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कोरोना वायरस: वैक्सीन पर करोड़ोंं खर्च कर रहा ऑस्ट्रेलिया, यह दवा बन सकती है कोविड-19 का तोड़

Wed, 15 Apr 2020 03:53 PM IST
Rekha Rajvanshi रेखा राजवंशी
Updated Wed, 15 Apr 2020 03:53 PM IST
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coronavirus in australia australian scientists begin research
कोरोना वायरस के उपचार के लिए ऑस्ट्रेलिया में हो रहे प्रयोग - फोटो : Amar Ujala

कोरोनावायरस ने विश्व भर को हिला कर रख दिया है और अनेक देशों में भयावह रूप से फ़ैल गया है। वर्तमान स्थिति के अनुसार अमेरिका और यूरोप में मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है, पर ऑस्ट्रेलिया की बात करें तो यहां स्थिति अभी भी नियंत्रण में है। 

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आज तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो 15 अप्रैल तक 6400 सेे ज्यादा लोगों को कोविड पॉजिटिव पाया गया है, जिनमे से 60 ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई है। इन आंकड़ों से यह तो स्पष्ट है कि यहांं स्थिति अन्य देशों की तुलना में काफी ठीक है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ग्रेग हंट ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में कोरोना वायरस का प्रसार में कमी होने का मुख्य कारण है कि यहांं लोगों ने 'सेल्फ आइसोलेशन' के नियमों का पालन किया है।

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प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि कम से कम छह महीने के लिए सामाजिक-दूरी (सोशल डिस्टैन्सिंग) के नियम लागू रहेंगे और संभावित रूप से लंबे समय तक, अगर शोधकर्ता इसके बचाव का टीका विकसित करने में असमर्थ हैं या अधिक समय लगता है। 

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COVID-19 महामारी के चलते दुनिया के अधिकांश देश प्रभावित हुए हैं, काम काज लगभग ठप्प हो गया है, अर्थव्यवस्था चरमरा गई है और वैज्ञानिक इस बात को समझने में व्यस्त हैं कि इस वायरस को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। कैसे जल्द से जल्द कोई वैक्सीन ढूंंढा जा सकता है और कैसे मरीजों का कारगर उपचार किया जा सकता है।  


शोध के लिए $2.6 मिलियन से अधिक का निवेश
11 मार्च 2020 को, ऑस्ट्रेलियन स्वास्थ्य मंत्री ग्रेग हंट ने कोरोनावायरस आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पीटर डोहर्टी इंस्टीट्यूट फॉर इंफेक्शन एंड इम्यूनिटी में डायग्नोस्टिक्स शोध के लिए $2.6 मिलियन से अधिक का निवेश करने की घोषणा की। यह धनराशि इस उद्देश्य से दी गई कि इससे कोरोनावायरस के कारण और निवारण के बारे में शोध किया जा सके। मेडिकल रिसर्च फ़्यूचर फ़ंड (MRFF) से प्राप्त धनराशि का उपयोग ऑस्ट्रेलिया के रोगियों के कोरोनो वायरस परीक्षण बढ़ाने के लिए किया जाएगा। 


आपके शरीर का इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) COVID -19 से कैसे लड़ती है? 
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने पाया है कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली इस कोरोनो वायरस से उसी तरह से प्रतिक्रिया देती है जैसे कि इन्फ्लूएंजा के लिए देती है। रोगियों में COVID-19 से ठीक होने से पहले जो प्रतिरक्षा कोशिकाएं खून में निकलती हैं, वही कोशिकाएं हैं जो हम फ्लू से ठीक होने से पहले लोगों में दिखाई देती हैं। 


