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अतीत को भविष्य से जोड़ने वाली दृष्टि: उम्र बोझ नहीं, बुजुर्गों के अनुभव ही जीवन की असली पूंजी हैं

Fri, 20 Mar 2026 04:59 AM IST
Shubham Kumar पैट्रिक व्हाइट
पैट्रिक व्हाइट Published by: Shubham Kumar Updated Fri, 20 Mar 2026 04:59 AM IST
सार

वरिष्ठजन हमारे समाज की जीवित विरासत हैं। उनके पास संघर्ष, धैर्य, प्रेम व त्याग की कहानियों के अलावा समय की वह दृष्टि भी होती है, जो वर्तमान की सीमाओं से परे जाकर अतीत और भविष्य को आपस में जोड़ती है।
 

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Connecting the Past to the Future Age is Not a Burden the Experiences of the Elderly Are Life True Capital
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मैंइस पर विश्वास करना चाहूंगा कि उम्र के साथ हम अधिक बुद्धिमान होते जाते हैं। मध्यम पीढ़ी के लोग, यदि वे उदार या भावुक हैं, तो इस ज्ञान को स्वीकार कर लेते हैं, जबकि निष्ठुर लोग हमें बेकार वस्तुओं की तरह देखते हैं-टूटे हुए फर्नीचर या मुरझाए हुए फूलों की तरह। युवाओं के लिए तो जैसे हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं, जब तक कि हम उसके परिवार के सदस्य न हों। परंतु इस कठोर चित्रण के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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वृद्धावस्था केवल शारीरिक कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभवों का संचित खजाना है। यह वह अवस्था है, जहां जीवन के कई उतार-चढ़ावों से गुजरकर मनुष्य एक ऐसी समझ विकसित करता है, जो पुस्तकों या तर्कों से मिल ही नहीं सकती। बुजुर्गों के पास समय की वह दृष्टि होती है, जो वर्तमान की सीमाओं से परे जाकर अतीत और भविष्य को आपस में जोड़ती है। वृद्ध लोग हमारे समाज की जीवित विरासत हैं।
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उनके पास संघर्ष, धैर्य, प्रेम और त्याग की कहानियां होती हैं, जो नई पीढ़ी को दिशा दे सकती हैं। उन्होंने उन कठिनाइयों का सामना किया है, जिनके कारण आज की सुविधाएं संभव हो पाई हैं। उनकी उपेक्षा करना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास और अनुभव का अपमान है।
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वृद्धावस्था हमें यह भी सिखाती है कि जीवन का मूल्य केवल गति में नहीं, बल्कि ठहराव में भी है। वरिष्ठ नागरिक हमें सिखाते हैं कि हर चीज को पाने की जल्दबाजी में हमें जीवन के वास्तविक अर्थ को खोने से बचना चाहिए। उनके शब्दों में भले ही चमक न हो, पर उनमें सच्चाई और गहराई अवश्य होती है। समाज का कर्तव्य है कि वह अपने बुजुर्गों का सम्मान करे, उनकी देखभाल करे और उनके अनुभवों को महत्व दे। यह केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस समाज में बुजुर्गों का आदर होता है, वह समाज अधिक संवेदनशील और संतुलित होता है।

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