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‘वंदे मातरम्’ संपूर्ण गायन: कुछ व्यावहारिक सवाल...

Thu, 12 Feb 2026 04:32 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 12 Feb 2026 04:32 PM IST
सार

इसे गाने में 65 सेकंड लगते हैं। यदि इस गीत को संपूर्ण रूप में, जिसमें 6 अंतरे हैं, गाया जाए तो उसमें 3 मिनट 10 सेकंड लगेंगे। भारत में नियम यह है कि राष्ट्रगान अथवा राष्ट्रगीत गायन के समय उसके सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़े रहना होता है।

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Complete Singing of Vande Mataram: Some Practical Questions
वंदे मातरम का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महान राष्ट्रगान ‘वंदे मातरम्’ के संपूर्ण गायन को लेकर गत वर्ष इस गीत की रचना की डेढ़ सौ वीं वर्षगांठ से जो माहौल बनाया जा रहा था, केन्द्रीय गृह मंत्रालय का ताजा प्रोटोकॉल उसी की स्वाभाविक परिणति है। स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरक शक्ति रहे इस गीत को गाया जाए, न गाया जाए, कितना गाया जाए, कहां गाया जाए, यह अब बहस का मुद्दा ही नहीं रहा है।

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जो नहीं गाना चाहते, वो गाने वालों की भावना का सम्मान करते हुए गीत पूर्ण होने तक खड़े रहें। अब सवाल सिर्फ इतना है कि केन्द्र सरकार ने सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक समारोहों में इस गीत के पूर्ण वर्जन को गाने की जो अनिवार्यता की है, वह कितनी व्यावहारिक है?
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क्या सरकार ने इस पक्ष पर भी गौर किया है कि हकीकत में लोग इसका कितना पालन करेंगे? कितनों को इतना लंबा गीत याद रहेगा? क्योंकि अभी ‘वंदे मातरम्’ के दो अंतरे गाए जाते हैं, वो भी ज्यादातर लोगों को ठीक से याद नहीं है और यह भी कि जिन देशों के लंबे राष्ट्रगीत हैं, क्या वहां भी इनका संपूर्ण गायन हो पाता है? अगर नहीं तो उसका व्यावहारिक िवकल्प क्या है? 
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कुछ देर के लिए ‘वंदे मातरम्’ की राजनीतिक सरगम को नजरअंदाज करें तो संपूर्ण गीत गायन की व्यावहारिक दिक्कतें जल्द सामने आएंगी। पहला तो यह कि इस गीत का वर्तमान में प्रचलित स्वरूप दो अंतरों का है और राष्ट्रगान के रूप में इसे ही स्वीकार किया गया है।

इसे गाने में 65 सेकंड लगते हैं। यदि इस गीत को संपूर्ण रूप में, जिसमें 6 अंतरे हैं, गाया जाए तो उसमें 3 मिनट 10 सेकंड लगेंगे। भारत में नियम यह है कि राष्ट्रगान अथवा राष्ट्रगीत गायन के समय उसके सम्मान में सावधान की मुद्रा में खड़े रहना होता है।

ताजा प्रोटोकॉल में कहा गया है कि अब राष्ट्रगान ( वंदे मातरम्) , राष्ट्रगीत ( जन-मन-गण) के पहले होगा। राष्ट्रगीत गाने में 52 सेकंड लगते हैं। यानी दोनो गीत गाने में कुल समय 4 मिनट 2 सेकंड का लगेगा। क्या लोग इतने समय तक सावधान की मुद्रा में खड़े रह सकते हैं? अगर वर्तमान में प्रचलित  राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत एक के बाद एक गायें जाएं तो कुल समय 1 मिनट 17 सेकंड लगता है।

राष्ट्रगान तो दूर, जमीनी हकीकत तो यह है कि श्रद्धांजलि स्वरूप रखे जाने वाले दो मिनट के मौन में भी लोग स्थिर मुद्रा में नहीं रह पाते तो चार मिनट तक एक ही मुद्रा में खड़े रहना क्या आसान है? और यदि लोग इसका ठीक से पालन नहीं करते तो क्या यह राष्ट्रगान का अपमान नहीं होगा?
 
