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जलवायु परिवर्तन ने शिकारी बना दिया भालुओं को भी

Tue, 06 Jan 2026 02:55 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 06 Jan 2026 02:55 PM IST
सार

भालुओं की बस्तियों में धमक इंसानों के लिये तो खतरनाक है ही लेकिन इनके लिये भी बहुत खतरनाक है।

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Climate change has made bears predators too
उत्तराखंड में भालुओं का आतंक। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

वन बाहुल्य के कारण उत्तराखण्ड में मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं नई नहीं हैं, लेकिन इस संघर्ष में अब तक मुख्य भूमिका गुलदार, बांघ और हाथियों की रही है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में रुद्रप्रयाग के मानवभक्षी गुलदार ने 125 से अधिक लोगों को मार कर सारे देश में सनसनी मचा रखी थी। उस मानव भक्षी को जिम कार्बेट ने 2 मई 1926 को मार गिराया था। लेकिन इस संर्घष में भालू अप्रत्याशित रूप से शामिल हो जाने के कारण स्थिति और भी चिन्ताजनक हो गयी है।

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चिन्ताजनक इसलिए भी कि भालुओं के इस हिसंक और शिकारी के जैसे व्यवहार का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन माना जा रहा है। अब भय का कारण गुलदार और बाघ के साथ ही हिमालयी काला भालू भी बन गया है, जो स्वभाव से मांसाहारी नहीं माना जाता था।
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भालुओं की बस्तियों में धमक इंसानों के लिये तो खतरनाक है ही लेकिन इनके लिये भी बहुत खतरनाक है। अवैध शिकारी भालुओं को आसानी से मार कर उनकी बेशकीमती पित्ती की तश्करी का अवैध धन्धा कर सकते हैं।
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उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार इस क्षेत्र में भालुओं का ऐसा हिसंक व्यवहार और आतंक पहले कभी नहीं देखा गया। गांवों से लेकर कस्बों और यहां तक कि राजधानी देहरादून तक भालुओं के हमले दर्ज किए जा रहे हैं।

महिलाएं जंगल में घास-चारा लेने से डर रही हैं, किसान खेतों में काम नहीं कर पा रहे हैं, कई जगह स्कूल बंद करने पड़े हैं और पशुपालन मुश्किल होता जा रहा है। चमोली जिले के पोखरी क्षेत्र के हरिशंकर और ऊडामांडा गांवों में महिलाओं और स्कुली बच्चों पर भालुओं के बार-बार हमले उनके शर्मीले और डरपोक व्यवहार के विपरीत माने जा रहे हैं।

भालुओं द्वारा गौशालाओं की छतें तोड़कर गाय-बैलों को मार डालने की घटनाएं भी सामने आई हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वन विभाग को आपात जैसी व्यवस्था लागू करनी पड़ी है और 400 से अधिक गांवों को संवेदनशील घोषित किया गया है।

साल 2025 में अब तक उत्तराखंड में भालुओं के हमलों से आठ लोगों की मौत हो चुकी है और 95 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जो राज्य गठन के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। पौड़ी, चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। देहरादून जैसे शहरी क्षेत्रों में भालुओं की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि यह समस्या अब केवल जंगलों से सटे गांवों तक सीमित नहीं रही।

हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई क्षेत्रों में वनकर्मियों को दिन में स्कूली बच्चों को सुरक्षित लाने-ले जाने और रात में गश्त करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि कुछ स्थानों पर भालुओं को देखते ही मार गिराने जैसे कठोर आदेश भी जारी किए गए हैं।

इस पूरे संकट का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यही है कि आखिर वह भालू, जो हर साल नवंबर से फरवरी या मार्च तक शीतनिद्रा में चला जाता था, अब सर्दियों में भी सक्रिय होकर मानव बस्तियों में क्यों घुस रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इसका मूल कारण जलवायु परिवर्तन है। हिमालयी काला भालू अपने जीवन चक्र में तापमान और बर्फबारी पर निर्भर रहता है। 

