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महात्मा गांधी जयंती विशेष: शांति और अहिंसा, 21वीं सदी की आवश्यकता

Dr. Rakesh Rana डॉ. राकेेेेश राणा
Updated Fri, 01 Oct 2021 10:09 PM IST
सार

शांति की स्थायी संस्कृति का निर्माण विश्व कल्याण के लिए आवश्यक है। शिक्षा इसका एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। शांति की संस्कृति को विकसित करने में शिक्षा की अहम् भूमिका हो सकती है।

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Gandhi jayanti 2021 Peace And Non Violence is need of 21st century
महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

विस्तार

दुनिया अभी तक छोटे-बड़े लगभग 20 हजार युद्ध देख चुकी है। कई देशों की सीमाएं चैबीसों घंटे युद्ध और अशांति की आशंकाओं से हांफती रहती है। विश्वशांति के लिए किये जा रहे प्रयास परमाणु हथियारों के बढ़ते जखीरे के साथ आडंबर साबित हो रहे है। विश्व में आण्विक हथियारों का भारी जखीरा जमा हो गया है। विज्ञान रक्षा-सुरक्षा के चाक-चैबंद आविष्कारों में अधिकतम् मारक क्षमता की होड़ में दिन रात जुटा हुआ है। सम्पूर्ण विश्व हिंसा के दौर में जी रहा हैं।

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आज असहिष्णुता, कट्टरता, हिंसा और अशांति विकास और मानव कल्याण में सबसे बड़ी बाधा है। लोकतंत्र में नागरिक शक्ति शैनः शैनः हाशिए पर पंहुच गयी है। सैन्य शक्ति समाज और राष्टृ जीवन का अनुप्राण बन गई है। सैन्य और सुरक्षा खर्चों का बेतहाशा बढ़ता बोझ आर्थिक संकट पैदा कर लोकतंत्र को तानाशाही की तरफ खींच रहा है। नवउदारवाद के दौर की राजनीति भी विश्व में बढ़ती हिंसा और अशांति के समाधान की दिशा में कारगर होती नहीं दिख रही है। बल्कि मौजूदा राजनीति ने तो दुनियां में सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को और गहराया है। पर्यावरण क्षरण के प्रश्न पहले से ज्यादा गंभीर हुए है।

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गांधी की प्रासंगिकता और विश्व 

आज विश्व को यह भाव अंगीकार करने की महती आवश्यकता है कि सब मानवीयता के एकत्व को स्वीकार करें। एक दूसरे की समस्याओं और जरुरतों को समझे। संकटकाल में सच्चे सहयोगी की भूमिका में एक-दूसरे के साथ खड़े हो। दुनिया अब ग्लोबल विलेज के रुप में उभर रही है। विश्व के एक हिस्से में घटी घटना अंततः समूचे विश्व को प्रभावित करती है।

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दुनिया को हर छोटी-बड़ी घटना को स्थानीय संदर्भ के साथ-साथ वैश्विक समस्या के रूप में भी देखना-समझना होगा। आज के बाजारवादी युग में सहयोग, करुणा और समानता के मूल्य रोपने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरुरत है। विकसित और विकासशील देशों के मध्य बढ़ती विषमता मौजूदा अधिकांश संकटों का सबसे बड़ा कारण है।


पूंजी का संकेन्द्रण कुछ हाथों में हो जाना, भावी विश्व का भयावह संकट बनने वाला है। यह स्थिति व्यक्ति, समूह और राष्टृ सभी स्तरों पर बन रही है जो खतरनाक है। विश्व के संसाधनों का गैर-वाजिब और अन्यायपूर्ण वितरण ही प्रतिदिन करीब 4400 इंसानों को शरणार्थी शरणगाहों में धकेल देता है। हम कैसी दुनिया बना रहे है। हमारे क्रिया-कलाप एक वीभत्स परिदृश्य पैदा कर रहे है। जिसमें इंसान एक पाश्विक जीवन जीने को अभिशप्त है। यह सब अशांति और हिंसा का परिणाम है। इसलिए एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए अहिंसा और शांति की आवश्यकता है।

अंध उपभोक्तावाद की संस्कृति ने जिस तरह से समूची दुनियां को अपनी गिरफत में लिया है। उसी का ही परिणाम है कि जल, जंगल, जमीन सब तेजी से घट रहे हैं। नतीजतन पारिस्थितिकीय विघटन के रुप में जलवायु परिवर्तन का खतरा हमारे सामने है। अतिश्य उपभोग की संस्कृति समाज में विभिन्न रुपों में तनाव, दबाव और अभाव पैदा कर रही है। परिणाम अशांति, संघर्ष, असंतोष और अनिश्चितता का भय हर तरफ व्याप्त है। शांति की प्राथमिक दशा किसी भी तरह के तनाव, हिंसा और टकराव की अनुपस्थिति है।