यहां तर्क दिया जा सकता है कि जब लोग मंदिरों में 10-10 मिनट आरती गा सकते हैं तो 4 मिनट का राष्ट्रगान गाने में क्या दिक्कत है? क्या वो इतनी देर तक सावधान रहकर अपने देशप्रेम का इजहार भी नहीं कर सकते? कहा यह भी जा सकता है कि जब बांग्लादेशी अपने राष्ट्रगीत ‘ आमार शोनार बांग्ला’, जो 2 मिनट 56 सेकंड का है, को गा सकते हैं तो भारतीय तीन मिनट से ज्यादा के राष्ट्रगान को क्यों नहीं गा सकते?

बांग्लादेश का राष्ट्रगीत भी पूरा ही गाया जाता है। यह गीत कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था और अभी तक तो वहां का राष्ट्रगीत बना हुआ है। (नया संविधान आने पर बदला भी जा सकता है, क्योंकि वहां के कट्टरपंथी मुसलमानों को यह मंजूर नहीं है कि मुस्लिम बांग्लादेश का राष्ट्रगीत एक हिंदू द्वारा लिखा गया हो।

आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में वहां के राष्ट्रकवि नजरूल इस्लाम का लिखा कोई गीत राष्ट्रगीत घोषित कर दिया जाए, क्योंकि नजरूल मुसलमान थे। हालांकि उनकी पत्नी हिंदू थी।)।

एक और तर्क यह हो सकता है कि जब सैनिक, पुलिस, कैडेट आदि परेड के समय और स्कूली बच्चे प्रार्थना सभा में सावधान खड़े रह सकते हैं तो पांच मिनट तक राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के वक्त सावधान खड़े रहने से कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा? 

वैसे दुनिया में शब्दों के हिसाब से सबसे लंबा राष्ट्रगीत ग्रीस का ‘ यमनोस एइस टिन एलेफ्थेरियान’ (हाइम टू लिबर्टी) है। इसमें कुल 158 अंतरे हैं। यह राष्ट्रगीत 1823 में लिखा गया था। इसे पूरा गाने में 50 मिनट लगते हैं। लेकिन इसे पूरा कभी-कभार ही गाया जाता है। आम तौर पर राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते हैं। इसे ही मानक वर्जन माना जाता है। इसे गाने में करीब 60 सेकंड लगते हैं।

इसी तरह दक्षिण अमेरिकी देश उरूग्वे का राष्ट्रगीत ‘ अोरिएंतेल्स ला पात्रिया ओ ला तुम्बा’ को पूरा गाने में साढ़े चार से छह मिनट लगते हैं। लेकिन व्यवहार में इसका पहला अंतरा और कोरस ही गाया जाता है। इसमे कुछ सेकंड्स लगते हैं। दुनिया में सबसे संक्षिप्त राष्ट्रगीत जापान, जॉर्डन और सान मारिनो के हैं। ये केवल चार पंक्तियों के हैं। 

वर्तमान में ‘वंदे मातरम् ‘ के दो वर्जन ही लोकप्रिय हैं। पहला, जो गान सरस्वती लता मंगेशकर ने ‘आनंदमठ’ फिल्म के लिए गाया था और जो प्रयाण गीत की तरह है। ‘वंदे मातरम्’ और ‘ ऐ मेरे वतन के लोगों ‘ ने लताजी को राष्ट्रभक्ति गीतगायन के राज सिंहासन पर अटल रूप से विराजमान कर दिया है। ‘आनंदमठ’ के ‘वंदे मातरम्’ का संगीत प्रख्यात संगीतकार हेमंत कुमार ने तैयार किया था।

यह भी 2 मिनट 58 सेकंड में पूरा हो जाता है। आजादी के बाद प्रख्यात गायक पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल के आग्रह पर इस गीत को आकाशवाणी के लिए रिकॉर्ड किया था।

यह धुन ‘देश राग में’ बांधी गई है। जबकि पिछले साल वंदे मातरम् की 150 वीं वर्षगांठ पर उस्ताद जोहर अली ने इस गीत के हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में दो नए वर्जन भी तैयार किए हैं।
 
कह सकते हैं कि यहां सवाल केवल आंगिक मुद्रा का न होकर राष्ट्रप्रेम का है। सही है, लेकिन आरती गाने या ताल बजाने में किसी शारीरिक मुद्रा की अनिवार्यता नहीं होती। आप अपनी सुविधा और आस्था से किसी भी तरह भगवत भक्ति कर सकते हैं। दिलचस्प यह है कि ताजा प्रोटोकाॅल में सिनेमाघरों को इससे मुक्त रखा गया है।

