फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   environmental crisis in himalayan range and char dham yatra and vehicles

पर्यावरण संकट और पहाड़: आखिर कितना खतरनाक है हिमालय पर लाखों वाहनों का चढ़ना?

Sat, 16 Nov 2024 07:14 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sat, 16 Nov 2024 07:14 PM IST
विज्ञापन
environmental crisis in himalayan range and char dham yatra and vehicles
पर्यावरण संकट और पहाड़ - फोटो : Adobe Stock

हिमालय के चार धामों में से केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत तीन धामों की इस साल की यात्रा का समापन हो गया और अब शेष बदरीनाथ के कपाट आगामी 17 नवंबर को बंद होने हैं। तीन धामों के यात्रावसान तक देशभर के 46,34,448 श्रद्धालु यात्रा कर लौट चुके थे। बहुत ही संवेदनशील हिमालय के पर्यावरण पर यात्रियों की इस बाढ़ का असर तो पड़ ही रहा है, लेकिन उससे अधिक गंभीर विषय हिमालय पर और खास कर गंगा के श्रोत गंगोत्री और सतोपन्थ जैसे तेजी से पीछे खिसक रहे ग्लेशियरों पर वाहनों की अत्यधिक भीड़ का है।

विज्ञापन


यह भीड़ सीधे वैश्विक और स्थानीय तापमान को बढ़ा रही है जिसका दुष्परिणाम जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम के कारण उत्पन्न दैवी आपदाओं के रूप में रूप में सामने नजर आ रहे हैं। चूंकि हिमालय ऐशिया का जलस्तंभ होने के साथ ही मौसम का नियंत्रक भी है और यह ऐशिया के पांच देशों से जुड़ा हुआ है। इसलिये हिमालय की चिन्ता केवल उत्तराखण्ड तक ही सीमित नहीं है। इसलिये हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यात्री वाहनों की संख्या बढ़ाने के बजाय उस पर सख्त नियमन की आवश्यकता है।
विज्ञापन


पांच लाख से अधिक वाहन चढ़ गये हिमालय पर

उत्तराखण्ड हिमालय की तीन धामों की सालाना यात्रा समाप्ति के दिन तक चारों धामों में से दो तक सीधे और दो धामों के बहुत निकट तक 5,21,915 वाहन यात्रियों को लेकर पहुंच चुके थे। इनमें से भी सीधे बदरीनाथ और गंगोत्री पहुंचने वाले वाहनों से उत्सर्जित प्रदूषकों का सीधा असर सतोपन्थ और गंगोत्री ग्लेशियर समूहों पर पड़ना स्वाभाविक ही है। केदारनाथ पहुंचने वाले यात्रियों की संख्या तो हर साल कीर्तिमान बना ही रही थी, लेकिन इस बार केदार घाटी पहुंचने वाले यात्री वाहनों ने भी रिकार्ड तोड़ दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल केदारनाथ यात्रा पर जाने वाले वाहनों की संख्या 1,87,590 तक पहुंच गयी जबकि पिछले यह संख्या केवल 88,236 थी। इसरो की रिपोर्ट के अनुसार, यह घाटी भूस्खलन की दृष्टि से देश में सर्वाधिक संवेदनशील है और मुख्य केंद्रीय भ्रंश
विज्ञापन
विज्ञापन

के निकट होने के कारण यह भूकम्प के मुहाने पर भी बैठी है। इसलिये इस क्षेत्र में क्षमता से अधिक मानव दबाव को बहुत जोखिमपूर्ण माना गया है।