सामान्य परिस्थितियों में सर्दियों की ठंड और बर्फ उसे हाइबरनेशन के लिए मजबूर करती है, जहां वह कई महीनों तक बिना भोजन के रहता है। लेकिन हाल के वर्षों में उत्तराखंड और पूरे हिमालयी क्षेत्र में सर्दियां असामान्य रूप से गर्म हो गई हैं। बर्फबारी या तो बहुत कम हो रही है या समय पर नहीं हो रही। तापमान में इस बदलाव ने भालुओं की जैविक घड़ी को गड़बड़ा दिया है।

जब भालू समय पर शीतनिद्रा में नहीं जाते या बीच में जाग जाते हैं, तो वे अत्यधिक भूखे और तनावग्रस्त होते हैं। इसी समय जंगलों में उनके लिए भोजन की उपलब्धता भी तेजी से घट गई है। बांज, बुरांश और काफल जैसे चौड़ी पत्ती वाले और फलदार पेड़, जो भालुओं के भोजन का मुख्य स्रोत थे, तेजी से कम हो रहे हैं।

उनकी जगह चीड़ के जंगल बढ़ रहे हैं, जो भालुओं को लगभग कोई भोजन नहीं देते। जलवायु परिवर्तन के कारण जंगली फल, कंद और जड़ें या तो समय से पहले सूख जाती हैं या पर्याप्त मात्रा में पैदा ही नहीं हो पातीं। इस स्थिति में भालुओं को ऊर्जा और प्रोटीन की भारी कमी का सामना करना पड़ता है, जिसे वैज्ञानिक “प्रोटीन हंगर” कह रहे हैं।

भूख और तनाव की इसी अवस्था में भालुओं को अब गांवों में फसलें, कचरा और मवेशी आसानी से मिल जाते हैं। भालुओं की सूंघने की क्षमता अत्यधिक तीक्षण होती है। वे आहार को डेढ किमी दूर से सूंघ सकते हैं।

मवेशियों पर बढ़ते हमले यह संकेत देते हैं कि भालुओं की आहार संबंधी आदतों में खतरनाक बदलाव आ रहा है। यह केवल एक व्यवहारिक परिवर्तन नहीं, बल्कि पारिस्थितिक असंतुलन का सीधा परिणाम है। इसके साथ ही, गांवों से हो रहा पलायन भी इस संकट को बढ़ा रहा है।

खाली पड़े खेतों में लैंटाना और काला बासा जैसी विदेशी झाड़ियां उग आई हैं, जो भालुओं को दिन में छिपने के लिए सुरक्षित आवरण देती हैं। इससे वे मानव बस्तियों के बेहद करीब रहने लगे हैं और टकराव की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

यह समस्या केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में भी सर्दियों के दौरान भालुओं की सक्रियता और पशुओं पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की यही गति बनी रही, तो भविष्य में भालू पूरी तरह शीतनिद्रा की प्रक्रिया छोड़ सकते हैं, जिससे हिमालयी क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष और अधिक भयावह रूप ले सकता है।

सरकार और वन विभाग द्वारा कचरा प्रबंधन सुधारने, जंगलों में प्राकृतिक भोजन स्रोत बढ़ाने, गांवों में बाड़ लगाने और भालुओं के व्यवहार पर वैज्ञानिक अध्ययन कराने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। ये प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन अस्थायी समाधान मात्र हैं।

इस संकट से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक यही है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और जलवायु परिवर्तन का असर अब सीधे-सीधे इंसान के जीवन और सुरक्षा पर पड़ रहा है। हिमालय के शांत माने जाने वाले भालू आज जिस तरह शिकारी बनते दिख रहे हैं, वह एक गंभीर पारिस्थितिक चेतावनी है।

यदि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को रोकने के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में इंसान और वन्यजीव दोनों के लिए खतरे और बढ़ते जाएंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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