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जल, जंगल, जमीन और प्राणियों के लिए विनाश न बन जाए विकास

Amalendu Upadhyay अमलेंदु उपाध्याय
Updated Fri, 16 Aug 2019 03:41 PM IST
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जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन - फोटो : pixabay

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जेनिफर जैक्वेट, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं और वैश्विक जलवायु सहयोग, जैसे कि जलवायु परिवर्तन और मछली पकड़ने और इंटरनेट वन्यजीव व्यापार के माध्यम से जंगली जानवरों का शोषण आदि में रुचि रखती हैं। उनकी टीम का कहना है कि दुनिया भर में तटवर्ती जल क्षेत्र में ऑक्टोपस फॉर्म बनाने की योजना नैतिक रूप से अक्षम्य व पर्यावरणीय रूप से खतरनाक है। ऑक्टोपस की खेती  करने के लिए, उन्हें खिलाने के लिए बड़ी संख्या में मछलियों व घोंघा को पकड़ने की जरूरत होगी। इससे पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाएगा और धरती के समुद्री जीवन पर दबाब बढ़ेगा, जो पहले से ही खतरे में है। 
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जेनिफर जैक्वेट की टीम ने जो कहा है वो सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण भर है कि किस तरह मनुष्य अपने क्षुद्र आर्थिक लाभ के लिए प्रकृति से छेड़छाड़ कर रहा है जिसके चलते दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट छा रहा है। एक रिपोर्ट् में कहा गया है कि दस लाख प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं।


यूएन इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (IPBES) ने जैव विविधता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार- प्रजातियों के विलुप्त होने की दर बढ़ रही है और लगभग दस लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है। यह अपनी तरह का सबसे व्यापक मूल्यांकन है। इस रिपोर्ट का सार विगत 29 अप्रैल से 4 मई तक पेरिस में चले आईपीबीईएस के सातवें सत्र में जारी किया गया।
 
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