हिमालय पर दबाव का दिखने लगा है असर

सन् 1968 में जब पहली बार बद्रीनाथ बस पहुंची थी तो वहां तब तक लगभग 60 हजार यात्री पहुंचते थे। लेकिन यह संख्या अब 13 लाख सालाना पार कर गयी है। इन यात्रियों के साथ मात्र 6 माह में लगभग 1.50 लाख वाहन बद्रीनाथ पहुंच रहे हैं। गंगोत्री में इस बार 8,15,273 यात्री और 88,236 वाहन 3 नवम्बर तक पहुंच चुके थे। पहले ज्यादातर यात्री बसों में सफर करते थे और औसतन एक बस 30 यात्रियों को ढो लेती थी। लेकिन अब अधिकतम 5 लोग लोग कारें लेकर यात्रा कर रहे हैं जिस कारण वाहनों का भारी दबाव हिमालय पर बढ़ता जा रहा है। जिसका विपरीत असर हिमालय के पारितंत्र पर पड़ने के साथ ही अतिवृष्टि, बादल फटने, त्वरित बाढ़ और आसमानी बिजली गिरने जैसी आपदाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही उनकी आवृति भी बढ़ रही है।

पहाड़ों पर चार गुना अधिक प्रदूषण करते हैं वाहन

विशेषज्ञों की माने तो मैदानी क्षेत्र की तुलना में पहाड़ों पर वाहनों का प्रदूषण चार गुना अधिक होता है। मैदानों में सामान्यतः वाहन तीसरे और चौथे गेयर में औसतन 60 किमी की गति से चलते हैं। जबकि पहाड़ों की चढ़ाइयों पर वाहन पहले और दूसरे गेयर में औसतन 20 किमी की गति से चलते हैं। वाहन पहाड़ों पर कितनी चढ़ाई चढ़ते हैं इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि चारधाम यात्रा समुद्रतल से 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थिति ऋषिकेश से शुरू होकर समुद्र तल से 3042 मीटर की उंचाई पर स्थित गंगोत्री और 3133 मीटर की उंचाई पर स्थित बद्रीनाथ पहुंचते हैं। वाहनों की अत्यधिक भीड़ का सीधा असर गंगोत्री और सतोपन्थ ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। इस तरह हिमालय पर वाहनों की भीड़ से लोकल और ग्लोबल वार्मिंग का तेज होना स्वाभाविक ही है। 

कई हानिकारक गैसें उत्सर्जित करते हैं वाहन

वाहनों से उत्सर्जित वायु प्रदूषण गैसों और कणों का मिश्रण होता है। साइंस जनरल के फरवरी अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, गैसों में नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और ओजोन शामिल हैं। पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में कार्बनिक और मौलिक कार्बन, सीसा जैसे धातु और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन शामिल होते हैं। डीजर्ल इंधन से चलने वाले वाहन सर्वाधिक ब्लैक कार्बन उत्सर्जित करते हैं। ब्लैक कार्बन एक प्रकार का कण पदार्थ (पीएम) है जो जीवाश्म ईंधन, बायोमास और अन्य कार्बनिक पदार्थों के अधूरे दहन से उत्पन्न होता है। यह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर और वातावरण को गर्म करता है और जलवायु को भी प्रभावित करता है। साथ ही यह बर्फ की सतह पर जमा होने पर बर्फ के पिघलने की गति भी बढ़ाता है। वाहनों से सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है जो कि जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्पन्न एक ग्रीनहाउस गैस है। यह जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाली प्राथमिक गैस है। 


जलवायु परिवर्तन बढ़ाने में भी योगदान है वाहनों का

कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन ग्रीनहाउस गैसें हैं जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैस एरोसोल के निर्माण और व्यवहार को प्रभावित करती है जिसके गर्म और ठंडे दोनों चरम प्रभाव हो सकते हैं। इसी तरह मीथेन वायुमंडल में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से एरोसोल के निर्माण को जन्म देती है। एरोसोल बादल निर्माण और गुणों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पृथ्वी का विकिरण संतुलन प्रभावित होता है और चरम मौसम की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे दैवी आपदाओं का खतरा बना रहता है। इसलिए एरोसोल सांद्रता में परिवर्तन जलवायु प्रतिक्रिया तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों की भूमिका और जटिल हो जाती है। अब कल्पना की जा सकती है कि वाहनों का रेला किस तरह हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है। यद्यपि अब वाहनों के सख्त नियमन से पार्टिकुलेट मैटर और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण सुधार अधूरे साबित हो रहे हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed