हिंदू विरोधी नहीं है फैज की नज्म 'हम देखेंगे'
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‘फ़ैज़’ की नज़्म ‘ हम देखेंगे ’ इन दिनों काफ़ी चर्चा में है और वजह है आई.आई. टी. कानपुर में गठित एक जांच समिति जो ये बताएगी कि कहीं ये नज़्म ‘हिन्दू विरोधी’ तो नहीं! उर्दू साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मैं एक बात ज़रूर कहना चाहूंगा कि उर्दू की नुमायां शायरी ‘हिदू विरोधी’ तो क़तई नहीं है, हां कथित तौर पर ‘मुस्लिम विरोधी’ अवश्य रही है। मिसाल के तौर पर ‘फ़ैज़’ ही का एक शेर है:
“ शेख़ साहब से रस्म व राह न की, शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की ”
या फिर:
“ कुछ तो ‘मोहतसिब’ के पैमाने में, कुछ वाइज़ के घर जाती है, हम बादकशों के हिस्से की, अब जाम में कम तर जाती है ”
फ़ैज़ का यह इंकलाबी शेर पढ़िए और फिर इसकी पृष्ठभूमि बताता हूं:
“न सवाल-ए वस्ल, न अर्ज़-ए ग़म, न हिकायतें न शिकायतें,
तेरे अहद में दिल-ए ज़ार के सभी इख़तियार चले गए ”
एक साक्षात्कार में ‘फ़ैज़’ से पूछा गया कि यह शेर क्या आपने वर्तमान हुकूमत के ख़िलाफ़ लिखा है तो उन्होंने उत्तर दिया कि भाई मैंने अपनी बेगम (पत्नि) के लिए यह शेर कहा है I शादी के बाद जब से उनकी हुकूमत क़ायम हुई है, इस बेचारे दिल के सारे अधिकार ख़त्म हो गए हैं I
कुछ बज़ाहिर आपत्तिजनक शेर और देखें :
“ यह ‘जनाब - ए- शेख़’ का फ़लसफ़ा है अजीब सारे जहान से,
जो वहां पियो तो हलाल है, जो यहां पियो तो हराम है ”
अथवा यह व्यंग देखें :
“ लुत्फ़-ए-मै तुझसे क्या कहूं ‘ज़ाहिद’,
हाय कमबख़्त तूने पी ही नहीं ”
‘दाग़’ देहलवी के निम्नलिखित शेर को आप क्या कहेंगे,यहां तो इंतहा ही हो गई :
“दी शब्-ए-वस्ल ‘मुअज़्ज़िन’ ने अज़ां पिछली रात,
हाय कमबख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया”
हम सब के चहेते ग़ालिब क्या कहते हैं, सुनिए :
“हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ,
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है”
या फिर:
“कहां मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहां ‘वाइज़’
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था, के हम निकले”
मुख़्तसर यह कि जो लोग शायरी की रवायत से वाकिफ़ हैं, वह ये जानते हैं कि इसमें किसी भी शब्द के हूबहू वही अर्थ नहीं लिए जाते जो डिक्शनरी में होते हैं I शायरी रूपक, उपमा और प्रतीकों की ज़बान है I शायरी में ‘मयख़ाना , बुतख़ाना ,हरम, वाइज़ , शेख़, मोहतसिब, मुअज़्ज़िन, क़फ़स - यह सारे शब्द प्रतीकात्मक हैं। इनके माध्यम से शायर समाज में फैली अन्य बुराइयों की ओर इशारा करता है । इसलिए शायरी को किसी भी धार्मिक ज़ाविये या ‘हिन्दू / मुसलमान विरोधी’ के रूप में देखना सही नहीं है।
‘मधुशाला’ की मशहूर पंक्तियाँ हैं:
“बैर बढ़ाते मस्जिद-मन्दिर, मेल कराती मधुशाला”
बच्चन जी की इन पंक्तियों को क्या आप किसी विशेष धर्म विरोधी शायरी कहेंगे ?
