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Uttarakhand Forest Fire: धधक रहे हैं धरती के फेफड़े, हो रहा पर्यावरण का विनाश

Wed, 01 May 2024 01:52 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 01 May 2024 01:52 PM IST
सार

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश का 36 प्रतिशत वनक्षेत्र अक्सर वनाग्नि से धधकता रहता है और इसमें से भी 4 प्रतिशत क्षेत्र वनाग्नि की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। जबकि 6 प्रतिशत वनावरण अत्यधिक अग्नि प्रवण पाया गया है।

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डीडीहाट में जंगलों में आग लगने के बाद  इस तरह पूरे क्षेत्र में धुआं फैल गया।

विस्तार

धरती पर जीवन जीने के लिए अति आवश्यक ऑक्सीजन के उत्पादन में एल्गी या शेवाल के बाद वनों की महती भूमिका को देखते हुए वनों को धरती के फेफड़ों की संज्ञा भी दी जाती है। लेकिन जब फेफड़े ही जल रहे हों तो फिर स्थिति की गंभीरता को आंका जा सकता है। अगर आप भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के वनाग्नि डेशबोर्ड पर 24 अप्रैल की सुबह की ताजा स्थिति पर नजर डालें, तो आपको देशभर में पृथ्वी के दहकते फेफड़ों में मची तबाही का मंजर साफ नजर आएगा।

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देश के 13 राज्यों में भड़क रही जंगल की आग

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग उपग्रह से प्राप्त वनाग्नि के दृश्यों के विष्लेशित आकड़ों की पल-पल की जानकारी राज्यों के वन विभागों को देता है, जिससे की वनाग्नि को बुझाने के लिए तत्काल कार्यवाही कर सकें। विभाग के डैशबोर्ड पर 24 अप्रैल की प्रातः उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश के 13 राज्यों में 62 वन क्षेत्रों में भीषण आग लगी हुई थी, जिनमें हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में सर्वाधिक 30 स्थानों पर जंगल भयंकर रूप से धू-धू कर जल रहे थे। हिमालय पर लपटें कितनी खतरनाक हैं, उसे बढ़ती दैवी आपदाओं से साफ महसूस किया जा सकता है।

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डैशबोर्ड में दूसरे नम्बर पर 8 घटनाओं के साथ आन्ध्र प्रदेश, 6 के साथ बिहार और 3 अग्निकांडों के साथ झारखण्ड को दर्शाया गया था। बाकी राज्यों में एक या दो घटनाऐं दर्शायी गयीं थी। यही नहीं डैशबोर्ड में 17 अप्रैल से 22 अप्रैल तक के सप्ताह में हुए भीषण अग्निकाण्डों में उड़ीसा को पहले और उत्तराखण्ड को दूसरे स्थान पर दर्शाया गया था। उसके बाद वन बाहुल्य छत्तीसगढ़, और झारखण्ड की स्थिति बताई गई है।

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उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने पर्यावरण को और खतरे में डाला है। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

वन्यजीव संसार हो रहा है खाक

सरकारी विवरणों को अगर देखें तो वनाग्नि के नुकसान में केवल पेड़ों की गिनती करने के साथ ही आर्थिक नुकसान का आंकलन कर दिया जाता है, जबकि वन पेड़ पौधों और जीवों की प्रजातियों की एक विशाल श्रृंखला के प्राकृतिक घर हैं, जिनमें से कई प्रजातियां अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती हैं। जंगल में बड़े पेडों के अलावा छोटी नाजुक वनस्पतियां, लाइकेन्स के साथ ही जीवों की हिरन, लोमड़ी, गुलदार जैसे स्तनपायी जीव प्रायः भागकर जान बचाने में कामयाब हो सकते हैं। लेकिन पक्षी, तितलियां, मक्खियां, मकड़े, कीड़े-मकोड़े, मेंढक, दीमक, रेंगने वाले सांप, छिपकलियां और केंचुए जैसे अनगिनत जीव प्रजातियां खाक हो जाती हैं।

आप कह सकते हैं कि वनाग्नि से भरा पूरा वन्यजीव संसार खाक हो जाता है। जबकि चींटी और दीमक से लेकर बड़े स्तनपाई जीवों तक हर एक को प्रकृति ने कुछ न कुछ दायित्व सौपा हुआ है। उदाहरण के लिए अगर वनों में दीमक न होंगे तो मिट्टी में उपजे बड़े पेड़ फिर मिट्टी में कैसे मिल पाएंगे।

पर्यावरण का हो रहा विनाश

वनों को पृथ्वी के फेफड़े इसलिए माना जाता है, क्योंकि मानव फेफड़े की तरह वन ऑक्सीजन का उत्पादन करने और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम सांस में ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। हमारी त्यागी गई कार्बनडाइआक्साइड वृक्षों के काम आती है और पादपों द्वारा छोड़ी गई ऑक्सीजन हमारे काम आ जाती है। वन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे वे पृथ्वी के वायुमंडल में गैसों के संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
 

जंगल की आग से उत्पन्न धुआं और राख हवा की गुणवत्ता को खराब करता है, जिससे आस-पास के समुदायों में रहने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकता है। जंगल की आग बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों को वायुमंडल में छोड़ती है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करती है और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती है। इस धुंवे में ब्लैक कार्बन होता है जो कि ग्लोबल और लोकल वार्मिंग का बढ़ाता है और इसका ऐरासोल वृद्धि के साथ ही अतिवृष्टि में भी सीधा योगदान होता है।