कारण साफ है कि सिनेमाघरों में इस प्रोटोकॉल का पालन होगा, होगा या नहीं, कितना होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जो लोग आज साठ पार हैं, उन्हें भली भांति याद होगा कि गुजरे जमाने में सिनेमाघरों में शो छूटने के बाद पर्दे पर राष्ट्रगीत बजता था। लेकिन अधिकांश दर्शक उसके पहले ही थियेटर से निकल जाते थे कि 52 सेकंड तक कौन खड़ा रहेगा।

यह राष्ट्रगीत का अपमान ही था। इसलिए सरकार ने बाद में इसे खत्म कर दिया। राष्ट्रगीत के समय सावधान की मुद्रा में खड़े न रहना अथवा उसके गायन से पहले ही खिसक लेना,  नियम विरूद्ध भले हो, लेकिन यह मानवीय प्रवृत्ति है और इसे केवल राष्ट्रगान के प्रति अरूचि, असम्मान अथवा देशद्रोह की शक्ल में नहीं देखा जाना चाहिए।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब लोग 52 सेकंड के लिए भी रूकने के लिए तैयार नहीं होते तो फिर आम लोग 4 मिनट के लिए सावधान कैसे खड़े रहेंगे? इस नियम को अनिवार्य रूप से किस सख्ती के साथ लागू किया जाता है, ये देखने वाली  बात होगी,  वरना यह भी संभव है कि ज्यादातर लोग (आयोजकों, अतिथियों को छोड़ दें) तो कार्यक्रम में राष्ट्रगान होने के बाद ही पहुंचें या उसके होने के पहले ही निकल लें।
 
माना यह भी जा रहा है कि ‘वंदे मातरम्’ को दो अंतरों से पूरे छह अंतरों तक लाने के पीछे पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि पहले कांग्रेस और बाद में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने महान लेखक, कवि बंकिमचंद्र चटर्जी को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया। उनके द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ गीत से देवी की शक्ल में की गई मातृभूमि की वंदना का हिस्सा कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते 1937 में ही हटा दिया और केवल आरंभ के दो अंतरे राष्ट्रगान के रूप में मान्य किए गए।

इसका मुख्य कारण मुसलमानों द्वारा इस गीत का विरोध करना था, क्योंकि उनका मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ और विशेषकर इसके तीसरे से छठे अंतरे तक मातृभूमि के रूप में मां दुर्गा की आराधना है। और मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी के आगे सिर नहीं झुका सकता। जबकि भाजपा का मानना है कि इस ओजपूर्ण गीत से संपूर्ण गायन से  हिंदुओं में स्वाभिमान जागेगा।

वो भगवा रंग में रंग कर भाजपा को वोट देंगे और बंगाल में पहली बार उसकी सरकार बनेगी। हालांकि मोदी सरकार इस बात से इंकार करती रही है कि वंदे मातरम् को अनिवार्य करने के पीछे कोई राजनीतिक अजेंडा है। उसका तर्क है कि यह डेढ़ सौ साल बाद ‘वंदे मातरम्’ को उसकी मूल भावना के अनुरूप सम्मान प्रदान करने बहुप्रतीक्षित प्रयास है।

एक तर्क यह भी दिया  गया कि ऐसा करना जेन-जी की मांग है। यह बात अलग है कि जेन-जी के कितने लोग वंदे मातरम् के शुरूआती दो अंतरे भी ठीक से गाकर दिखा सकते हैं। हकीकत में ‘वंदे मातरम्’ तो छोडि़ए देवनागरी वर्णमाला के 52 अक्षर भी ठीक से गिना दें तो गनीमत है। बहरहाल ‘वंदे मातरम्’ के संपूर्ण गायन से  भाजपा को कितना राजनीतिक लाभ होगा, लोगों में देशप्रेम का स्तर किस ऊंचाई तक उठेगा, कहना मुश्किल है।

वैसे भी बंगाल का राजनीतिक और सामाजिक ताना-बाना उत्तर और पश्चिमी भारत के राज्यों से अलग है। यदि वंदेमातरम का संपूर्ण गायन सत्ता वंदन तक ले जाने में मददगार हो सके तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। अगर पार्टी ममता को सत्ता से बेदखल करने में असफल रही तो हो सकता है कि ‘वंदे मातरम्’ के फिर से दो ही अंतरे यथावत गूंजते रहें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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