हिंसा, शोषण और अन्याय के सभी रूपों की अनुपस्थिति तथा सहकार एवं सहयोग की संस्कृति ही शांति है। पारिस्थितीकीय संतुलन, संरक्षण और संवर्द्धन वाली ऐसी जीवन शैली जो सृजन की पूर्णता में सहायक हो वही सतत् शांति वाला समाज निर्माण करती है। शांति व्यक्ति से शुरू होकर परिवार, समुदाय, राष्टृ और विश्व समाज तक फैलती जाती है। अब दुनिया को शांति की सर्वाधिक जरुरत है इसके अभाव में लोकतंत्र खतरे में है।

Gandhi jayanti 2021 Peace And Non Violence is need of 21st century
गांधी दुनिया के लिए आज भी प्रासंगिक हैं। - फोटो : Facebook/CMO Rajasthan

शांति का मार्ग और बापू 

शांति की स्थायी संस्कृति का निर्माण विश्व कल्याण के लिए आवश्यक है। शिक्षा इसका एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। शांति की संस्कृति को विकसित करने में शिक्षा की अहम् भूमिका हो सकती है। शांति की संस्कृति का विकास आज की आपात् आवश्यकता है। विश्व समाज जिस तरह अंध-उपभोक्तावाद की भयानक चपेट में है। हर तरफ हिंसा, अन्याय, असुरक्षा और प्रतिद्वंदिता का माहौल है। मनुष्य जिस तरह बेबस सा घोर दबावों, तनावों और चिंताओं में जीने को अभिशप्त है।

ऐसे में एक समरस, समृद्ध और शांतिपूर्ण तथा अहिंसक समाज के निर्माण की दिशा में संवेदनशील दृष्टि, सार्थक सोच और समष्टि भाव के साथ ही बढ़ा जा सकता है। इंसान वहीं है जो उपेक्षितों के उपलक्ष के लिए जिए। उपेक्षा और उदासीनता सामाजिक सद्भाव को मारती है। जिसके अभाव में सहयोग संभव नहीं रह पाता।

उपेक्षा और उदासीनता लालच और ईर्ष्या से पैदा होती है। ऐसे में सद्भावपूर्ण जीवन की मौजूदगी संभव नहीं है। इसमें भारतीय जीवन दृष्टि बहुत कारगर है। जिसका आध्यात्मिक दृष्टिकोण भले ही उन समास्याओं का समाधान न कर पाए जो कि आत्मकेंद्रित सोच का परिणाम है। पर यह उन समस्याओं के समाधान का आधार अवश्य बनेगा जो संकुचित दृष्टिकोण से उपजी हैं। जो अशांति और हिंसा के मूल में काम करती है।
 

शांति और अहिंसा की स्थापना का कार्य व्यक्ति निर्माण से शुरु कर समाज और राष्टृ निर्माण से होते हुए बेहतर विश्व बनाने की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है। इस दृष्टि से शांति के लिए शिक्षा की जो अवधारणा है वह ऐसे ज्ञान कौशल, अभिरूचि और मूल्यों का पोषण करती है जिनसे शांति की संस्कृति निर्मित होती है। शांति के लिए शिक्षा समग्रतामूलक है। मानवीय मूल्यों के जिस ढांचे के भीतर बच्चों का भौतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक विकास होता है यह अवधारणा उन्हीं की निर्मिति है।


शांति के लिए शिक्षा के दो मुख्य निहितार्थ है पहला शांति मानवीय अस्तित्व के सभी पहलुओं और आयामों को परस्पर निर्भर तरीके से अपने भीतर शामिल किये हुए है। शांतचित वाले लोग ही दूसरों के साथ शांतिपूर्ण व्यवहार कर सकते है और समाज में ऐसी संवेदनशीलता का विकास कर सकते है जो प्रकृति के प्रति उचित और अनुरागी हो। दूसरा शांति पारस्परिकता में अतंर्निहित है।

प्रेम, स्वतंत्रता और शांति सरीखे मूल्य दूसरों बांटकर ही पोषित किए जा सकते है। इनके वितरण में ही इनकी वृद्धि और समृद्धि निहित है। हिंसा का निम्नतम् स्तर ही सभ्य होने का पैमाना है। शांति की संस्कृति का विकास एक सभ्य समाज की प्रतिस्थापना की आवश्यक पूर्वशर्त है।

