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डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष: राष्ट्र निर्माण की दृष्टि जिसने बदल दिया इतिहास

Thu, 14 Apr 2022 10:16 AM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Thu, 14 Apr 2022 10:16 AM IST
सार

बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने न केवल सदियों पुरानी अनेक रूढ़िवादी परम्पराओं को तोड़ने का साहस किया अपितु सामाजिक न्याय के ढांचे को मजबूती दी। सामाजिक बदलाव के जन आंदोलनों की कमान महिलाओं को सौपकर उनकी शक्ति को शिक्षा और संघर्ष से जोड़ा और संवैधानिक अधिकारों की राह दिखाई। 

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Dr Ambedkar Jayanti 2022 The Vision of Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar for Nation's Building
डॉ. अम्बेडकर और सबके बाबा साहब का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 को मध्य प्रदेश में महू नगर सैन्य छावनी में स्थित एक हिंदू महार जाति में हुआ था। - फोटो : Self

विस्तार

बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने न केवल सदियों पुरानी अनेक रूढ़िवादी परम्पराओं को तोड़ने का साहस किया अपितु सामाजिक न्याय के ढांचे को मजबूती दी। सामाजिक बदलाव के जन आंदोलनों की कमान महिलाओं को सौंपकर उनकी शक्ति को शिक्षा और संघर्ष से जोड़ा और संवैधानिक अधिकारों की राह दिखाई।

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राष्ट्र के निर्माण में देश को शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और संघर्ष के मुद्दों पर चिंतन करने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने जीवन में शिक्षा और संघर्ष के माध्यम से बड़ी- बड़ी चुनौतियों को हल किया। भारत मां के इस वीर सपूत को भारत सहित विश्वभर में सामाजिक न्याय के पैरोकार के रूप में याद किया जाता है।
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डॉ. अम्बेडकर और सबके बाबा साहब का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 को मध्य प्रदेश में महू नगर सैन्य छावनी में स्थित एक हिंदू महार जाति में हुआ था। उनका बचपन भारी भेदभाव के बीच गुजरा क्यों कि महार जाति को समाज में अछूत के रूप में देखा जाता था। तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियां असमानता के वातावरण से पटी पड़ी थी। ऊंच नीच और सामाजिक भेदभाव के तंग माहौल में पले बढ़े बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सामाजिक समानता की संवैधानिक ढांचे की तामीर की।

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स्कूल में जिस बालक भीम को कभी बैठने के लिए पहली सीट न मिली, नल से स्वम् पानी पीने का अधिकार न मिला, कक्षा में जिसके सवाल- जवाब को तवज्जो न दी गई, उसने गरीब, मजदूर, किसानों, महिलाओं और समाज के हर शोषित वंचित तबकों की संसद में आवाज बुलंद की और सामाजिक न्याय की संवैधानिक लड़ाई लड़ी। जिसका परिणाम है की भारत आज सबका साथ सबका विकास के मंत्र के साथ दुनिया की आंखों में आंखें डाल विकास की महाशक्ति बनने के लिए अग्रणीय खड़ा है।


बाबा साहेब के क्रांतिकारी विचार 

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि भारतीय समाज भाषा, जाति, धर्म और कई कारणों से विभाजित है और समाज को जोड़ने में भारत का संविधान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डॉ. अंबेडकर की कानूनी विशेषज्ञता के आधार पर उन्हें संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया जिसके तहत आगे चलकर उन्होंने भारत के गौरवशाली संविधान को तैयार करने में अहम किरदार निभाया।
 
उनका बेहद महत्वपूर्ण योगदान मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मजबूत केंद्र सरकार के क्षेत्र में रहा।

बाबा साहेब कहते हैं-

 

अनुच्छेद 32 संविधान का सबसे अहम अनुच्छेद हैं। यह संविधान की आत्मा है और इसके बिना संविधान अर्थहीन है। वे देश हित में मजबूत केंद्र की वकालत करते थे।


बाबा साहेब देश के बड़े हिस्से अल्पसंख्यकों को भारत के लोकतंत्र में सत्ता में हिस्सेदारी के समर्थक थे उनका मानना था कि 'वन मैन वन वोट' का लोकतांत्रिक शासन काफी नहीं है वे 'मेजरिटेरियनिज्म सिंड्रोम' के विरोधी थे इसलिए बाबा साहेब ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए संविधान में कई तरह के सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित किए।

उन्होंने एक ऐसा मजबूत संविधान तैयार किया जिसमें भारत के हर तबके की सुरक्षा और समानता के साथ साथ सामाजिक न्याय के प्रावधान किये गए हैं।

Dr Ambedkar Jayanti 2022 The Vision of Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar for Nation's Building
डॉ. अंबेडकर के लिए भारत के भविष्य को लेकर कई तरह की चिंताएं और चुनौतियां थी जिनके प्रति वे लगातार आगाह किया करते थे। - फोटो : Facebook

डॉ.अंबेडकर जानते थे कि भारत की संस्कृति विविधताओं की खान है इसलिए हर समाज का बराबरी के साथ आगे बढ़ना ही भारत की तरक्की का आधार स्तंभ बन सकता है जिसके लिए उनके प्रयास जीवनपर्यंत रहे। 
 

