजूद हैं।
सूखे की समस्या और पुरातन ज्ञान-विज्ञान
बुरहानपुर का कुंडी धारा रहीम के काल में बना। ये भी कहा जाता है कि बाहरी मुल्कों से इसके लिए कारीगरों को बुलवाया गया। जबकि हकीकत ये है कि इस तरह के कई जल स्त्रोत भारत में हुआ करते थे। कुंडी धारा तो आज भी बुरहानपुर जैसे सूखाग्रस्त इलाके में जल समस्या का निदान बना हुआ है। विशेष वृक्षों को आस पास के पठारी इलाकों पर रोप कर वर्षा के जल का संरक्षण करने की ये विधि सूखाग्रस्त इलाकों में बारिश पर निर्भरता को कम करने के लिए थी।
ये तो कुछ उदाहरण हैं लेकिन हकीकत ये है कि प्राचीन भारत का ज्ञान विज्ञान बहुत समृध्द था। यही वजह है कि यहां समृध्दि थी। हमलावर वहीं आक्रमण करते हैं जहां संपन्नता होती है। ये संपन्नता भारतीय वेद दर्शन की वजह से थी। भारत में रसायन शास्त्र, भौतिकि, खगोल विज्ञान, मौसम विज्ञान, गणित आदि विभिन्न क्षेत्रों में काम किया गया। तुलसीदास जी ने क्षेत्रीय भाषा में पहले से चली आ रही लोकप्रिय कहावतों और संस्कृत साहित्य के आधार पर अपनी रचनाएं लिखीं।
स्पष्ट रूप से उन्होंने आत्मनिर्भरता के बारे में जो कुछ कहा वो भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। वर्तमान समय में यदि उसी संपन्नता को हासिल करना है तो हमें अपने ज्ञान विज्ञान की पुनर्स्थापना करनी होगी। यदि भारतीय युवाओं से वास्तविक नवाचारों की अपेक्षा है तो उन्हें वास्तविक चुनौतियों के प्रति जागृत रहना होगा। मैंने इनोवेट इंडिया पुस्तक के लेखन के दौरान कई ऐसे युवाओं से मुलाकात की जो ग्रामीण इलाकों में कृषि और पशुपालन आधारित स्टार्टअप्स के जरिए आत्मनिर्भरता हासिल की है।
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