कोरोना संकट: एक महामारी ने दिलाई रिश्तों और गांव की याद
- धन-दौलत कमाने की खातिर आज मानव मशीन बन गया है।
- बुजुर्गों ने एक-एक पत्थर जोड़कर जो घर बनाए थे आज वे खंडहर बन चुके हैं।
- गांव में हर सुविधाएं होने के बाद भी लोग गांव से पलायन करते हैं।
- आज रिश्तों का स्थान मोबाइल ने ले लिया है।
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विस्तार
कोरोना वायरस ने भारत में जब दस्तक दी तो लोगों को यह लगा नहीं था कि उन्हें अपनी नौकरी, अपना कारोबार छोड़कर फिर से शहरों से गांवों की ओर पलायन करना पड़ेगा, क्योंकि वहां वो सुरक्षित महसूस करेंगे और कर भी रहे हैं। देश में मार्च में पहली बार लॉकडाउन लगा था, तब लोग शहरों में खुद को बेबस और फंसा हुआ महसूस कर रहे थे, लेकिन जैसे ही बस और ट्रेनों की आवाजाही शुरू हुई, लोग सरपट अपने-अपने गांवों की ओर भागे। यह कैसी विडंबना है कि आज जब कोरोना वायरस ने रंज दिया तो लोगों को गांव याद आया। यह बात गांव छोड़कर विदेशों व महानगरों तथा शहरों में जा चुके लोगों पर सटीक बैठती है। यहां तक कि सात समंदर पार रहने वाले और पश्चिमी सभ्यता के रंगों में रंग चुके लोगों को भी मातृभूमि याद आने लगी।
इतिहास साक्षी है कि जो अपनी जन्मभूमि को त्यागता है वह सुखी नहीें रह सकता। यह एक अटल सत्य है कि जननी व जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। बचपन गांव में बीता मगर माया के मोहजाल में शहर को अपना लिया है। गांव को भुुला दिया गया ।
धन-दौलत कमाने कि खातिर आज मानव मशीन बन गया। मातृभूमि से कटकर शहरों में जिंदगी बिताने लगा और गांव की मिटटी को भूल गया। गांव की मिटटी में सौंधी खुश्बू है। सुबह पक्षियों की चहचहाट सुनने को मिलती है। सब कुछ होते हुए भी आज लोग गांव से शहरों की ओर भागते हैं।
आधुनिकता की चंकाचैंध में कुछ लोग ऐसे रंग गए कि गांव छोड़कर शहरों की ओर चले गए। शहरों में आपाधापी मची हुइ है। माया ही सब कुछ गांव में ताजी हवा है खुला वातावरण है। गांव में हर चीज मिलती है। शुद्ध हवा पानी है। शहरों में मंजिल के ऊपर कौन रहता है कोई पता नहीं है।
आस-पड़ोस में कौन कब आता है जाता है कुछ पता नहीं है। कौन बीमार है कोई पता नहीं चलता है। शहरों में रहने वाले बच्चों के पास समय नहीे है। मां-बाप गांव में अकेले रहते हैंं। कोरोना ने ऐसे लोगों को रिश्तों की पहचान करवा दी है। कोरोना ने संस्कारों भटके लोगों को रास्ता दिखा दिया है।
गांव में कोई बीमार होता है गांव वाले सहायता करते है।मगर शहरों में सड़क पर तड़फते घायल की फोटो खिची जाती है।शहरों में सवेंदना व ईमानदारी नाम की कोई चीज नहीं है।शहरों में बसे लोगों ने गांव की जमीने बेच दी बुजुर्गों के मकान गिरा दिए।
बुजुर्गों ने एक-एक पत्थर जोड़कर जो घर बनाए थे आज वे खंडहर बन चुके हैं। गांव की ओर कभी देखा तक नहीं कि धरोहरें कैसी है। शहरों में आलिशान मकान ले लिए। आज लोेग हजारों मील का रास्ता तय करके गांव लौट रहे है।बरसों पहले गांव छोड़ चुके लोगों केा अब गांव की जिंदगी रास आने लगी है।
समय पता नहीं कैसे -कैसे दिन दिखाता है...