“कंकर-पत्थर जोरि के मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, का बहरा भया खुदाय”
इस दोहे के कहने के बाद क्या किसी ने कबीर के विरुद्ध कोई फ़तवा जारी किया? जाहिर है कि शायर का इशारा पाखण्ड और आडम्बर की ओर है और लोगों ने इसी रूप में इसे समझा और सराहा भी I एक बात का ख़याल और रखें, जब हम किसी भी रचना को समझने की कोशिश करें तो उसे उस शायर की जिंदगी और उसके विचारों की रौशनी में भी ज़रूर देखें। जहां तक ‘फ़ैज़’ का ताल्लुक है, वह एक कम्युनिस्ट विचारों वाले लगभग नास्तिक शायर थे। इसलिए ‘फ़ैज़’ जैसे बड़े शायर की शायरी को किसी भी धार्मिक नज़रिये से देखना ग़लत होगा।
कुछ और उदाहरणों की मदद से मैं अपनी बात ख़त्म करने की कोशिश करता हूं I 90 के दशक में मशहूर शायर सुहैल अहमद ज़ैदी ने किसी एक पत्रिका के लिए साक्षात्कार के दौरान मुझे अपना एक बहुत ही उम्दा शेर सुनाया था, जो मुझे आज भी स्मरण है:
“सुहैल शाम ढल गयी, दुकान अपनी बढ़ गयी,
ज़रा सी रोशनी है और, हिसाब देखता हूं मैं”
इस शेर में चार मुख्य शब्द हैं ‘शाम, दुकान , रोशनी और हिसाब‘ और यह चारों शब्द अपने असल अर्थों में यहां इस्तेमाल नहीं हुए हैं। शाम ‘उम्र’ के अर्थ में, ‘दुकान’ से तात्पर्य किसी पर्चून की दुकान नहीं है बल्कि ज़िन्दगी ख़त्म होने के समय से है। ‘ज़रा सी रोशनी’ का मतलब है, अब शायर बहुत कमज़ोर हो चुका है और ‘हिसाब’ से ये मुराद नहीं कि वह दुकान का बही खाता देख रहा है, बल्कि वह अपने जीवन के आख़री पलों में सोच रहा है कि उसने सारी ज़िन्दगी किस तरह के काम किए -अच्छे और बुरे।
मशहूर शायर ‘मोमिन’ का शेर है:
“शब जो मस्जिद में जा फंसे मोमिन,
रात काटी ख़ुदा -ख़ुदा कर के “
यहां, अगर हम इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ लें तो धार्मिक नज़रिये से यह बहुत ही आपत्तिजनक शेर हैI पर आज भी ‘मोमिन’ हर दिल अज़ीज़ शायर हैं I यहां ख़ुदा –ख़ुदा’ से उनका तात्पर्य यह नहीं है कि सारी रात उसने पूजा-अर्चना में गुज़ारी, बल्कि ‘ख़ुदा -ख़ुदा करके’ का अर्थ यह है कि रात बड़ी मुश्किल से कटी।
‘मीर’ का एक बड़ा मशहूर शेर है:
“इश्क़, एक मीर भारी पत्थर है
कब ये तुझ नातवान से उठता है”
स्पष्ट है कि शायर इस शेर के माध्यम से कुछ और कहना चाह रहा है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि शायरी में अधिकतर अल्फाज़ अपने शाब्दिक अर्थों में इस्तेमाल नहीं होते और अगर ऐसा होता है तो वह शायरी नहीं बल्कि ‘स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट्स है’, कमाल की शायरी नहीं। उम्मीद करता हूं कि आई.आई.टी. कानपुर में गठित जांच कमेटी किसी धार्मिक द्रष्टिकोण से बालातर, शायरी के फ़न के इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए अपना फ़ैसला सुनाएगी।
(लेखक रियाज़ ख़ान हैदराबाद स्थित एक आई.टी व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में निदेशक हैं )
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।