ऐसी स्थितियां, परिस्थितियां और मनःस्थितियां जिनमें सब रहना पसंद करे वहीं शांति है। शांति प्रक्रिया के माध्यम से ही कोई व्यक्ति, समूह, समाज, राष्टृ अथवा सरकार पूर्णता को प्राप्त करना चाहता है अपने सर्वोकृष्ट रुप में उपस्थित होना चाहता है। प्रेम, सत्य, न्याय, समानता, सहनशीलता, सौहाद्र, विनम्रता, सहजता, एकजुटता और आत्मसंयम शांति इन सारे मूल्यों को व्यवहार में लाने पर बल देती है।

वास्तव में ये सभी वे जीवन-मूल्य है जो हमारे दैनिक व्यवहार को संगठित और संतुलित बनाते है। हम अपने सामाजिक जीवन में मानसिक सुकुन और सकारात्मक उर्जा से भरे हुए सभी क्रिया-कलापों को सम्पन्न करना चाहते हैं। शांति की प्राथ्मिक दशा किसी भी तरह के तनाव, हिंसा और टकराव की अनुपस्थिति है। हिंसा, शोषण और अन्याय के सभी रूपों की अनुपस्थिति तथा सहकार एवं सहयोग की संस्कृति ही शांति है।

Gandhi jayanti 2021 Peace And Non Violence is need of 21st century
देश और समाज को बनाने की जो दृष्टि गांधी ने दी वह दिव्य है। - फोटो : iStock

सामाजिक समस्याएं, गांधी का रास्ता और दुनिया 

मौजूदा समाज व्यवस्था में गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, असमानता, अन्याय, भेदभाव और शोषण सब सामाजिक प्रगति के गहरे अवरोध हैं। समकालीन समाज में बढ़ती असमानता, गरीबी, बेकारी, पर्यावरणीय समस्यायें और मौजूदा विकास के संकटों के समाधान की दिशा में गांधी का शांति-अहिंसा दर्शन एक सशक्त हस्तक्षेप कर सकता है। गांधी ने अहिंसा के मूल्य को भारतीय जनमानस में एक शक्तिपीठ की तरह स्थापित कर दिया। इस अमोघ अस्त्र ने देशों की सैन्य कमजोरी को शक्ति स्फुरण में तबदील किया।

अहिंसा को शक्ति, सत्याग्रह को अस्त्र और सहनशीलता को सक्रियता में रुपांतरित कर साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। देश और समाज को बनाने की जो दृष्टि गांधी ने दी वह दिव्य है। गांधी का राष्टृ-निर्माण स्वराज्य शैली में शुरु होता है और सर्वोदय के साथ नए हिन्दुस्तान की नई सुबह में उसका दीदार होता है। गांधी हिन्द स्वराज के बहाने प्रबल आग्रहों के साथ मशीनी सभ्यता के पर्यावरण और मानव विरोधी रवैरिए को समझाने की हर संभव कोशिश करते है।
 

आर्थिक साम्राज्यवाद किस तरह गैर-बराबरी को हिंसा की छत्रछाया में पालता-पोसता हैं, कैसे समाज को अशांति का अखाड़ा बनाता है। गांधी-विचार में सत्य मनुष्य का ध्येय हैं। जिसे प्राप्त करने का एकमात्र तरीका अहिंसा है, और अहिंसा पर चलने की उर्जा का स्रोत धर्म के सिवा कोई नहीं है तथा धर्म नैतिक नियमों की एक आदर्श व्यवस्था है।


जो मानवीय लक्ष्यों को पाने की पूर्व-आवश्यकता है। इन महान मानवीय मूल्यों को शांति की संस्कृति और अहिंसा के धरातल पर ही रोपा जा सकता है। शांति निर्माण की दिशा में शिक्षा ही एकमात्र सहायिका दिखाई पड़ती है जिसके साथ नए चरित्र और नए मानस निर्माण के प्रयोग प्रारम्भ किये जा सकते हैं। शांति की संस्कृति हेतु नये संस्कार समाज में रोपे जा सकते है।

शांति की संस्कृति से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को भी गुणात्मक ढ़ंग से परिवर्तित और संवर्द्धित किया जा सकता है। एक सभ्य समाज में मनुष्य के जीने का तरीका शांति के अनुसाशन से ही निर्देशित और संचालित हो तभी जीवन को गरिमामय माना जा सकता है। समाज में अहिंसा और शांति जैसे मूल्यों के लिए आवश्यक समाज-भौतिकीय स्थितियां बने तभी इन जीवन मूल्यों के उच्चतर लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बढ़ा जा सकता हैं। शांति और अहिंसा 21वीं सदी की आवश्यकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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