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Father's Day 2024: मां घर का आंगन हैं तो पिता घर की छत..!

Fri, 14 Jun 2024 02:25 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Fri, 14 Jun 2024 02:25 PM IST
सार

कहते हैं मां घर का आंगन तो पिता घर की छत हैं। लेकिन मुझे लगता है वो छत से कहीं आगे पूरे आकाश में फैली ओजोन परत सी रक्षक भूमिका में होते हैं, जिसके संघर्ष हमेशा हमने कम करके आंके और वो हमें हर आग से झुलसने से बचाते रहे। शायद इसीलिए खुदा ने मां के कदमों में जन्नत रख दी और जन्नत का दरवाजा पिता को बना दिया।

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Father's Day 2024 Inspiring story know The Importance of Father in life
यदि पुरुष की कामयाबी के पीछे महिला का हाथ है तो महिलाओं की कामयाबी के पीछे किसी न किसी पुरुष की थपक - फोटो : freepik
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विस्तार

Father's Day 2024: नब्बे के दशक में आई फिल्म 'कयामत से कयामत' तक में मन को छू लेने वाला बहुचर्चित सोंग ’पापा कहते है बड़ा नाम करेगा....’लाखों लोगों के जुबां पर बालकों को बड़े काम करने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ भारतीय विज्ञापनों मे छाया रहा। पुरुषों का भी बढ़ चढ़-कर अपनी कामयाबी के पीछे किसी न किसी महिला का हाथ होने का दावा पेश करना, पुराना और परंपरागत नारा रहा।

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अब कहावतों में बदलाव का दौर है। अभी हाल में बोर्ड कक्षा, 10 वीं 12 वीं के परिणामों से लेकर देश की प्रतिष्ठित परीक्षा सिविल सेवा तक मे परचम लहराने वाली बेटियों को उनके पिता गर्व से कहते हैं "बेटी हमारा बड़ा नाम करेगी......" यदि पुरुष की कामयाबी के पीछे महिला का हाथ है तो महिलाओं की कामयाबी के पीछे किसी न किसी पुरुष की थपकी, सराहना, विश्वास जरूर शामिल होता है और ज्यादातर मामलों में बालिकाओं को कामयाबी के राह पर शाबासी देने वाले शब्द  पिता के ही होते हैं। बेटियों के संघर्ष की सीढ़ी पर बिखरे कांटों को चुनने का काम पिता ही कर सकता हैं। 
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कहते हैं मां घर का आंगन तो पिता घर की छत हैं। लेकिन मुझे लगता है वो छत से कहीं आगे पूरे आकाश में फैली ओजोन परत सी रक्षक भूमिका में होते हैं, जिसके संघर्ष हमेशा हमने कम करके आंके और वो हमें हर आग से झुलसने से बचाते रहे। शायद इसीलिए खुदा ने मां के कदमों में जन्नत रख दी और जन्नत का दरवाजा पिता को बना दिया।

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पिता सबकी हिफाजत का जिम्मा उठाते-उठाते खुद की कीमत का अंदाजा लगाना भूल गए। सदियों से उन्हें समाज ने सख्त, खामोश, गुस्सैल मिजाज की छवि दे रखी है। नारियल से सख्त मिजाज वाले पिता भीतर से बेहद ही नरम होते है। उनके इस तुनक मिजाजी शख्सियत को तोड़ने की हिमाकत खुद उन्होंने भी कभी न की शायद इसीलिए पिता का नाम आते ही ज्यादतर घरों में आज भी खामोशी छा जाती है और मां को इसके उलट हम पाते हैं। पिता होना यकीनन आसान नहीं।  

       

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आज के पिता बेटियों के सपनों में जान भरने का काम कर रहे हैं।   - फोटो : freepik

पिता के भूमिका समय, काल, परिस्थिति के अनुसार बदलती रही। पहले जो समाज, परंपराओं और मान्यताओं के बाद व्यक्तिगत जीवन में दखल दे पाता था। अब वह पहले से ज्यादा मजबूत और स्वतंत्र दिखाई देते हैं।

21 वीं सदी में वो बेटियों को पराया धन या बोझ नहीं बल्कि अपना दायां कंधा समझते हैं। अब समाज में बड़े फैसले लेने से पहले वो बेटियों से मशवरा भी लेते हैं और उनके उज्जवल भविष्य को प्राथमिकता भी देते हैं।

अब बेटियों को विदा करते वक्त लोग हफ्तों पहले से घर में गमगीन माहौल नहीं बनाते। अब तो बेटियों को शादी में नाचते गाते रस्मों को निभाने की नसीहत देते है। समय बदल चुका है। दुआओं में बेटियों के लिए अच्छे वर से पहले अच्छे नंबर और अच्छी जॉब की अपील शामिल होने लगी है। 

