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निजी चार्टर सेवाओं पर नर्म रवैया और जांच की देरी: दुर्घटना से उठते सवाल
सार
डीजीसीए के ऑडिट और सर्विलांस रिपोर्टों में भी वे गंभीर निष्कर्ष नहीं दिखे, जो बाद में जांच में सामने आए। गौरतलब है कि इसी ऑपरेटर का एक और विमान जनवरी 2026 में बारामती में भी दुर्घटना का शिकार हुआ, जिसमें तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत हुई।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
14 सितंबर 2023 को मुंबई हवाई अड्डे पर एक निजी चार्टर कंपनी के लियरजेट 45XR की दुर्घटना की अंतिम जांच रिपोर्ट तीन साल से अधिक समय बाद आई। विजयवाड़ा से मुंबई आ रहे इस गैर-अनुसूचित विमान ने भारी बारिश और कम दृश्यता में रनवे 27 पर अस्थिर एप्रोच जारी रखा।
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ऑटो पायलट डिस्कनेक्ट के बाद विमान केंद्र रेखा से भटका, गति कम हुई, कम ऊंचाई पर स्टॉल में गया और नियंत्रण खो बैठा। आठों लोग गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन कोई मौत नहीं हुई। रिपोर्ट का संभावित कारण स्पष्ट है: चालक दल का सीमांत मौसम में अस्थिर एप्रोच जारी रखने का फैसला और विमान की अनुचित हैंडलिंग।
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फिर भी यह रिपोर्ट कई बड़े सवाल खड़े करती है। पहला, जांच इतनी देर क्यों लगी? अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के मानकों के अनुसार अंतिम रिपोर्ट आमतौर पर 12 महीने में आनी चाहिए। यहां मौसम साफ-साफ एक कारक था, मेटार में 800 मीटर दृश्यता, 1000 मीटर आरवीआर, भारी बारिश और 8-10 नॉट टेलविंड। सीवीआर और एफडीआर डेटा उपलब्ध थे।
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फिर भी रिपोर्ट तीन साल बाद आई। जब मौसम इतना स्पष्ट योगदान देने वाला कारक हो, तो इतनी लंबी जांच का औचित्य कमजोर पड़ जाता है। देरी से सबक लेने और सुधार लागू करने का अवसर भी खो जाता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा गैर-अनुसूचित ऑपरेटरों पर निगरानी का है। रिपोर्ट में चार्टर कंपनी में प्रशिक्षण, रिकॉर्ड कीपिंग और आंतरिक ऑडिट की कमियां भी उजागर हुईं। रिपोर्ट के अनुसार कुछ पायलटों के रिकरंट ट्रेनिंग में क्रिटिकल इमरजेंसी एक्सरसाइज पूरी तरह नहीं कराए गए। तकनीकी और एयरफ्रेम लॉगबुक ठीक से नहीं भरी गईं। कंपनी के आंतरिक ऑडिट सामान्य स्तर के थे।
डीजीसीए के ऑडिट और सर्विलांस रिपोर्टों में भी वे गंभीर निष्कर्ष नहीं दिखे, जो बाद में जांच में सामने आए। गौरतलब है कि इसी ऑपरेटर का एक और विमान जनवरी 2026 में बारामती में भी दुर्घटना का शिकार हुआ, जिसमें तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत हुई।
उसके बाद डीजीसीए ने विशेष ऑडिट किया और कई गैर-अनुपालन पाकर इस कंपनी के चार विमान ग्राउंड कर दिए। सवाल उठता है कि 2023 की दुर्घटना के बाद या नियमित ऑडिट में ये कमियां क्यों नहीं पकड़ी गईं? क्या गैर-अनुसूचित और जनरल एविएशन सेक्टर में डीजीसीए का रवैया अपेक्षाकृत नरम रहा है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे ऑपरेटर अक्सर उच्च प्रोफाइल लोगों को उड़ाते हैं और वाणिज्यिक एयरलाइनों की तुलना में कम सख्त निगरानी के दायरे में आते हैं। रिपोर्ट में चालक दल द्वारा मुंबई पर 1200 यूटीसी के बाद गैर-अनुसूचित उड़ानों के प्रतिबंध से पहले उतरने की चिंता का जिक्र है। यह दबाव ऑपरेटर की व्यावसायिक बाध्यताओं से भी जुड़ा हो सकता है।
