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इंसेफेलाइटिस: ये है अस्पतालों की हकीकत, फेल हो रहा है नीतीश का सुशासन?

Mon, 17 Jun 2019 05:51 PM IST
Nawal Kishor Kumar नवल किशोर कुमार
Updated Mon, 17 Jun 2019 05:51 PM IST
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encephalitis death in bihar muzaffarpur hospitals nitish kumar
बिहार में इंसेफलाइटिस से मरने वाले बच्चों की संख्या सौ होने जा रही है। - फोटो : PTI

बिहार में इंसेफलाइटिस से मरने वाले बच्चों की संख्या सौ होने जा रही है। मुजफ्फरपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शैलेश प्रसाद के मुताबिक 17 जून 2019 को सुबह नौ बजे तक 97 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस इंसेफलाइटिस जिसे बिहार सरकार कभी चिमकी (प्लास्टिक) रोग कहती है तो कभी दिमागी बुखार या फिर इसे जापानी इंसेफलाइटिस की संज्ञा देती है, इसके उन पहलुओं पर गौर करें जो अभी तक राज्य सरकार और उसके तंत्र द्वारा छिपाकर रखे गए हैं।

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तो क्या नहीं है इलाज की व्यवस्था?  
सबसे पहली जानकारी तो यह कि केवल दो अस्पतालों में इंसेफलाइटिस से पीड़ित बच्चों के इलाज की व्यवस्था है। इनमें से एक श्रीकृष्ण मेमोरियल अस्पताल कॉलेज है जो कि सरकारी है और उत्तर बिहार के लिए सबसे बड़ा अस्पताल है। दूसरा अस्पताल केजरीवाल अस्पताल प्राइवेट है।
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इन दोनों अस्पतालों में इंसेफलाइटिस से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए सीटों की संख्या के बारे में पूछने पर मुजफ्फरपुर के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी का आंकड़ा आपको यह सोचने पर मजबूर कर देगा कि बिहार में कोई सरकार है भी या नहीं। इनके मुताबिक एसकेएमसीएच में 50 और केजरीवाल अस्पताल में केवल 27 बेड उपलब्ध हैं। इस प्रकार केवल 77 बच्चों के इलाज की व्यवस्था सरकार द्वारा अभी तक की गई है। 
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सनद रहे कि इसमें बच्चों को बचाने के लिए इलाज की व्यवस्था और उससे जुड़े मसले शामिल नहीं हैं। यह तो केवल बेडों की संख्या है। यानी अभी जबकि तीन सौ से अधिक बच्चे इलाजरत् हैं और इनमें से करीब सवा दो सौ बच्चों का इलाज या तो जमीन पर लेटाकर किया जा रहा है या नहीं किया जा रहा है।
 

encephalitis death in bihar muzaffarpur hospitals nitish kumar
नीतीश कुमार क्या स्थिति को संभाल नहीं पाए? - फोटो : ANI

लीची के इलाकों में ही क्यों होता है इंसेफलाइटिस का आतंक?
इस सवाल के अनेकानेक जवाब हैं। कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। कल यानी 16 जून 2019 को जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन मुजफ्फरपुर गए थे तब उन्होंने एक बार फिर जांच प्रयोगशाला स्थापित करने की बात कही। उनके मुताबिक मुजफ्फरपुर सहित चार अन्य पड़ोसी जिलों में ये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। पाठक यह भी जान लें कि 2014 में भी हर्षवर्द्धन इंसेफलाइटिस से पीड़ित बच्चों को देखने आए थे। उस वर्ष बिहार में 265 बच्चों की जान कथित तौर पर इंसेफलाइटिस ने ली। कथित रूप से इसलिए कि सरकार की ओर से आजतक यह नहीं बताया गया है कि बच्चों की मौत किस कारण से हो रही है। 

एक दिलचस्प बयान सुनिए 
मुजफ्फरपुर के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शैलेश प्रसाद के मुताबिक, लीची से इस बीमारी का कोई लेना-देना नहीं है। वे बताते हैं कि मुजफ्फरपुर में सरकार द्वारा बच्चों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए तमाम तरह के उपाय किए जाते हैं। इनमें उन्हें आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन आदि की गोलियां समय-समय पर दी जाती हैं। यानी मुजफ्फरपुर में कुपोषण समस्या नहीं है। फिर बच्चे इंसेफलाइटिस के कारण क्यों मर जाते हैं? यह पूछने पर उनका जवाब है कि लीची के दिनों में बच्चे दोपहर में लीची के बगानों में घूमते रहते हैं और इस कारण वे शिकार हो जाते हैं।

बहरहाल, जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री  मंगल पांडे ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि वे नेता हैं, डॉक्टर नहीं, फिर एक नौकरशाह चिकित्सक से एक गंभीर जवाब की उम्मीद बेमानी है। हद तो यह है कि 2005 से लेकर अबतक इंसेफलाइटिस के कारण 2749 बच्चों की मौत हुई है और एक बार भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर नहीं गए हैं। जाहिर तौर पर बच्चों की मौत सुशासन पर बट्टा लगाती है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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