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गढ़वाली-कुमाऊंनी अकादमी के गठन से उत्तराखंड के साहित्य और सांस्कृतिक सरोकार को मिली मान्यता

Thu, 28 Nov 2019 10:26 AM IST
Vyomesh Jugran व्योमेश जुगरान
Updated Thu, 28 Nov 2019 10:26 AM IST
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Garhwali-Kumaoni Academy in delhi Uttarakhand culture 
एक स्वतंत्र अकादमी के गठन के लिए संबंधित भाषा में उपलब्ध आवश्यक साहित्य, उसे बोलने वालों की संख्या, शब्दकोश और शोध इत्यादि अनिवार्यताओं के अभाव में सरकारें खुद को लाचार बता रही थीं। - फोटो : अजीत पोरवाल

बेशक कुछ लोग इसे दिल्ली के चुनाव से ठीक पहले आम आदमी पार्टी का वोट-चातुर्य कह लें, मगर गढ़वाली-कुमाऊंनी-जौनसारी भाषा अकादमी का गठन कर ‘आप’ ने प्रवासी उत्तराखंडी समाज के सांस्कृतिक सरोकारों को मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा काम किया है। इधर सोशल मीडिया के कारण उपजे सांस्कृतिक वातायन ने अकादमी की मांग को उत्तराखंडी समाज का बड़ा सपना बना दिया था।

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इस मांग की आयु लगातार बढ़ती जा रही थी और उसी परिमाण में सरकारें भी कठघरे में लाई जा रही थीं। एक स्वतंत्र अकादमी के गठन के लिए संबंधित भाषा में उपलब्ध आवश्यक साहित्य, उसे बोलने वालों की संख्या, शब्दकोश और शोध इत्यादि अनिवार्यताओं के अभाव में सरकारें खुद को लाचार बता रही थीं। संभव है कि सही समय की प्रतीक्षा तक ‘आप’ को भी इसी तर्क का सहारा लेना मुनासिब लगा हो लेकिन उसने दो वर्ष पहले दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी की ओर से हर वर्ष दिए जाने वाले पुरस्कारों में गढ़वाली व कुमाऊंनी के साहित्य सृजन को भी शामिल कर आधे रास्ते को पूरा नापने की जुगत जरूर की।
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इस कड़ी में सृजकों को पुरस्कार भी दिए गए। बेशक समाज ने इसका अपेक्षित संज्ञान न लिया हो, मगर इस सब बातों ने राजधानी के सांस्कृतिक वातायन में एक नई खुशबू और ऊष्मा जरूर भर दी। खासकर अपने गांवों से दूर रह रहे प्रवासी समुदायों के लिए उनके सांस्कृतिक अवयवों का जितना महत्व होता है, उससे कम महत्वपूर्ण ये उस परिवेश के लिए नहीं होते जिसमें उनकी सांसें बसी होती हैं। ऐसे अवयवों का कोई भी रूप अथवा प्रतीक अपने प्रभामंडल और इसके बाहर भी अपना प्रभाव अवश्य डालता है। 

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दिल्ली में पहाड़ी समाज महज मानव संसाधन नहीं, बल्कि अपने अनूठे लोकोत्सवों खासकर उत्तराखंडी होली और रामलीलाओं के माध्यम से यहां की मिली-जुली संस्कृति का परिमार्जक रहा है। - फोटो : अजीत पोरवाल

पर्वतीय लोकोत्सव तो राजधानी के मिश्रित सांस्कृतिक मिजाज में शानदार रंग भरते आए हैं। दिल्ली में पहाड़ी समाज महज मानव संसाधन नहीं, बल्कि अपने अनूठे लोकोत्सवों खासकर उत्तराखंडी होली और रामलीलाओं के माध्यम से यहां की मिली-जुली संस्कृति का परिमार्जक रहा है। राजधानी में उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रंगारंग आयोजनों की धूम सालभर बनी रहती है। उत्तरैणी जैसे त्योहार तो अब बाकायदा दिल्ली सरकार के सहयोग से मनाए जाने लगे हैं। अतीत से ही शान-ओ-शौकत और जायकेदार खान-पान के वैभव वाली दिल्ली के सांस्कृतिक मिजाज में होली, ईद-उल-मिलाद, लोड़ी, करवा चौथ जैसे त्योहारों-लोकोत्सवों की परंपरा में हाल के वर्षों में पूर्वांचलियों की छठ और उत्तराखंडियों की उत्तरैणी ने अपना भरपूर रंग बिखेरा है।

यह सारा समुच्चय मिलकर राजधानी के बहुआयामी लोकसंसार को बहुत समृद्ध बना देता है। जरूरी यह भी है कि इस समुच्चय की हर धारा माटी से जुड़ी पहचान के साथ बहे और नई पीढ़ी इन परंपराओं और संस्कारों को जाने। इसके लिए लोकोत्सवों और लोकभाषाओं से बेहतर औषधि कोई और नहीं हो सकती।  किसी भी समुदाय की लोकसंस्कृति संबंधित क्षेत्र के भौगोलिक वातावरण से अत्यधिक प्रभावित होती है। भौगोलिक स्थितियां ही बोली-भाषा, परंपरा, परिधान, अलंकरण, रहन-सहन, खान-पान, वाद्य, गान, नृत्य इत्यादि को प्रभावित करती हैं।

उत्तराखंड तो वैसे भी पर्वतों, नदियों और विहंगम घाटियों का प्रदेश है। इन मनोरम और विकट जगहों पर यहां के अनेक देवी-देवता विराजमान हैं। लोकदेवों की यहां एक लंबी कतार है। शिव और शक्ति यहां के लोकोत्सवों का अभिन्न अंग हैं। यही भौगोलिक स्थितियां एक सामुदायिक लोक संसार रचती हैं। लेकिन कई बार प्रगति की आकांक्षा में भौगोलिकता और इससे जुड़ी पहचान पर संकट मंडराने लगता है। आज विकास और वैश्विकता का समुदायों के सांस्कृतिक सरोकारों पर असर पड़ा है और सबसे ज्यादा संकट पर्वतवासी और वनवासी समुदायों पर मंडराया है।

 

Garhwali-Kumaoni Academy in delhi Uttarakhand culture 
उत्तराखंड में तो गांव के गांव पलायन की मार झेलने को अभिशप्त हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप वहां का समाज कई तरह की सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा है।

उत्तराखंड में तो गांव के गांव पलायन की मार झेलने को अभिशप्त हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप वहां का समाज कई तरह की सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा है। साहित्य और संस्कृति के संरक्षण का भी संकट है। देवी-देवताओं के आह्वान की लोक परंपरा और जागरों के रूप में उपलब्ध लोक साहित्य मिटता  जा रहा है। अनेक लेखकों व विद्वानों की कालजयी रचनाएं उनके दरकते पुश्तैनी घरों में मिट्टी हो गई हैं। 

सोलहवीं शताब्दी में गढ़वाली और कुमाऊंनी में ताम्रपत्रों, लेखों और असंख्य दस्तावेजों के रूप में विपुल साहित्य रचा गया जिसका हिन्दी ही नहीं, देश की अन्य भाषाओं की समृद्धि में भी बहुत योगदान रहा है। इस विपुल संपदा के संरक्षण और इसे शोधार्थियों तक पहुंचाने के लिए उत्तराखंड राज्य की सरकारों से किसी बड़ी पहल की उम्मीद अभी तक सिरे नहीं चढ़ी है। इस दिशा में पर्वतीय संगठनों की ओर से दबाव बनाए जाने की जरूरत है।

लेकिन कई बार देखा गया है कि सांस्कृतिक संगठन अपनी वास्तविक जिम्मेदारियों की बजाय महज मनोरंजन और धाक जमाने के उद्देश्य तक सीमित रह जाते हैं। सोशल मीडिया के चलते सूचनाओं के सहज व आसान संप्रेषण के कारण भी ऐसा हो रहा है। हालांकि मनोरंजन और अपनी-अपनी संस्थाओं की धाक जमाने पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, परंतु सिर्फ यही न हो कि नरेन्द्र सिंह नेगी जी-हीरासिंह राणा जी आएं, लोगों के बीच गाएं, लोग थिरकें-नाचें और फिर पर्दा-दरी समेट ली जाए। बेहतर हो कि मनोरंजन के साथ-साथ इन उत्सवों को पूरे समुदाय के बड़े सराकारों/समस्याओं से जोड़ा जाए। ऐसे में सांस्कृतिक संगठनों और संबंधित भाषा अकादमियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
    
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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