कोविड -19 वैक्सीन का परीक्षण 
मार्च में क्वींसलैंड के शोधकर्ताओं ने जानवरों पर एक और संभावित कोविड -19 वैक्सीन का परीक्षण शुरू किया, और वर्ष के मध्य तक इसका मानव परीक्षण शुरू करने की उम्मीद है। प्रोफेसर हेंडरसन ने कहा, “पहली चुनौती है कि इस वैक्सीन को नैदानिक परीक्षणों में सुरक्षित और प्रभावी साबित करना, लेकिन अगली चुनौती होगा इस वैक्सीन का उत्पादन करने के लिए वैश्विक स्तर पर पर्याप्त उत्पादन क्षमता की खोज करना, ताकि लाखों या अरबों लोगों को टीका लगाया जा सके।"

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COVID-19 वैक्सीन के व्यापक रूप से उपलब्ध होने में कम से कम 12 से 18 महीने लगेंगे। - फोटो : अमर उजाला

इसी कारण से अनुमान है कि COVID-19 वैक्सीन के व्यापक रूप से उपलब्ध होने में कम से कम 12 से 18 महीने लगेंगे। एक नई दवा को लेकर आशा - 4 अप्रैल की खबर के अनुसार कोरोनावायरस की चिकित्सा के सन्दर्भ में स्वास्थ्य अधिकारी एक नई दवा को लेकर आशान्वित दिखाई दिए।


ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर कहा है कि दुनिया भर में पहले से ही मौजूद एक परजीवी दवा 48 घंटे के भीतर वायरस को मार सकती है। यह दवा, जिसका उपयोग पारंपरिक रूप से सिर की जूंं और खुजली के इलाज करने के लिए किया जाता है, कोरोनोवायरस उपचार के लिए भी कारगर सिद्ध हो सकती है। प्रयोगशाला में यह दवा का वायरस के समापन में  कारगर सिद्ध हुई और इसके अच्छे परिणाम रहे।  


Ivermectin को सिर की जूंं और खुजली सहित कई स्थितियों के उपचार के लिए दुनिया भर में वर्षों से उपयोग किया जाता है, और यह एक गोली, लोशन और शैम्पू के रूप में उपलब्ध है। अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं के काम की प्रशंसा करते हुए, विक्टोरियन स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों से इस पदार्थ का दुरुपयोग न करने का आग्रह किया। क्योंकि इसके स्वयं इस्तेमाल से व्यक्ति की जान भी जा सकती है। स्वास्थ्य अधिकारियों  ने लोगों से अनुरोध किया कि इसे खरीद कर अपनी चिकित्सा स्वयं न करें क्योंकि अभी भी इस पर शोध जारी है।  


मोनाश बायोमेडिसिन डिस्कवरी इंस्टीट्यूट और डोहर्टी इंस्टीट्यूट के नेतृत्व में एक सहयोगी अध्ययन में पाया गया कि दवा कोशिकाओं में पनपने वाले कोरोनवायरस को रोकती है। अगला कदम यह निर्धारित करना है कि क्या यह मनुष्यों में कोरोनो वायरस का प्रभावी ढंग से इलाज कर सकता है, और यह भी पता लगाया जाएगा कि एक सुरक्षित खुराक क्या होगी।


वैज्ञानिकों का कहना है -
आइवरमेक्टिन लैब परीक्षणों में बढ़ने वाले वायरस को रोकता है लेकिन शोधकर्ताओं को यह पता लगाने की आवश्यकता है कि क्या यह मनुष्यों में प्रभावी है और यह किस दर पर सुरक्षित है।  यह स्पष्ट नहीं है कि कोरोनोवायरस को रोकने के लिए दवा कैसे काम करती है ।  मानव नैदानिक परीक्षण शुरू होने से पहले इस बात की पुष्टि में महीनें लग सकते हैं।  


ज़ाहिर है कि ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक और सरकार कोरोनावायरस की रोकथाम और उपचार के लिए प्रयोग किए जाने वाले वैक्सीन और दवा पर रिसर्च करने में काफी पैसा लगा रही है। आशा यही है कि शीघ्र ही इसका कुछ न कुछ समाधान निकलेगा, लोग पुनः स्वयं को सुरक्षित करेंगे और जान जीवन पुनः सामान्य हो सकेगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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