देश का 36 प्रतिशत वनक्षेत्र अक्सर वनाग्नि संवेदनशील

जंगल की आग एक वैश्विक समस्या है। ऑस्ट्रेलिया, अमेजॉन, कनाडा के लम्बे समय तक दहकने वाले अग्निकांड इतिहास में दर्ज हैं। चूंकि अब धीरे-धीरे धरती का वनावरण सिमट रहा है इसलिए बचे-खुचे जंगलों की आग और अधिक विनाशकारी साबित हो रही है।
 

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश का 36 प्रतिशत वनक्षेत्र अक्सर वनाग्नि से धधकता रहता है और इसमें से भी 4 प्रतिशत क्षेत्र वनाग्नि की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। जबकि 6 प्रतिशत वनावरण अत्यधिक अग्नि प्रवण पाया गया है।


फॉरेस्ट इन्वेटरी रिकॉर्ड के अनुसार भारत में 54.40 प्रतिशत वन कभी-कभी आग की चपेट में आते हैं। 7.49 प्रतिशत मामूली रूप से बार-बार जलते हैं, जबकि 2.40 प्रतिशत वन अक्सर जलते रहते हैं। देश का 35.71 प्रतिशत वन क्षेत्र कभी भी आग की चपेट में नहीं आया।

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उत्तराखण्ड सरकार ने वनों में भड़की आग पर काबू पाने के लिये वायुसेना के हेलीकाप्टर मोर्चे पर उतार दिए हैं। - फोटो : istock

वनाग्नि को सेना के हवाले करना प्रशासन की विफलता

उत्तराखण्ड सरकार ने वनों में भड़की आग पर काबू पाने के लिए वायुसेना के हेलीकाप्टर मोर्चे पर उतार दिए हैं। वनकर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी हैं। इस पर सेवा निवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भण्डारी इसे सेना का दुरुपयोग बताते हैं और कहते हैं कि सेना का उपयोग केवल बेहद गंभीर स्थितियों में तब किया जाता है जब सिविल एडमिनिस्ट्रेशन असफल हो जाता है और स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर हो जाती है।

इससे लगता है कि उत्तराखण्ड का शासन प्रशासन जंगल की आग से निपटने में विफल हो चुका है और स्थिति उसके काबू से बाहर हो चुकी है। जबकि राज्य में वन नौकरशाही का आकार बहुत बड़ा है। जनरल भंडारी के अनुसार अगर सरकार स्थानीय निवासियों पर जंगल को बचाने की जिम्मेदारी सौंपे तो वे बेहतर नतीजे दे सकते हैं। वनों को बचाना स्थानीय निवासियों की आय से भी जोड़ा जाना चाहिए। जनरल के अनुसार इसी तरह हेमकुण्ड साहब की यात्रा के मार्ग से बर्फ हटाने का काम भी सेना को दे रखा है। यह काम स्थानीय निवासियों से कराया जाता तो स्थानीय आर्थिकी में सुधार होता।

वनाग्नि रोकने के प्रयास अधूरे

ऐसा नहीं कि सरकारों ने वनों को आग के रहमोकरम पर छोड़ दिया हो। वनों के महत्व को देखते हुए ही संसद ने संविधान संशोधन के जरिये वनों को 1976 में राज्य सूची से निकाल कर समवर्ती सूची में शामिल कर दिया था ताकि वनों को बचाने में केन्द्र सरकार की सीधी दखल रहे। वनो में आग का पता लगाने और त्वरित प्रतिक्रिया की सुविधा के लिए अग्नि टावरों, उपग्रह निगरानी, ड्रोन और रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकियों जैसी आधुनिक व्यवस्थाऐं केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा की गई है। 

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग उपग्रह द्वारा निरन्तर अग्निकांड़ों पर नजर जमाए हुए है। हर साल अग्नि सुरक्षा पर अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं। लेकिन जंगल फिर भी धधक रहे है। इसका मतलब साफ है कि, इस दिशा में कमियां मौजूद हैं जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है। वन सीधे तौर पर स्थानीय समुदाय के जनजीवन से जुड़े होते हैं और बिना उनके वनों की सुरक्षा मुमकिन नहीं है। लेकिन वन नौकरशाही का रवैया स्थानीय समुदाय के प्रति सहयोगात्मक नहीं रहता।

कभी लोग अपने जंगलों को स्वयं ही आग से बचाते थे लेकिन जब से जंगल सरकारी हो गये तब से कुछ लोगों द्वारा ही जंगलों में आग लगाने की घटनाएं प्रकाश में आ रही हैं। इसलिये जंगलों के प्रति लोगों के साथ ही वन नौकरशाही को भी जागृत किये जाने की आवश्यकता है।

अक्सर वन विभागों को बजटीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक जागरूकता अभियान, प्रारंभिक पहचान प्रणाली, अग्निशमन उपकरण और कर्मियों के प्रशिक्षण जैसी आग रोकथाम गतिविधियों के लिए सीमित संसाधन होते हैं। इसलिए वन विभागों को बजट की शिकायत का मौका नहीं दिया जाना चाहिए।

ऐसे भी मामले सामने आए हैं कि वनीकरण के फर्जी आकड़ों की सच्चाई छिपाने के लिये भी जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसलिए उस भ्रष्टाचार पर भी अंकुश की जरूरत है। वन प्रबंधन और आग की रोकथाम से संबंधित कानूनों और विनियमों को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता भी अनुभव की जाती रही है। भारत में जंगल की आग पर अधिक व्यापक अनुसंधान और डेटा संग्रह की आवश्यकता भी है।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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