तितलियों का जीवन: रंग, रूप और हमारे छत के बाग
विश्वभर में करीब 19000 प्रजातियों की तितलियां पाई जाती हैं वहीं भारत में प्रजाति विविधता 1500 से अधिक है। विश्व की 8.74 % तितली भारत में देखी जाती हैं।
विस्तार
तितली एक प्रकार की खूबसूरत कीट है, इन्हें वर्गीकरण श्रेणियों में संध आर्थोपोडा के लेपिडोप्टेरा गण में रखा गया है। इसी गण में निशाचर शलभ भी आती है।
विश्वभर में करीब 19000 प्रजातियों की तितलियां पाई जाती हैं वहीं भारत में प्रजाति विविधता 1500 से अधिक है। विश्व की 8.74 % तितली भारत में देखी जाती हैं। तितलियों की संख्या में गिरावट आने का कारण होस्ट पौधें की गिरावट है। इनके रंग-विरंगे पंख इंसान को मंत्रमुग्ध कर लेने और तनाव को हर लेने के लिए काफी हैं।
वर्तमान में तितलियों के छः परिवार ज्ञात हैं जिनके नाम हैं- हैस्पेरिडी, लाइकेनिडी, निम्फालीडी, पपीलिओनिडी, पायरीडी, रियोडीनीडी। इनमें निम्फालीडी तितलियों का सबसे बड़ा परिवार है जिसमें 6000 से अधिक प्रजाति हैं।
एक अध्ययन में परागण करने वाले जीवों में कमी आने के कारण विश्वस्तर पर 4.7 प्रतिशत फलों और 3.2 प्रतिशत सब्जियों के उत्पादन में कमी देखने को मिली है। जलवायु परिवर्तन, आवास क्षति, प्रदूषण, कीटनाशक और खरपतवारनाशी का उपयोग तितलियों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
यह कॉमन ग्रास येलो तितली हमारे घर की तितली है। समझें नहीं? मतलब की यह तितली हमारे छत पर बने छोटे से तितली बाग में पली-बढ़ी है। अब भी कुछ लोग सोचेंगे कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि तितली को किसी बाग में पाला-पोषा जा सकता है।
तितली का जीवन और बागवानी
इस रहस्य को जानने के लिए हमें तितली के जीवन और तितली बागवानी को समझना होगा। तितलियों का जीवन चक्र चार चरणों से होकर गुजरता है जिसमें अंडे से इल्ली निकलते हैं, जो पेटू की तरह पत्तियों को खाते हैं और अपने आकार को बढ़ाते हैं। तितलियां अपने अंडे प्रजाति विशेष मतलब हरेक तितली के प्रजाति का अपना पौधा होता है जिसपर वे अपने अंडे देती हैं और उस अंडे से निकला इल्ली या कैटरपिलर उस पौधे के पत्तियों को चट कर जाता है।
तितलियों के अपने अंडे देने वाले पौधे को होस्ट पौधे कहते हैं। एक तितली के एक से अधिक होस्ट पौधे हो सकते हैं। ऐसा आपने भी देखा होगा खासकर आपके निम्बू के पत्तों पर हरे या काले-पीले रंग के ये नन्हें प्यारे शैतान दिख जाते हैं, जिसे आप कीड़ा समझकर उसे हटा देते हैं या कीटनाशक छिड़क कर मार देते हैं। सोचिए अब तक आपने कितनी तितलियों को मारा होगा? जबकि उसे बचाया जा सकता था और बचाया जाना भी चाहिए, क्योंकि तितलियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
अंडे से इल्ली में रूपांतरित होने के बाद अब बारी आती है कि इल्ली (कैटरपिलर) खाना बंद करे और अपने अंगों का विकास करके खूबसूरत रंग-बिरंगे तितली का रूप ले, इसमें कुछ सप्ताह लगते हैं। इस प्रक्रिया में कैटरपिलर प्यूपा खोल में परिवर्तित हो जाते हैं और व्यस्क तितली के रूप में बाहर आ जाते हैं।
