फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   encephalitis bihar muzaffarpur litchi fruit exports china lobby politics

इंसेफेलाइटिस पर क्यों बदनाम हो रही है लीची? किसकी है लीची के व्यापार पर नजर?

Tue, 18 Jun 2019 05:25 PM IST
Gautam Chaudhary गौतम चौधरी
Updated Tue, 18 Jun 2019 05:25 PM IST
विज्ञापन
encephalitis bihar muzaffarpur litchi fruit exports china lobby politics
बिहार में इंसेफलाइटिस क्यों कंट्रोल में नहीं आ रहा? - फोटो : अमर उजाला

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (इंसेफलाइटिस) से 100 से अधिक बच्चों की मौत हो गई है। बिहार के व्यापार और कृषि उत्पाद को बदनाम करने वाली लाॅबी इस बीमारी को लीची से जोड़ने की कोशिश कर रही है। हालांकि इस बीमारी के लिए लीची कहीं से दोषी नहीं है लेकिन चूंकि लीची के उत्पादन से बिहार के किसान और उस व्यापार में लगे लोग लाभान्वित हो रहे हैं इसलिए गुजराती आम, कश्मीर व हिमाचल प्रदेश के सेब, केरल एवं अन्य तटीय क्षेत्र के नारियल आदि की लाॅबी इस फल व उसके उत्पादन क्षेत्र को बदनाम करने के लिए विगत् कई वर्षों से लगातार प्रयास कर रहे हैं।

विज्ञापन


इंसेफलाइटिस से क्या है लीची का कनेक्शन? 
इस प्रचार में वे व्यापारी भी लगे हैं जो लीची की कीमत को अपने नियंत्रण में रखकर उत्पादक किसानों को डराने में लगे हैं। इस प्रचार के पीछे चीनी लाॅबी का भी हाथ बताया जा रहा है। इन दिनों चीन भी दुनिया के बाजार में लीची को लेकर संवेदशील है। इसलिए इस आशंका को बल मिल रहा है कि चीन बिहारी लीची को बदनाम करने के लिए वैश्विक स्तर पर षडयंत्र कर रहा है। 
विज्ञापन


बताया जा रहा है कि इंसेफलाइटिस से मरने वाले बच्चों की मौत लीची खाने से हो रही है, जो निराधार और बिना किसी तथ्य के आधार पर गढ़ा गया एक झूठ है, उसे समाचार माध्यमों एवं सोशल मीडिया के द्वारा प्रचारित किया जा रहा है। बिहार के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने दावा किया है कि अधिकांश बच्चों की मौतें हाइपोग्लाइसीमिया (शुगर लेवल में अचानक भारी कमी) के कारण हुई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का दावा है कि इस प्रकार की मौतें बिहार के इस इलाके में चिलचिलाती गर्मी, नमी और बारिश का नहीं होना है। डाॅक्टरों का दावा है कि इस मौत के पीछे लीची की कोई भूमिका नहीं है। आपको यह भी बता दें कि यह कोई नई बात नहीं है। इंसेफलाइटिस से बच्चों की मौत का यह सिलसिला 1995 से ही जारी है लेकिन इस दिशा में न तो सरकार ने कोई ठोस कदम उठाया है और न ही किसी अन्य गैर सरकारी संगठनों ने इस क्षेत्र में कोई खास शोध किया।  

गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में बड़े पैमाने पर लीची की खेती होती है। संयोग देखिए कि मुजफ्फरपुर के जिस इलाके में लीची की बड़े पैमाने पर खेती होती है उसी इलाके में इस बीमारी का जोर है। अगर सचमुच इस बीमारी का कारण लीची होता तो देश और दुनिया के अन्य भागों में भी लीची की सघन खेती होती है वहां इस प्रकार की बीमारी नहीं होती। लेकिन उस लीची की गुणवत्ता में कमी के कारण उसका वैश्विक निर्यात नहीं के बराबर होता है।

encephalitis bihar muzaffarpur litchi fruit exports china lobby politics
बिहार में हर सा बच्चे इस बीमारी से मौत के मुंह में समा जाते हैं। - फोटो : PTI

क्यों खास है भारत और खासतौर पर मुजफ्फरपुर की लीची?  
भारत में उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा समस्तीपुर, सीतामढ़ी, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के देहरादून व पिथैड़ागढ़ घाटी, पंजाब में लीची की खेती होती है। दुनिया के देशों में नवम्बर से मार्च तक ऑस्ट्रेलिया, फरवरी से मार्च तक मॉरीशस, नवम्बर से जनवरी तक दक्षिण अफ्रीका और मेडागास्कर में लीची की खेती होती है लेकिन दुनिया में इन दिनों मुजफ्फरपुर की लीची की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है। इसका एक कारण यह भी है कि चूंकि जब भारत में लीची तैयार होती है उस समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अन्य फलों का अभाव रहता है। 

बिहार की लीची अपनी गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। बिहारी लीची में पोषक तत्वों की मात्रा भरपूर है। इसके फल में शर्करा (11 प्रतिशत), प्रोटीन (0.7 प्रतिशत), वसा (0.3 प्रतिशत), एवं अनेक विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। लीची का फल मरीजों एवं वृद्धों के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। 