गांव में हर आदमी सहायता करता है। शहरों में खुदगर्ज लोग रहते हैं। पैसा ही सब कुछ है। शहरों में इन्सानियत की मौत हो चुकी है। लाखों अनजान चेहरे रहते हैंं। किसी से कोई लेना-देना नहीं है। मतलब होगा तो बात कर लेगें बरना आंख तक मिलाने से परहेज करते हैंं।
शहरों में बोतलबंद पानी मिलता है। गांव में कुओं, बावड़ियों व झरनों का शीतल जल मिलता है। गांव में दूध,दही,घी ,छाछ मिलती है। शहरों में डिब्बा बंद दूध मिलता है। गांव में स्वच्छता है। आंगन है चौबारे हैंं। कोयल की मीठी बोली है, पक्षियों का कलरव है।
गांव बुरा नहीं है। गांव की जिंदगी शांत है। शहरों में चिलपौं मची हुई है। वाहनों का शोरगुल है। ध्वनि प्रदूषण है। गांव साफ-सुथरे है। बुजुर्गो का आर्शीवाद है। मां-बाप का प्यार है। सुख-दुख में लोग भागीदारी निभाते हैंं। कोरोना के डर से आज सालों पहले गांव को अलविदा कहने वाले लौटने पर मजबूर हैं।
समय पता नहीं कैसे -कैसे दिन दिखाता है। अब माता पिता की याद आने लगी है। माता-पिता के प्रति फर्ज याद आने लगे हैंं। उनके कर्ज याद आने लगें है। मां-बाप का कर्ज आज तक कोई नहीं लौटा पाया है। अब गांव की स्मृतियां याद आने लगी है।
रिश्तों की अहमियत का पता चलने लगा है। भाईचारा है,संंवेदना है,दया है धर्म है, इमान है, सम्मान है, संस्कार है, रिश्ते-नाते है, अकेलापन नहीं है। बाग है बगीचे हैं। खेत -खलियान है। देवताओं का आशीर्वाद है। ताजे फल हैं। मीठा जल है। आम व सेब के बागान है।
निष्कर्ष यह है कि आज गांव में हर सुविधाएं होने के बाद भी लोग गांव से पलायन करते हैं। दादी,नानी की कहानियां आज कहां गुम हो गई है। मां कि लोरियां कहां है। गांव के चौपाल में झूले झूलने वाले दिन भूल गए। मुसीबत में आज गांव की शरण ले रहे हैंं।
संस्कृति व संस्कारोंं को भूलने वाले आज गांव की पनाह ढूढ़ रहे हैं। गुरुओं को भूल गए है। प्रकृति के रौद्र रूप को देखकर गांव का रुख कर रहे है। पिज्जा व बिरयानी व मैगी व जंक फूड के आदी लोगों को अब सरसों का साग व मक्की की रोटी आज याद आ रही है।
शहर के दोस्त इमारतों में कैद हो चुके हैं...
आज रिश्तों का स्थान मोबाइल ने ले लिया है। ऑनलाइन ही सब कुछ हो रहा है मगर प्रकृति ने धूल चाटने को मजबूर कर दिया है। गांव को भूल चुके लोग आज किसी भी कीमत पर वापस आना चाहते है।जड़ों से कट चुके है रिशते नातों को भूल चुके है।
शहरी होने का भ्रम पाल चुके लोग आज सदियों पुरानी परंपराओं को भूलते जा रहे हैंं। रीति रिवाजों को खत्म करते जा रहे हैंं। सांस्कृतिक विरासतों को त्याग चुके हैंं। प्रकृति इसका हश्र दिखा रही है।शहरों में असुरक्षा है। सामाजिक दायित्वों का हनन होता जा रहा है।
आज गांव कोरोना से सुरक्षित है। शहरों से गांव लौटने वाले ही इस वायरस को फैला रहे हैं। गांव में हर चीज का पालन किया जा रहा है। ठीकरी पहरा बिठाया जा रहा है। अगर गांव आज इस महामारी की चपेट में आते तो आज तबाही मच जाती मगर गांव में एकता है एक इन्सानियत है। संवेदनशीलता का माहौल है।
शहरों की चकाचैंध में मस्त लोग आज त्रस्त हो चुके है। गांव ही आखिरी विकल्प सूझ रहा है। गांव तक इस महामारी का प्रकोप नहीं पहुंचना चाहिए। मानव जीवन दुर्लभ है। अभी तो शुरुआत है आगे पता नहीं कैसे हालात होगें। अब लोगों को गांव प्यारा लगने लगा है। शहरों का भूत उतर चुका है।
शहर के दोस्त इमारतों में कैद हो चुके हैं। खिड़कियों से झांक रहे हैं। अब छटपटा रहे हैं। मजदूरों को भटकने पर मजबूर कर दिया घर से निकाल दिया मगर उन लोगों ने पैदल ही सड़को को नाप दिया।पांव में छाले पड़ गए। चिलचिलाती घूप में चलते रहें।
शहर के लोग संवेदहीन हो चुके हैं। मजदूरों को बेबस कर दिया। मगर एक दिन मजदूरों का पसीना हर बूंद का हिसाब मागेगा कि जिन मजदूरों ने दिन-रात पसीना बहाकर बहुमंजिला इमारतों का निर्माण किया। मुसीबत में घरों से बेघर कर दिया। मजदूर तो कष्ट सहकर आने गांव पहुंच गए पर तुम तो कैद ही रहोगे।
हजारों मीलों का रास्ता तय कर दिया। सिर पर गठरी गोद में बच्चा और पीठ पर बुजुर्गो को उठाकर गांव पंहुच गए। शहर के लोगों को सजा जरूर मिलेगी। गांव में गुजर बसर करके जो भी मिलेगा खा लेगें मगर खुदगर्ज हो चुके शहर में कभी नहीं आएंंगे। शहर के लोगों को मजदूरों की याद आएगी मगर अब कुछ नहीं हो सकता है।
मजदूरों को घर से निकाल दिया अब तुम कैदखाने में रहो। मजदूर खुली हवा में सांस ले रहा है। खुश है कि आज वह अपने गांव अपनों के बीच है। गांव के लोगों को जागरूकता से सर्तकता बरतनी होगी ताकि गांव सुरक्षित रहे। शहर में कोरोना का कहर बरपा हुआ है। शहरों में सब मतलबपरस्त है।
गांव में ही जो रुखी सूखी मिल जाए उससे ही अपना जीवन जीएं। गांव में अपनापन है। गांव जैसा भी है अपना तो है शहरों से गांव लौट आओ अपना जीवन बचाओं।
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