 

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया में एक पिता का अपनी बेटी को विदा करते हुए कहना था कि ’लोगों को रोता देख मैं रो दिया वरना बेटी को विदा करके बहुत खुश हुआ था मैं’और एक पिता का ढोल नगाड़े के साथ खुशी-खुशी अपनी बेटी का तलाक लेना, काफी वायरल हुआ था यह आधुनिक पिता के क्रान्तिकारी विचारों का उदाहरण है। अब समाज बदल गया है। लोग अपनी सोच का दायरा विस्तृत करने लगे हैं। आज के पिता बेटियों के सपनों में जान भरने का काम कर रहे हैं।  

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आज बेटियों का समाज के हर पायदान में विश्वास के साथ खरा उतरना उनके पिता के विश्वास का ही परिणाम है - फोटो : freepik

अभी हाल ही में आये यू.पी.बोर्ड और सी.बी.एस.ई. के परीक्षा परिणामों को देखें तो बेटियों ने लगातार अपना दबदबा कायम रखा है। उनकी कामयाबी के पीछे उनके पिता का कठिन संघर्ष झलकता है। ज्यादातर बेटियों ने अपनी कामयाबी का ताज अपने पापा को ही पहनाया। निःसंदेह उनकी कामयाबी उनके पिता के लंबे संघर्ष का ही परिणाम है जो आज लगातार तमाम रिकॉर्ड बेटियां अपने नाम किये जा रही हैं।

चन्द नामों की फेहरिस्त पर नजर डाले तो उत्तर प्रदेश की बेटी खुशी माहेश्वरी ने यूपी बोर्ड( हाई स्कूल की परीक्षा ) में जिले में 94.17 अंक लाकर अपने जिले में छठवां स्थान प्राप्त किया। उसका कहना था की यह मुकाम उसने अपने पिता नारायण बाबू माहेश्वरी के आशीर्वाद से प्राप्त किया है। वहीं हाथरस की बेटी समीक्षा शर्मा ने 94.17 प्रतिशत अंक प्राप्त किये। कौशांबी की बेटी प्रियांशी मौर्या ने हाई स्कूल में जिले में टॉप करने के साथ प्रदेश में आठवां स्थान प्राप्त किया है।

सिरसागंज के गांव रामकुआं के एक किसान सुबोध कुमार यादव की बेटी रौनक यादव ने इंटरमीडिएट में 500 में से 483 अंक प्राप्त कर अपने परिवार का गौरव बढ़ाया। फर्रुखाबाद की  बेटी ऋद्धि गुप्ता ने 94.50 प्रतिशत अंक प्राप्त किये।

माही सिंह और सिद्धी ने बराबर-बराबर 94.17 प्रतिशत अंक हासिल किए। शामली से आकांक्षा जिला टॉपर बनी तो उत्तराखंड के देहरादून की रहने वाली रिदा खान ने अपने मां-बाप के साथ-साथ अपने पूरे खानदान को नाज करने की वजह दी है। रिदा खान ने सीबीएसई बोर्ड में 99.4 परसेंट मार्क प्राप्त कर टॉप पोजीशन हासिल की है।

लखनऊ की बेटी आरती यादव ने सी.बी.एस.ई. बोर्ड की परीक्षा में 98.6 प्रतिशत अंक लाकर न केवल अपने परिवार का नाम रोशन किया बल्कि समाज के कमजोर तबके के बच्चों के लिए आदर्श बनकर दिखाया। उनके पिता  लालू यादव बाटी-चोखा की दुकान चलाकर अपनी बेटी के सपनों में जान भरने का काम कर रहे हैं।
 

यकीनन नंबरों की यह गणित देखने और सुनने में बेहद सरल लग रही होगी लेकिन बेटियों की यह राह आसान नहीं है। आधी आबादी का हिस्सा होने के नाते बेटियों की पढ़ाई की जंग को मैं बहुत नजदीक से देखती हूं।

मेरे लिए मेरे पिता अंधेरे में जलते चिराग की मानिंद हैं जो हमेशा डर पर फतह हासिल करने की सीख देते रहे। उनका सबके सामने कहना  कि देखना मेरी बेटी एक दिन मेरा नाम रोशन करेगी। बड़े ही गर्व की अनुभूति कराता था।

पापा का यह विश्वास आज भी मुझे चुनौतियों का सामना करने में हौसला देता है। आज बेटियों का समाज के हर पायदान में विश्वास के साथ खरा उतरना उनके पिता के विश्वास का ही परिणाम है। अब समय बदल चुका है अब पापा कहते हैं "बेटी हमारा बड़ा नाम करेगी।"


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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