इसलिए फैला एईएस, लीची नहीं है जिम्मेदार  
बताया जा रहा है कि इस इलाके में गर्मी के चरम पर पहुंचने और मॉनसून के शुरू होने के समय हर साल एईएस से बच्चों की मौत होती है, लेकिन 24 सालों में इन मौतों से बचने के लिए कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं खड़ी की गई।

दरअसल, इस बीमारी को लीची से जोड़े जाने के पीछे एक पत्रिका का हाथ बताया जा रहा है। इस बारे में ‘‘द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल’’ नामक पत्रिकार में एक विशिष्ट शोध प्रकाशित किया गया था। द लांसेट के अनुसार लीची में हायपोग्लायसिन-ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसीन होते हैं, जो कुपोषित बच्चों के खून में शुगर का लेवल बहुत कम कर देते हैं और यही कारण है कि बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं लेकिन पत्रिका में इस बीमारी का जिक्र कहीं नहीं मिलता है।

द लांसेट के मुताबिक यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इन कुपोषित बच्चों को पिछली रात भोजन नहीं मिला होता है और दूसरे दिन सुबह अपनी भूख मिटाने के लिए वे लीची के बागानों में गिरे हुए अधपके या पके फल उठाकर खा लेते हैं। वैसे भी खाली पेट कभी लीची खाने की सलाह नहीं दी जाती है। खाली पेट लीची खाना खतरनाक होता है और उससे किसी स्वस्थ व्यक्ति की भी मौत हो सकती है, लेकिन कुछ लाॅबी वालों ने इस शोध को इस बीमारी के साथ जोड़ दिया और प्रचार प्रारंभ कर दिया जबकि लीची से इसका कोई लेना-देना नहीं है। 

लीची हमारे स्वास्थ्य के लिए लिए बेहद जरूरी है क्योंकि इसमें मौजूद विटमिन, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और पाचन-प्रक्रिया के लिए जरूरी है। इसमें मौजूद फोलेट हमारे शरीर में कॉलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद पहुंचाता है। लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटमिन सी, विटमिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

बांग्लादेश ने किया था रिसर्च 
वैसे बांग्लादेशी वैज्ञानिकों ने लीची खाने से मरने वाले बच्चों पर एक शोध किया था। उस शोध में जो बातें सामने आईं वह चौंकाने वाली हैं। लीची की खेती के लिए प्रतिबंधित एंडोसल्फान समेत अन्य कीटनाशकों का प्रयोग होता है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बहुत खतरनाक है। चूंकी इस इलाके में गरीबी ज्यादा है इसलिए बच्चे बागानों में से लीचियों को उठाकर उसे धोए बगैर ही दांतों से छीलकर खा लेते हैं जिसके चलते खतरनाक रसायन उनके शरीर में प्रवेश कर जाते है और वह बच्चों के मौत का कारण बन जाता है।

जिनेवा में 2011 में आयोजित हुए स्टॉकहोम कंनवेंशन ऑन परसिस्टमेंट आर्गेनिक पॉल्यूटेंट्स पर हुई बैठक में भारत ने एंडोसल्फान के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने में अपनी सहमति जताई थी।

encephalitis bihar muzaffarpur litchi fruit exports china lobby politics
पूरी दुनिया में भारत की लीची की डिमांड तेजी से बढ़ रही है। - फोटो : PTI

संयुक्त राज्य, यूरोपीय संघ सहित दुनिया के 80 देशों ने इस रसायन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारत की सहमति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आठ हफ्तों के लिए इस रसायन के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया दिया था जो अभी भी जारी है, लेकिन अब इसके निर्यात पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है। बावजूद इसके चोरी-छुपे इस रसायन का उपयोग हो रहा है।

विगत् दिनों केरल में इस कीटनाशक के उपयोग पर सबसे पहले वर्ष 2005 में ही पाबंदी लगी थी। अकेले केरल में इस रसायन से 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और करीब 4000 से ज्यादा लोग शरीर के किसी हिस्से की अपंगता के शिकार हुए हैं। 

लीची पर है किसकी नजर 
इस प्रकार हम देखते हैं कि लीची एक उपयोगी और स्फूर्तिदायक फल है। इसकी खेती पहले देहरादून में बड़े पैमाने पर की जाती थी, लेकिन अब इसकी खेती वहां नहीं के बराबर होती है। इसकी खेती के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर का इलाका बेहद उपयुक्त माना जाता है। यहां दो प्रकार के लीची की खेती होती है। एक साही और दूसरा चाइना। इन दिनों चीन में भी लीची की खेती जोर पकड़ ली है। वैसे लीची का असली घर चीन ही है। दक्षिण चीन में लगभग 1000 सालों से लीची की खेती के प्रमाण मिलते हैं।

मसलन चीन इस फल में अपना प्रभुत्व चाहता है, इसलिए उसने सिल्क, कालीन और चमड़े के सामान के निर्यात की तरह ही लीची के निर्यात में भी भारत को पटखनी देने के फिराक में है, इसलिए मुजफ्फरपुर की लीची इन दिनों टारगेट में है। यह विशुद्ध रूप से व्यापारिक है न ही स्वास्थ्य से इसका कोई लेना-देना है। इसलिए इस प्रकार के प्रचार के खिलाफ बिहार और भारत सरकार को मजबूती के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed