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दूसरा पहलू: सूरदास की दिव्य दृष्टि, कुएं में गिरने का आख्यान और सूरकुटी में कृष्ण की बाललीला का दर्शन

Mon, 16 Feb 2026 06:21 AM IST
निर्मल कांत भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 16 Feb 2026 06:21 AM IST
सार

वह कुआं अपने अंदर न जाने कितने आख्यानों को समेटे हुए है। यदि आप महाकवि सूरदास के महात्म्य को नहीं जानते तो कुआं समझ से परे है।

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dusra pahlu Surdas's Divine Vision and the Tale of Falling into the Well
सूरकुटि, महाकवि सूरदार की कर्मस्थली - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

नीरव और शांत वातावरण में वक्त भी जैसे ठहर गया है। जनवरी की अलसाई-सी धूप व नीला दमकता आसमान। जंगल के बीच बनी पगडंडी और दोनों तरफ शांत तपस्या में लीन वृक्ष। सहसा पगडंडी खत्म होती है और सामने है... वह कुआं। अपने अंदर न जाने कितने आख्यानों को समेटे हुए। आगरा-मथुरा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 19 पर चलते हुए दाईं ओर लगा ‘सूर सरोवर’ का बोर्ड ध्यान खींचता है। लेकिन अगर आप महाकवि सूरदास के महात्म्य को नहीं जानते  , तो इस पवित्र स्थान को भी नहीं जान पाएंगे। करीब एक किलोमीटर चलकर रास्ता दो हिस्सों में बंट जाता है। दाईं तरफ जाएंगे तो जंगल से गुजरते हुए सूरकुटी पहुंच जाएंगे। सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी के पास आगरा के रुनकता गांव में माना जाता है। कहीं-कहीं यह भी जानकारी दी गई है कि उनका जन्म सीही गांव में हुआ था, जो दिल्ली या फरीदाबाद में है। पर इससे सब एकमत हैं कि उनकी कर्मस्थली रुनकता के पास कीठम में यमुना का गऊ घाट रही। लगभग पांच सौ साल पहले का वह समय कैसा होगा, जब इस आख्यान ने जन्म लिया होगा। सूरदास का नाम आते ही कृष्ण स्मरण में आते हैं। सूरकुटी महाकवि सूरदास की कर्मस्थली है। यह वह स्थल है, जहां वल्लभाचार्य ने सूरदास को ब्रह्म संबंध का ज्ञान दिया, यानी प्रेम के माध्यम से ईष्ट को पाना। उन्होंने सूरदास से श्रीकृष्ण लीला के पद गाने के लिए कहा।
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जैसे ही जंगल से निकलकर सूरकुटी पहुंचेंगे, तो सबसे पहले आपकी नजर सामने ही मौजूद कुएं पर पड़ेगी। सूरदास इसी कुएं में गिर पड़े थे। वे अपने आराध्य को पुकारने लगे। सूरदास को बचाने भगवान कृष्ण आए और उन्हें दिव्य दृष्टि मिली। कान्हा आए और कहा, बाबा कहां नीचे गिरे हो, मेरा हाथ पकड़ो और ऊपर आ जाओ। फिर हाथ छुड़ाकर जाने लगे, तो सूरदास ने कहा, कर छुटकाए जात हो, निबल जानि कर मोहि, हृदय से जब जाओ तो सबल जानूंगा तोए। यानी आप मेरा हाथ छोड़कर चले जाते हैं, मुझे निर्बल जानकर, मेरे हृदय से जाएं तो आपको बलशाली मानूंगा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूरदास की कवित्व शक्ति के बारे में लिखा है, सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन करते हैं, तो मानो अलंकार शास्त्र उनके पीछे-पीछे हाथ जोड़कर दौड़ता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है और रूपकों की वर्षा होने लगती है। कृष्ण के बालरूप का अद्भुत चित्रण इसे साबित करता है, मैया कबहि बढ़ेगी चोटी, किति बार मोहि दूध पियत भई, यह अजहूं है छोटी। सूरकुटी की मौजूदा हालत बहुत अच्छी नहीं है। यहां दृष्टिबाधितों के लिए विद्यालय भी है। पास में ही सूरदास की प्रतिमा और मंदिर है। सामने है यमुना की धारा और गऊघाट। वही जहां आंखें नहीं होने पर भी उन्होंने कृष्ण की अद्भुत बाललीला देखी। यही तो है दिव्य दृष्टि का आख्यान।
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