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वैज्ञानिकों का दावा: जंगल की आग और बादलों के फटने की घटनाओं का करीबी संबंध

Thu, 04 Jul 2024 12:19 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 04 Jul 2024 12:19 PM IST
सार

वैज्ञानिक पत्रिका ’एटमॉस्फीयरिक एनवायरमेंट’ में फरवरी 2021 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार जंगल की आग और बादलों के फटने की घटनाओं का करीबी संबंध है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल (एचएनबी) विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी कानपुर द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर की सक्रियता को मापा है।

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Forest Fire And Cloudburst Know Connection And Its Impact
वैज्ञानिक पत्रिका ’एटमॉस्फीयरिक एनवायरमेंट’ में फरवरी 2021 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार जंगल की आग और बादलों के फटने की घटनाओं का करीबी संबंध है। - फोटो : Freepik

विस्तार

इस साल का मॉनसून लगभग सारे भारत में छा गया है और इसके साथ ही बाढ़, भूस्खलन, बिजली गिरने एवं बादल फटने जैसी मानसून संबंधी आपदाओं का खतरा भी विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में मंडराने लगा है। चूंकि मौसम विभाग ने इस साल समान्य से अधिक गर्मी का पूर्वानुमान लगाया था जिसका कटु अनुभव हो ही गया और अब सामान्य से अधिक वर्षा की भविष्यवाणी को हमने 28 जून को दिल्ली में हुई रिकार्ड अतिवृष्टि से सच होती हुई भी देख लिया है। लेकिन इससे भी अधिक डरावनी आशंका बादल फटने की घटनाओं की है जो कि हर साल खास कर हिमालयी राज्यों और पश्चिमी घाट जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कहर बरपाती है।

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विशेषज्ञ बादल फटने की घटनाओं को वनाग्नि से जोड़ कर देख रहे हैं। चूंकि इस साल देश में और खास कर हिमालयी राज्यों में वनाग्नि की घटनाएं कुछ ज्यादा ही हुई हैं इसलिए बादल फटने का खतरा भी उतना ही बढ़ा है, इसलिए आपदा प्रबंध तंत्रों को चैबीसों घण्टे सजग रहने की जरूरत है।

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वनाग्नि और बादल फटने का करीबी संबंध

वैज्ञानिक पत्रिका ’एटमॉस्फीयरिक एनवायरमेंट’ में फरवरी 2021 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार जंगल की आग और बादलों के फटने की घटनाओं का करीबी संबंध है।

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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल (एचएनबी) विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी कानपुर द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर की सक्रियता को मापा है। साथ ही उन्होंने पहली बार मध्य हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में मौसम की विभिन्न स्थितियों के प्रभाव में अधिक ऊंचाई वाले बादलों के निर्माण और स्थानीय मौसम की घटनाओं की जटिलता पर इसके प्रभाव का अध्ययन किया है। 


इन वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि बादल की छोटी बूंदों के आकार के बराबर कण जिस पर जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है, उनमें और जंगल की आग की घटनाओं के बीच गहरा सम्बन्ध है। इन छोटे कणों को क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर (सीसीएन) के नाम से जाना जाता है।

शोध से पता चला है कि जंगल में लगने वाली आग की घटनाओं के समय ऐसे कणों की मात्रा चरम पर थी। वैज्ञानिकों ने एचएनबी विश्वविद्यालय के स्वामी राम तीर्थ (एसआरटी) परिसर में स्थित हिमालयन क्लाउड ऑब्जर्वेटरी (एचसीओ) में छोटी बूंदों को मापने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक (डीएमटी) सीसीएन काउंटर की मदद से इन क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर को मापा गया था, जोकि अतिसंतृप्ति (एसएस) की मौजूदगी में कोहरे या बादल की बूंदों के रूप में सक्रिय और विकसित हो सकते हैं।


जंगल की आग और आसमानी पानी का खतरनाक संयोग

वैज्ञानिकों का यह अध्ययन उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए सचमुच चिन्ता पैदा करने वाला है, क्योंकि वानाग्नि और बादल फटने की सर्वाधिक घटनाएं इन्हीं राज्यों में होती हैं और ये घटनाएं निरन्तर बढ़ती जा रही है। नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) के एक्वा और टेरा उपग्रहों पर लगे मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर सेंसर द्वारा एकत्र किए गए डेटा के अनुसार, इस मौसम (नवंबर से जून) में जंगल की आग से उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।

सेंसर ने 10 जून, 2024 तक राज्य में 2,154 वनाग्नि की घटनाओं को कैप्चर किया। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस साल वनाग्नि की सबसे अधिक घटनाएं मिजोरम (3,738), मणिपुर (1,702), असम (1,652), मेघालय (1,252) और महाराष्ट्र (1,215) में हुई हैं।

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बादल फटने से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं आम हो गई हैं। - फोटो : PTI

मौसम विभाग की बादल फटने की परिभाषा

विश्व मौसम संगठन (डब्ल्युएमओ) के अनुसार बादल एक हाइड्रोमेटोर है जिसमें तरल पानी या बर्फ या दोनों के सूक्ष्म कण होते हैं, जो वायुमंडल में तैरते हैं और आमतौर पर जमीन को नहीं छूते हैं। वैज्ञानिक जर्नल ‘‘क्लाइमेट रिसर्च लैब’’ में प्रकाशित राॅक्सी मैथ्यू कोल के शोध के अनुसार एक मामूली आकार के बादल (1 घन किलोमीटर) में 500,000 लीटर से ज्यादा पानी हो सकता है। बादल फटना सामान्य बारिस से अलग होता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग एक सीमित क्षेत्र में 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक वर्षा को बादल फटना कहता है।