डॉ. अंबेडकर के लिए भारत के भविष्य को लेकर कई तरह की चिंताएं और चुनौतियां थी जिनके प्रति वे लगातार आगाह किया करते थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह हो सकता है कि आप स्वम् मराठी भाषी होते हुए भी एक राष्ट्र एक भाषा के सिद्धांत को क्रियांवित किया जाने पर आप जोर देते रहे।
 

उनकी चिंता थी की राज्यों को अपनी राज भाषा चुनने का अधिकार दिया जाने पर देश बिखरने का खतरा रहेगा। उनके क्रांतिकारी विचारों पर अक्सर लोगों में मतभेद रहता और उन्हें समाज के विरोध का सामना करना पड़ता लेकिन वे देश हित में डटे रहते। 

उन्होंने लगातार हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने की वकालत की। संभवतः यदि उनकी बात मान ली जाती तो भाषायी पृथकतावाद को पनपने का मौका न मिल पाता। उनका कहना था कि 26 जनवरी 1950 से हम ऐसे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं जिसमें राजनैतिक दृष्टि से सभी समान होंगे लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता मौजूद रहेगी।

बाबा साहेब आजादी का वास्तविक अर्थ बेड़ियां तोड़ने के साथ साथ कमजोर तबकों का संपूर्ण विकास होने तक जोड़ते थे। 15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन भारत आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ जिसके साथ डॉ. अंबेडकर ने एक नए भारत की बुनियाद रखी। 

डॉ. अंबेडकर ने दलितों के मध्य शिक्षा और संस्कृति के प्रसार के लिए कई आंदोलन और संगठन बनाए जैसे वर्ष 1923 में बहिष्कृत हिकारिणी सभा की स्थापना, 1930में कलाराम मंदिर के बाहर विरोध प्रदर्शन, 1930-32 तक तीनों गोलमेज सम्मेलन में 'अछूतों' के हितों पर अपने सशक्त विचार रखे।

वर्ष 1932 में महात्मा गांधी जी के साथ ऐतिहासिक पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए। जिसके फलस्वरूप पृथक निर्वाचन मंडल के विचार को त्याग कर दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 तथा केंद्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18% कर दी गई।

 

Dr Ambedkar Jayanti 2022 The Vision of Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar for Nation's Building
बाबा साहेब ने हिंदू कोड बिल के संदर्भ में महिलाओं के अधिकारों की वकालत की जो महिलाओं के हक पर बात करने एक क्रांतिकारी कदम था। - फोटो : facebook

बाबा साहेब का राजनीतिक जीवन 

वर्ष 1936 में डॉ. अंबेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की। 14 अक्तूबर, 1956 को आपने अपने कई अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। उसी वर्ष उन्होंने अपना अंतिम लेखन कार्य 'बुद्ध एंड हिज धर्म' पूरा किया। वर्ष 1990 में डॉ. बी. आर. अंबेडकर को भारत रत्न पुरस्कार से नवाजा गया। भारत सरकार ने 14 अप्रैल, 1990 से 14 अप्रैल, 1991 की अवधि को बाबासाहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर की याद में 'सामाजिक न्याय के वर्ष' के रूप में मनाने का फैसला लिया।

मजदूरों के नेता डॉ.अम्बेडकर हर मंच पर वंचित वर्गों की आवाज बने। बॉम्बे असेंबली के सदस्य के रूप में, डॉ.अंबेडकर ने कर्मचारियों के हड़ताल के अधिकार को समाप्त करने के कारण औद्योगिक विवाद विधेयक, 1937 का विरोध किया। वे सदैव श्रमिकों के जीवन की उचित स्थिति की वकालत करते थे। 

लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने मातृत्व लाभ के साथ बिना लैंगिक पक्षपात के साथ"समान काम के लिये समान वेतन" के सिद्धांत को स्थापित करने में मदद की।

हिंदू कोड बिल के संदर्भ में उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की वकालत की जो महिलाओं के हक पर बात करने एक क्रांतिकारी कदम था। सर्वविदित है कि डॉ. अंबेडकर ने राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम् योगदान दिया और भारतीय समाज की अंगिनत रूढ़ियों को समाप्त करने का काम किया।

हालांकि आज भारत कई तरह की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे कि जातिवाद, सांप्रदायिकता, अलगाववाद, लैंगिक असमानता आदि। वर्तमान में सबसे ज्यादा जरूरत है कि हम अपने भीतर अंबेडकर की शिक्षा को खोजने की कोशिस करें ताकि हम इन चुनौतियों से निपट सकें।

जब जब बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर की जीवन संघर्ष यात्रा पर विमर्श किया जायेगा तो वंचित और शोषितों के बेहतर भविष्य की सुंदर परिकल्पना नजर आएगी। अस्पृश्यता और भेदभाव को खत्म करने का उनका संघर्ष निरंतर जारी रहा। निःसंदेह हम उस दौर के प्रत्यक्षदर्शी होंगे जिस दौर में मैला धोने जैसी आमनवीय प्रथा रोकने की जद्दो जहद जारी थी।

कितना मुश्किल था वो दौर उसे सोच ही रूह कांप उठती है, डॉ.अंबेडकर तो उस दौर से भी कठिन दौर के गवाह बने शायद इसीलिए उस टीस और जख्मों की खाई को पाटने का बीड़ा बाबा साहेब ने उठाया था और आप जीवन के अंतिम चरण तक सामाजिक न्याय के पैरोकार बने रहे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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