कोरोना से जंग: थमी हुई अर्थव्यवस्था और श्रम कानून में बदलाव का संकट, कौन लेगा मजबूर मजदूरों की सुध?
कोरोना वायरस के संकट से निपटने में सरकार भले ही हाथ-पैर मार रही हो, लेकिन इस महामारी का सबसे ज्यादा असर मजूदरों पर हुआ है। अचानक लॉकडाउन घोषित करने के बाद मज़दूरों को लग रहा था कि अब सरकार उनकी सुध लेगी।
क़रीब दो महीनों से अपने घरों से दूर ये मज़दूर काम-धंधे से बेकार, खाने-पीने के लिए सरकार और दानदाताओं पर मोहताज हो गए हैं। अब लॉकडाउन खोलकर रुकी हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव कर दिए हैं। यह मजदूरोंं की मुसीबत को और बढ़ाएगा।
दरअसल, श्रम कानूनों में बदलाव की मजबूरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय समीकरण भी छिपे हुए हैं। मज़दूरों को नई परिस्थिति में नई तरह से अपने आपको संगठित करना, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को अपने साथ जोड़ना होगा और संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।
मजदूरों के हालात पर विभिन्न श्रम संगठन अपनी ओर से आवाज उठा रहे हैं। 10 मई 2020 को ऐसे ही एक वेबिनार में कई श्रम संगठनों ने मजदूरों के भविष्य के बारे में चिंता जाहिर की। "कोरोना की आड़ में श्रम कानूनों में बदलाव।" जैसे विषय इस समय श्रम संगठनों द्वारा आयोजित वेबिनार के विषय बने हुए हैं।
दरअसल, देखा जाए तो कोविड-19 से निपटने के लिए सरकार ने तब लॉकडाउन कर दिया था जब भारत में कोविड-19 के केवल करीब 500 मामले थे। सरकार के उस निर्णय ने करोड़ों मज़दूरों को बेतहाशा मुश्किल में डाल दिया था।
सभी प्रदेशों की सरकारें इन गरीबों की भोजन, राशन, दवाओं, या अपने घर से संपर्क की व्यवस्थाओं में नाकाम रहीं तो ये मज़दूर भूख से मरने के डर से उन जगहों को छोड़कर अपने गांवों की तरफ निकल पड़े।
सूखी हड्डियों वाले महिला-पुरुष अपने बच्चों को गोद में लेकर सैकड़ों, और हज़ारों किलोमीटर लम्बे सफर पर थे। चप्पलें टूट गईं, चिलचिलाती गर्मी में कुछ ने दम भी तोड़ दिया।
यह दृश्य हमारे दिलों को दहला ही रहे थे कि पता चला मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा अन्य कुछ और भी राज्यों की सरकारों ने श्रम कानूनों में बदलाव का फैसला कर लिया है। ऐसे फैसले लेते हुए न तो विपक्षी दलों से पूछा गया और न ही श्रम संगठनों के साथ कोई मशविरा किया गया।
इंदौर एटक के महासचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव (इंदौर) कहते हैं- हमें प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं पर सबसे पहले गौर करना चाहिए और सरकार ने जो बदलाव श्रम कानूनों में लाए हैं उनके खिलाफ इकट्ठे होकर लड़ाई लड़नी चाहिए।
सीटू के मध्य प्रदेश के राज्य कमिटी सदस्य कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया (इंदौर) कहते हैं- प्रदेश सरकार ने कारखाना अधिनियम, 1948, ठेका श्रमिक अधिनियम, दुकान एवं स्थापना अधिनियम आदि कानून बदल डालने का असर पूरे श्रमिक वर्ग पर बहुत प्रतिकूल पड़ेगा।
इंटक के प्रदेश महामंत्री श्याम सुन्दर यादव की मानें तो- सरकार ने श्रम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया और कानूनों में बदलाव कर दिया। आज़ादी के बाद पहली बार मज़दूरों के साथ इस तरह का तानाशाहीपूर्ण रवैय्या अपनाया गया है।
अर्थशास्त्री जया मेहता इसे वैैैैैैश्विक नजरिए से देखती हैं वे कहती हैं- श्रम कानूनों में बदलाव से जिन मज़दूरों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, वैसे मज़दूर कुल मज़दूरों का बहुत थोड़ा प्रतिशत हैं। जो असंगठित मज़दूर सैकड़ों - हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव वापस जा रहे हैं, जो रेल-सड़क हादसों और भूख का शिकार हो रहे हैं, उनकी तादाद कुल मज़दूरों की लगभग 93 प्रतिशत है। इन्हें रोज़गार की, या बेहतर जीवन की या काम के घंटों की या किसी और तरह की कानूनी सुरक्षा कभी भी मिली ही नहीं, लेकिन मज़दूरों के ये दोनों तबके आपस में जुड़े हुए हैं।
जया के मुताबिक कॉर्पोरेट जगत का तर्क यह है कि अगर नियम ढीले हो जाएंगे तो वे अधिक मज़दूरों को काम दे सकेंगे और तब सड़कों-पटरियों पर चल रहे इन मज़दूरों को भी बेहतर रोज़गार हासिल होने की सम्भावना बनेगी। लेकिन यह एक साफ़ झूठ है। इतिहास गवाह है कि कानूनों में ढील देने से रोज़गार नहीं बढ़ा बल्कि मज़दूरों का शोषण ही बढ़ा है।
वे कहती हैं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात सरकार ने श्रम कानूनों में जो बदलाव किए हैं, वे केवल देश और प्रदेशों की राजनीति तथा अर्थव्यवस्था से भर जुड़े हुए मामले नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय बिसात का हिस्सा हैं।
अमेरिका चाहता है कि कोरोना का बहाना लेकर चीन से निर्माण का आधार छीन लिया जाए ताकि चीन की अर्थव्यवस्था चरमरा जाए और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा में न रहे। इसके लिए जापान और योरप के अनेक देश भी तैयार हैं। भारत इस मौके का फायदा उठाकर विदेशी निवेश को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव और सीपीआई के कार्यकर्ता हैं।)
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