मौसम विज्ञानियों के अनुसार बादल फटने की घटनाएं अक्सर क्यूम्यलोनिम्बस बादलों से जुड़ी होती हैं जो गरज के साथ बारिश करते हैं और कभी-कभी मानसूनी हवा के झोंकों और अन्य मौसमी घटनाओं के कारण भी होते हैं। क्यूम्यलोनिम्बस बादल पूरे क्षोभमंडल में 12 से 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक बढ़ सकते हैं और भारी मात्रा में पानी को रोक कर नीचे गिरा सकते हैं।

भारत में बादल फटने की घटनाएं अक्सर मॉनसून के मौसम में होती हैं, जब दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाएं बहुत अधिक मात्रा में नमी लाती हैं, इसलिए, बादल फटना ज्यादातर हिमालय, पश्चिमी घाट और भारत के पूर्वोत्तर पहाड़ी राज्यों के ऊबड़-खाबड़ इलाकों में होता है। नाजुक खड़ी ढलानों पर भारी बारिश के कारण भूस्खलन, मलबा बहने से अचानक बाढ़ आती है, जिससे बड़े पैमाने पर विनाश होता है।

जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण हिमालय क्षेत्र में इन घटनाओं की आवृति बढ़ती जा रही है और इससे जुड़ी आपदाएं हर साल हजारों लोगों को प्रभावित करती हैं और जान-माल, आजीविका, बुनियादी ढांचे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। असामान्य वर्षा से गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी हिमालयी नदियों में बाढ़ आ जाती है जिससे मैदानी भारत का एक बहुत बड़ा भाग भी प्रभावित होता है।

सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव

बादल फटने की आपदाओं में सावधानी को सबसे बड़ा बचाव का उपाय माना जा सकता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का मानना है कि बादल फटने की आशंका वाले उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से डिजाइन की गयी जल निकासी प्रणालियों, रिटेनिंग दीवारों और तटबंधों के निर्माण करने के साथ ही इन संरचनाओं को अतिरिक्त पानी को प्रभावी ढंग से चैनलाइज करने और अचानक बाढ़ को रोकने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए जिससे मानव बस्तियों और सड़कों, पुलों और इमारतों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा हो सके। 

बादल फटने के प्रभाव को कम करने के लिए भूमि-उपयोग नियोजन रणनीतियों का कार्यान्वयन भी जरूरी है। विशेषज्ञ बादल फटने की आशंका वाले संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर मानचित्रण करने और इन क्षेत्रों में निर्माण को प्रतिबंधित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। जोनिंग विनियमों और बिल्डिंग कोड का सख्ती से पालन करने से मानव बस्तियों के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। वनों का संरक्षण बादल फटने के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मौसम वेधशालाओं की कमी

हिमालय के कई क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं की ओर अक्सर मौसम संबंधी वेधशालाओं की अनुपस्थिति के कारण किसी का ध्यान नहीं जाता है। कई बार ये घटनाएं भारी विनाश के बाद ही सामने आ पाती हैं। अधिक नुकसान नजर न आने पर इन्हें केवल नदियों के साथ होने वाला जलप्लावन मान लिया जाता है। इन घटनाओं के दौरान ढलान में दरारें और किनारे का कटाव आम है, जिसके परिणामस्वरूप तलछट जमा हो जाती है और कभी-कभी नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे वे बड़ी झील में बदल जाती हैं और बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है।
 

बादल फटने से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं आम हो गई हैं। सन् 1977 में इस तरह के हादसे में तवाघाट में 25 सैनिकों सहित  44 लोग मारे गये थे। उसके बाद 1996 में बेरीनाग में 18 लोग मारे गए। सन् 1998 के अगस्त में ही मालपा में 60 प्रोतिमा बेदी आदि मानसरोवर यात्रियों सहित 219 और उखीमठ क्षेत्र में 101 लोग मारे गए थे। 


धरचुला के खेत गांव में 12 जुलाई 2002 को हुए भूस्खलन में 5 लोग मारे गए थे। हड़की में सन् 2000 में 19, घनसाली और बूढ़ाकेदार में 10 अगस्त सन् 2002 में 28 लोग और 99 पशु, बरहम में 2007 में 18 तथा हेमकुण्ड में 2008 में 11 लोग मारे गये थे।बूढ़ाकेदार मेंकी त्रासदी में ग्रामीणों के 22 घराट बहने से लोग लम्बे समय तक रोटी के लिए तरस गए।

14 सितम्बर 2012 की मध्य रात्रि तहसील-ऊखीमठ के विभिन्न ग्रामों ग्राम किमाणा, जुआतोक, चुन्नी, मंगोली, संसारी, ब्राहमणखोला तोक, प्रेमनगर तोक में एवं16 सितम्बर 2012 को तहसील-जखोली में डूंगर-सेमला, किरोडामल्ला, तिवाडा तिमली में बादल फटने की घटना से 51 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी एवं शेष 14 व्यक्ति घायल हो गये थे।

इससे पहले 1979 में कोन्था गांव में 50 लोग मारे गये थे। सन् 1868 में बिरही नदी के अवरुद्ध होने के बाद इस झील के टूटने से 73 लोग मारे गए थे उसके बाद इसी तरह गौणाताल का निर्माण हुआ और जब वह टूटा तो फिर अलकनन्दा में बाड़ आ गई। बिरही झील बनने के बाद बादल फटने से त्वरित बाढ़ और भूस्खलन की लगभग 30 घटनाओं में सेकड़ों लोग मारे जा चुके हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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