जब नियामक संस्थाएं प्रशिक्षण और ऑडिट की निरंतरता सुनिश्चित नहीं करतीं, तो ऐसे दबावों में गलत फैसले होने की संभावना बढ़ जाती है।
तीसरा मुद्दा दोषारोपण का है। इस मामले में पायलट बच गए, इसलिए रिपोर्ट में उनके फैसले, एसओपी का पालन न करना (गो-अराउंड देर से बुलाना, चेकलिस्ट का चैलेंज-रिस्पॉन्स न करना, गति की निगरानी न करना) स्पष्ट रूप से दर्ज है। लेकिन कई दुर्घटनाओं में, जहां पायलट नहीं बचते, दोष लगभग पूरी तरह उनके ऊपर डाल दिया जाता है।
सिस्टम की कमियां, प्रशिक्षण की खामियां, ऑपरेटर की संस्कृति, नियामक की ढीली निगरानी आदि पीछे छूट जाती हैं। जांच का उद्देश्य दोष लगाना नहीं, बल्कि दुर्घटना रोकना है। जब सिर्फ पायलट पर दोष आता है और संगठनात्मक/नियामक कारकों को ‘योगदान करने वाले’ तक सीमित रखा जाता है, तो सुधार अधूरा रह जाता है।
इसी दुर्घटना की बात करें तो विजयवाड़ा एटीसी पर सवाल भी उठाया गया है। विजयवाड़ा और मुंबई के बीच हवाई दूरी कम नहीं है। मौसम गतिशील होता है। पायलटों ने मुंबई एटीआईएस से मौसम लिया था और प्रतिबंध के बारे में जागरूक थे। अंतिम गो/नो-गो और एप्रोच जारी रखने या छोड़ने का फैसला कमांडर का होता है।
एटीसी सामान्यतः रनवे की उपलब्धता और मौसम की रिपोर्टिंग करती है, लेकिन उड़ान रद्द करने की सलाह देने की कानूनी बाध्यता हर स्थिति में नहीं होती। फिर भी, जब गंतव्य पर मौसम सीमांत हो और ऑपरेटर पर समय का दबाव हो, तो एटीसी और ऑपरेटर दोनों को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। रिपोर्ट में एएआई को वेक टर्बुलेंस सेपरेशन पर संवेदनशील बनाने की सिफारिश है, जो दिखाती है कि एटीसी पक्ष की भी समीक्षा जरूरी है।
रिपोर्ट में डीजीसीए को प्रशिक्षण में लैंडिंग कॉन्फिगरेशन में स्टॉल रिकवरी शामिल करने, एनएसओपी/जीए पायलटों के ट्रेनिंग रिकॉर्ड की एकबारगी जांच, गो-अराउंड संस्कृति को मजबूत करने, आंतरिक ऑडिट की प्रभावशीलता जांचने और क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट बढ़ाने की सिफारिशें भी दी गई हैं। ये सही दिशा में हैं, लेकिन जांचकर्ता का कर्तव्य केवल सामान्य सिफारिशें देना नहीं, बल्कि समान या समान मौसम स्थितियों में पायलटों द्वारा उठाए जाने वाले ठोस कदमों को एसओपी के रूप में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करना भी है।
यदि रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं होता कि ‘ऐसी दृश्यता और टेलविंड में अस्थिर एप्रोच पर तुरंत गो-अराउंड कब अनिवार्य है’ या ‘प्रतिबंध समय से पहले उतरने के दबाव में निर्णय कैसे लें’, तो इसका निवारक उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
निजी चार्टर सेवाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा वाणिज्यिक उड़ानों जितनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। डीजीसीए और एएआईबी दोनों को गैर-अनुसूचित सेक्टर में सक्रिय, सख्त और समयबद्ध निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। जांच में तीन साल न लगे।
दोष केवल उन पर न डाला जाए जो नहीं बचे। सिफारिशें इतनी ठोस हों कि अगली बार पायलट, ऑपरेटर और नियामक, तीनों जानें कि सीमांत मौसम में क्या करना है और क्या नहीं। अन्यथा ये रिपोर्टें सिर्फ दस्तावेज बनकर रह जाएंगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।