हमारे छत पर कई तितलियों के होस्ट पौधे हैं जिसपर तितलियां अंडे देने आती रहती हैं। हमारे छत एक पारिस्थितिकी तंत्र है यहां तितलियों के अलावा कई तरह के जीव भी हैं जैसे शिकारी मकड़ी, बीटल और टिड्डा आदि जो मिलीबग और तितलियों के अंडों का शिकार कर लेते हैं, बाबजूद जो अंडे बचकर इल्ली का रूप लेते हैं। हम उसे वहां से हटाकर एक डब्बे में रखकर उसका देखभाल और पालन पोषण करते हैं।
डब्बे में वेंटिलेशन, चींटियों से सुरक्षा प्रदान करने के साथ के साथ इल्लियों को उसके होस्ट पौधे के पत्तियों को उपलब्ध कराना होता है जब तक कि वे प्यूपा के रूप में परिवर्तित ना हो जाएं।
एक दो सप्ताह में तितलियां अपने खोल तोड़कर डब्बे में दिख जाती हैं तो उसे छत पर प्राकृतिक आवास में आजाद कर देते हैं। इस कार्य में डब्बे में रोज एक बार जांच-पड़ताल करनी पड़ती है। यह बच्चों के लिए बहुत ही रोमांचक साबित होगा। इसे हम सभी को करना चाहिए। हमें तितलियों को खत्म होने से बचाना होगा क्योंकि यह परागण के द्वारा फूलों से परागण में मदद करती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि और विकास होता है। यह कई तरह के शिकारी जीव जैसे छिपकली, गिरगिट और मेंढक का आहार बन पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखते हैं।
तितली बागवानी बनाने के लिए हमें तितलियों के होस्ट और फूलों वाले पौधे का रोपण करना होगा। हम इसके लिए प्लास्टिक के डब्बों आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं। सितंबर माह में तितलियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से पूरे माह तिलती माह के रूप में मनाया जाता है।
तितलियों का जीवनचक्र चार अवस्थाओं से होकर गुजरता है और कुछ ही हफ्तों में पूरा हो जाता है, पूरी प्रक्रिया को मेटामोरफोसिस कहते हैं। तितलियां गीली मिट्टी या गोबर से आवश्यक पोषक तत्व को ग्रहण करती हैं, इस प्रक्रिया को मड पडलिंग कहते हैं।
भारत की सबसे बड़ी तितली
पपीलिओनिडी तितली सबसे बड़े आकार की होती हैं और इनके डैने से पीछे की ओर दो पूछनुमा संरचना निकली होती है इसलिए इन्हें स्वालोटेल भी कहा जाता है। बर्डविंग तितली भारत की सबसे बड़ी तितली है जो पपीलिओनिडी परिवार से संबंध रखती है। निम्फालीडी तितलियों का सबसे बड़ा परिवार है जिसमे 6000 से अधिक प्रजाति हैं, इनके पिछले पैर पर बाल जैसी संरचना होने के कारण इन्हें ब्रश पैर वाले तितली भी कहा जाता है।
लाइकेनिडी परिवार की तितलियां आकार में छोटी होती हैं और सामान्यतः इनका रंग नीला होता है इस कारण से इन्हें सामान्य भाषा मे ब्लू भी बोलते हैं। पायरीडी के सदस्यों को सामान्यतः व्हाइट एन्ड येलो कहा जाता है, इसका कारण है को इनके सदस्य सफेद या पीले-नारंगी रंग के होते हैं।
हैस्पेरिडी को पूर्व में शलभ माना जाता था लेकिन इनके गुणधर्म तितलियों अधिक मेल खाते हैं जैसे की ये दिनचर होते हैं, आराम करते वक्त इनके डैने खड़े रहते हैं, फूलों से नेक्टर ग्रहण करने हेतु विकसित सूंड़ होते हैं। इन्हें सामान्यतः स्किपर कहा जाता है। रियोडीनीडी परिवार में जुड़ी शामिल हैं, इस परिवार में भारत में 16 प्रजाति पाए जाते हैं।
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