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’टॉप किया तो बहुत अच्छा, फेल किया तो उससे भी अच्छा’ कैसे .....?

Tue, 04 Jun 2019 08:07 PM IST
Pintu Jha पिंटू झा
पिंटू झा Published by: Pintu Jha Updated Tue, 04 Jun 2019 08:07 PM IST
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Failure Is Not the End it is a opportunity of learning
प्रतिकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

आज हर तरफ परीक्षा परिणामों की बाढ़ है। जहां देखो वहां सिर्फ और सिर्फ परीक्षा परिणामों की बातचीत होती है। अप्रैल की शुरुआत से मई के अंतिम सप्ताह तक 10 वीं से लेकर सिविल सर्विसेज तक की परिणामों की चर्चा जोर पर रहती है। जैसे परिणाम प्रकाशित होती है, सभी की नजर केवल टॉपर पर रहती है। अरे वो 89 फीसदी नंबर लाया है। अरे वो तो 99 फीसदी नंबर लाया है।

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मीडियाकर्मी आते हैं तुरंत इंटरव्यू शुरू और फिर ज्ञान की धारा बहने लगती है। जो भी टॉपर कहेगा उसको सच मानकर समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर हेडलाईन बनाया जाता है। लेकिन जो छात्र, छात्राएं फेल कर जाते हैं उनको सिर्फ ताना मिलता है। और तो और उनके घर में मातम- सा माहौल बन जाता है। फेल परीक्षार्थी करें तो करें भी क्या ? फिर कोई न कोई असफल छात्र समाज के भय से जान देने पर आदी हो जाते हैं। 
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काश । हमारे समाज में टॉप छात्र के बजाए असफल छात्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो हो सकता कि कल वो टॉपर से बेहतर कर सकें । क्योंकि एक कहावत है ‘’टॉपर छात्र सिर्फ कैविन संभाल सकता है लेकिन असफल छात्र सफल होकर कितने टॉपर को कैविन दिला सकता है’’। लेकिन यहां तो सिर्फ उल्टा चलने का रिवाज है। अरे भाई जो आगे बढ़ा वो तो बढ़ा लेकिन जो गिरा क्या उसे गिरे हुए छोड़ देना चाहिए। इस प्रश्न का उत्तर 90 फीसदी लोगों के पास नहीं है, क्योकिं उन्हें अपने अलावा किसी और का नहीं दिखता। 
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Failure Is Not the End it is a opportunity of learning
फाइल फोटो

असफल छात्रों अगर आपसे कोई परीक्षा परिणाम के बारे में पूछे तो सिर्फ इतना ही कहना - फेल हुआ तो हुआ फर्क क्या पड़ता है। लेकिन यार ये कौन – सा कायरतापूर्ण कदम उठाते हो, परीक्षा परिणाम के जारी होते ही समाज और अपनों के भय से जान देने पर तुल जाते हो । तुमसे ऐसा कोई पाप तो किया नहीं जो समझा से भय खाते हो। जब कोई शर्मिंदगी  वाला काम नहीं किया तो फिर क्यों अपनी जिंदगी को दांव पर लगाते हो ?

दर्जनों विद्यार्थी फेल होने पर अपने जीवन लीला को समाप्त कर देते हैं। ऐसे में उनके पीछे उनके माता-पिता और भाई-बहनों को सिर्फ दर्ज मिलता है, इसके सिवा और कुछ नहीं मिलता। दरअसल, हम जिस दौर में रह रहे उस दौर में शिक्षा ने  व्यवसायिक रुप ले लिया है। गुरुकुल के अनुरुप शिक्षा का चलन समाप्त हो चुका है। कई बार तो बच्चों को सही मार्गदर्शन करने वाले शिक्षक तक नहीं मिलते हैं।  दुकानों की तरह गली-गली स्कूल या कोचिंग संस्थान खुल रहे हैं लेकिन एक भी ऐसा संस्थान नहीं जहां पैसों का खेल न हो। ऐसे में  आप समझ सकते हैं कि शिक्षा की स्थिति क्या हो सकती है। ऊपर से अभिभावक भी अपने बच्चों को सुबह से शाम तक एक ही ताना देते हैं- वो है 90 से 99 फिसदी नंबर लाओ। अगर नहीं लाये तो मेरी नाक कट जाएगी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि असफलता ही सफलता की सीढ़ी है। दुनियाभर के प्रसिद्ध लोग शुरुआत में असफल हुए हैं।थॉमस एडीसन को तो स्कूल तक से निकाल दिया था। प्रसिद्ध साहित्यकार रबीन्द्रनाथ टैगोर भी अपने स्कूल के दिनों में फेल हुए थे। लेकिन बाद में उनकी रचनाओं पर पूरे देश ने गर्व किया। टैगोर ने लिखा- “ हर ओक का पेड़,पहले जमीन पर गिरा एक छोटा सा बीज होता है”। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आंईस्टीन के जन्मदिन को ‘जीनियस डे’ के रूप में मनाया जाता है, लेकिन वे बचपन में मंदबुद्धि बालक समझे जाते थे। दरअसल आइंस्टाइन बचपन से डिसलेक्सिया नामक बीमारी से पीड़ित थे। इस बीमारी के कारण उन्हें अक्षरों को ठीक से पहचान पाने में बहुत मुश्किल होती थी, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर थी साथ ही लिखने, पढ़ने व बोलने में भी उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता था। हालत यह थी कि वे 13 साल की उम्र तक अपने जूतों के फीते भी ठीक ढंग से नहीं बांध पाते थे। डॉक्टरों ने उन्हें मानसिक रूप से विकलांग घोषित किया हुआ था। लेकिन उन्हीं आइंस्टीन को 1921 में ‘ला ऑफ फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट’ की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।





  

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