Happy Father's Day 2020: पिता एक शब्द नहीं संसार है..!
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स्वयं को हिटलर सा कठोर दिखाने की कोशिश हर भारतीय पिता की पहचान लगती है। जो बाहर से एक दम कठोर लेकिन भीतर से बेहद नरम दिल वाला। बुलंद आवाज के पीछे कंपन होते शब्द बच्चों को डपट देते हैं, ताकि वो जीवन में उन थपेडों को सहन कर सकें, जो समय-समय पर उनको मिलते रहेंगे, पिता के साथ भी और पिता के बाद भी।
पिता एक शब्द नहीं संसार है, जो बच्चों को समाज और परंपराओं के कई दायरे में चलना सिखाता है, मजबूत बनाता है, और सबसे खास बात कि कभी इसका श्रेय भी नहीं लेना चाहते। सारे काम करने के बाद श्रेय हमेशा मां को ही देना चाहते हैं।
पिता ऐसी शख्यियत है, जो सारी बुराई अपने सिर लेने को बेताब रहता है-वो हिटलर हैं, अनुशासित हैं, बच्चों को डांट-डपट लगाने की जिम्मेदारी लिए हुए है, सुबह-सवेरे नींद से जगाने की गलती उन्हें ही करनी है।
पढ़ाई-लिखाई पर सवाल उन्हें ही पूछकर डॉन बनना है, बच्चों को अपनी लाइफ में खुद से भी आगे ले जाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है, बच्चों की सबसे बड़ी शिकायत पापा हमेशा हमारे पीछे पड़े रहते हैं....जैसी बातें खुद पर ही लेनी है।
बिना किसी डर के, यह सोचे बिना ऐसा करने से उनकी नकारात्मक छवि बच्चों के मन में बन सकती है। बारिकी से देखें तो पिता के इस सख्त रवैये से कितने बच्चे जीवन में सफल हो जाते हैं।
इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। बच्चों को भी अपने पिता का यह हिटलर रूप तब समझ आता है, जब वो खुद पिता की जिम्मेदारी उठाते हैं। निसंदेह इस धरती पर मां का आंचल स्वर्ग है, तो पिता स्वर्ग का द्वार।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता का सर्वोच्च स्थान है। माता का कोमल आंचल प्यार-दुलार बच्चों का जीवन सरल बना देता है। पिता का मजबूत साया जीवन के गर्म थपेड़ों से बचाता है।
हमारी संस्कृति में प्रत्येक दिन की शुरूआत माता-पिता के आशीर्वाद से करने की परंपरा है। यद्यपि वैश्वीकरण के इस दौर में हम विभिन्न अंतरराष्ट्रीय दिवसों को खुशी से सेलिब्रेट करते हैं। इसी परिपेक्ष में प्रत्येक वर्ष जून के तीसरे रविवार को 'इंटरनेशनल फादर्स डे' मनाया जाता है।
इस वर्ष 21 जून को विश्व फादर्स डे मनाया जा रहा है। भारत में भी फादर्स डे की खूब धूम रहती है। क्योंकि प्रेम बांटने से बढ़ता हैं। फिर वह किसी भी रूप में क्यों न हो? दुनिया का एक अनोखा किरदार, जो अपनी कामयाबी से ज्यादा अपने बच्चों की कामयाबी की दुआऐं मांगता है।
पूरी कायनात में वो पहला शख्स है, जो अपनी हार में खुश होता है। वो मां जैसा प्यार दुलार भी देना जानता है, दोस्त जैसा साथ देना भी जानता है, शिक्षक जैसी गलतियां भी गिनाता है।
एक ऐसा सुरक्षा कवच जिसकी सुरक्षा में रहते हुए, हम अपने जीवन को सार्थक दिशा देने में कामयाब होते हैं। हालांकि समाज का अब रूप बदल रहा है।
आज की नई पीढ़ी के पिता अपने बच्चों को सख्त अनुशासन वाले रूप से इतर बचपन से बच्चों को विशेष समय देने और उनके साथ उनके बचपन को जीने की कोशिशों में लगे हैं। जो कई मायने में पिता के कोमल स्वभाव को सामने लाने मे कामयाब होता दिखाई दे रहा है। लेकिन उसमें पिता का वो पारंपरिक रूप अब भी समाहित है।
आज की पीढ़ी का पिता अपनी परंपराओं को सहेजे मनोवैज्ञानिक तौर-तरीकों से लैस बच्चों की परवरिश में अहम किरदार है। जिसके चिंतन के केन्द्र में अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य है। जो आज भी यही सोचता है, कि उसके बच्चें बडे़ होकर उससे भी आगे तरक्की करें।
वैश्विक समाज ने पिता के प्रति शुक्र गुजार होने के लिए जून का तीसरा रविवार तय किया है, जिसमें विश्व के ज्यादातार लोग अपने पिता के लिए, उनके किए गए त्याग के प्रति आभार व्यक्त कर सकें।
लेकिन हम अपने माता-पिता का कितना भी आभार व्यक्त कर लें उनके हमारे द्वारा किए गए तप और मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का ऋण नहीं चुका सकते।
उनका कठिन परिस्थितियों में भी हार ना मानना, मुश्किलों की आहट सुनकर भी यह कहना कि 'परेशान ना होना मैं तुम्हारे साथ हूं......हर मुश्किल जंग को फतह कराने वाला साबित होता है।
कई बार हमें यह आभास भी नहीं होता कि हमारी सुविधाओं के लिए कहां? कैसे? किन परिस्थितियों से वे जूझे होंगे। आसान नहीं होता सारी व्यवस्थाओं को इतनी सहजता से सहन करना और यह जाहिर करना वो अब भी उतने ही हिटलर हैं।
नरम नहीं क्योंकि उनके मन का भय उन्हें नरम पड़ने नहीं देता। कहीं उनकी नरमी उनके बच्चों को दुनिया की तपिश सहने की क्षमता ना कम कर दे।
निसंदेह अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए न्यौछावर कर देने वाले पिता के लिए, एक दिन काफी नहीं पिता दिवस मनाने के लिए हमें हर रोज अपनी प्राचीन परंपराओं के जरिए अपने पिता का आभार व्यक्त करना होगा। तब भी शायद हम अपने पिता के प्रति हमारे फर्ज को पूरा न कर पाए।
अक्सर कहा जाता है कि हर सफल पुरूष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, लेकिन मेरा यह मानना है, कि हर सफल महिला के पीछे एक पुरूष का हाथ होता है और वो हाथ ज्यादातर मामलों पर उसके पिता का ही होता है।
हालांकि कुछ अपवाद तो जीवन में होते ही हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में एक बेटी को आगे ले जाने में उसके पिता का अहम रोल होता है, वो सपने जो वह बचपन से पालती है कहीं न कहीं अपने पिता की आंखों में ही रचते-बसते देखती हुई बड़ी होती है।
आज भारतीय समाज की महिलाएंं दुनिया में अपना दबदबा बना पाने में सक्षम है, उसका पूरा श्रेय उनके माता-पिता को ही जाता है। इसलिए हमें अपने माता-पिता को समय-समय पर एक प्यार की झप्पी तो देनी ही चाहिए। फिर जाहे वह फादर्स डे के तौर पर क्यों न हो! क्योंकि पिता भगवान का ही दूसरा रूप हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।